बिहार विशेष : इकट्ठे दो सीएम को हरानेवाले गरीबो के डाक्कसाब - Live Aaryaavart

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शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2020

बिहार विशेष : इकट्ठे दो सीएम को हरानेवाले गरीबो के डाक्कसाब

 (कहानी पटनेवाले डॉएके सेन की, जिनकी चर्चा नहीं होती)

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वह साठ का दशक था. तब किसी को टीबी की बीमारी होने का मतलब होता था कि उसे अपने घर में अलग-थलग कर दिया जाना. समाज में तो वह अछूत-सा ही माना जाने लगता था. ऐसे समय में पटना की गलियों में झक सफेद हाफ शर्ट-सफेद पैंट और बिना मौजे का जूता पहने एक व्यक्ति टीबी मरीजों के पास पहुंचता था. उन मरीजों के साथ बैठकर बातें करता. मरीजों के हाथों से खाता-पीता. लोग दंग कि यह क्या कर रहा है, इसे भी टीबी हो जाएगा. लेकिन वह व्यक्ति अपना काम कर फिर वापस लौट जाता. बिना कोई लंबी- चौड़ी बात किये. कोई कुछ पूछता तो सिर्फ इतना भर जवाब मिलता-‘‘ आपलोग भ्रम में हो, टीबी कोई छुआछूत की बीमारी नहीं. अगर ऐसा होता तो मैं तो रोज ही टीबी मरीजों के साथ उठता-बैठता हूं, उनके साथ खाता-पीता हूं, मुझे टीबी नहीं हो गया होता!’’ सफेद शर्ट-पैंट में घूम-घूमकर अमूमन रोजमर्रा के जीवन में यह काम करनेवाला कोई और नहीं बल्कि डाॅ एके सेन हुआ करते थे, जो पटना के मशहूर चिकित्सक थे. चिकित्सकीय पेशा को जनसेवा का आधार बनाकर जन-जन में लोकप्रिय हो जानेवाले डाॅ सेन एमआरसीपी के लिए यूरोप जाने से पहले पटना मेडिकल काॅलेज एंड हाॅस्पिटल से एमडी के दौरान जो थेसिस प्रस्तुत किये थे, वह डायबिटिज और कैंसर के रिश्ते पर आधारित था. डाॅ सेन के ही अध्ययन को आगे बढ़ाकर पोलैंड के दो वैज्ञानिकों ने जब नोबल पुरस्कार प्राप्त किये तो डाॅ सेन को एक पत्र भी आया कि आपके ही अध्ययन का फल है कि आज हम नोबल प्राइज विनर हैं. लेकिन आजादी के एक वर्ष पूर्व ही चिकित्सा विज्ञान के प्राध्यापक बन चुके डाॅ सेन दूसरी राह अपना चुके थे.

1967 में बिहार में आम चुनाव हो रहा था. कांग्रेस को हराओ मुख्य राजनीतिक नारा बन गया था. पटना में तत्कालीन मुख्यमंत्री केबी सहाय के खिलाफ विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार महामाया प्रसाद सिन्हा थे. महामाया बाबू का मुख्य चुनावी दफ्तर डाॅ एके सेन के घर पर ही था और चुनाव प्रबंधन का काम डाॅ सेन ही देख रहे थे. महामाया बाबू विजयी हुए. एक डाॅक्टर के चुनावी प्रबंधन से सहाय भी हक्के-बक्के थे. लेकिन दो साल बाद मध्यावधि चुनाव की बारी आ गयी. महामाया बाबू निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर मैदान में थे, केबी सहाय भी उनके मुकाबले थे और इन दो मुख्यमंत्रियों के बीच डाॅ एके सेन खुद सीपीआई प्रत्याशी के तौर पर चुनावी मैदान में थे. लोगों के बीच चिकित्सा सेवा के माध्यम से मिली लोकप्रियता ने दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों को पराजित कर दिया. डाॅ सेन विजयी हुए. यहां यह बात भी गौर करनेवाली है कि डाॅ सेन अचानक से चिकित्सा कारणों से मिली प्रसिद्धी को राजनीति में भुनाने के लिए राजनीति में आ गये थे. वरिष्ठ वाम आलोचक डाॅ खगंेद्र ठाकुर द्वारा डाॅ सेन स्मृति गं्रथ के अनुसार- डाॅ एके सेन जब आठ साल के थे, तभी गांधीजी की गिरफ्तारी के विरोध में आमरण अनशन पर बैठ गये थे. जब मेडिकल काॅलेज में प्राध्यापक थे, तभी मजदूरों, छोटे पद पर कार्यरत कर्मियों के समूह को संगठित कर उनकी आवाज को बुलंद कर रहे थे. उन्हें नौकरी भी छोड़नी पड़ी.

लेकिन यह सब करते हुए डाॅ सेन अपने पेशा के प्रति हमेशा प्रतिबद्ध रहे. रोज सुबह आठ बजे वे अपने चैंबर में पहुंच जाते थे, मरीज आते, दस रुपया फीस था, जो देने में सक्षम है तो दिया नहीं तो कोई जरूरी भी नहीं. और नहीं तो गांव-देहात से आनेवाले मरीज बजाप्ता डाॅ सेन के घर डेरा भी डाल देते थे. तबियत ठीक-ठाक महसूस करने पर ही विदा होते थे. इस दौरान डाॅ सेन को इलाज के साथ उनके खाने-पीने का भी इंतजाम करना होता था जो वे पूरे मनोयोग से करते थे. अपने पेशे को और राजनीतिक विचारधारा को वे हमेशा दो अलग-अलग खाके में रहते थे. यही वजह थी कि उनके पास इलाज के लिए हर दल, हर विचारधारा के लोग पहुंचते थे. चुनाव हारने के बाद केबी सहाय भी उनके पास इलाज के लिए पहुंचे तो जेपी को भी डाॅ सेन पर बहुत भरोसा रहता था. एक बार हिंदी साप्ताहिक ‘योगी’ के संपादक ब्रजशंकर वर्मा अपना इलाज कराने डाॅ सेन के यहां पहुंचे. वर्मा जी कुछ शंकालु प्रवृत्ति के थे. उन्होंने डाॅ सेन से निःसंकोच कहा-‘‘ आप कांग्रेस के तीखे आलोचक और कम्युनिस्ट विचारधारा के समर्थक हैं जबकि मैं कट्टर कांग्रेसी और कम्युनिस्ट पार्टी का घोर विरोधी. ऐसी हालत में भी आश्वस्त होकर मैं टीबी से आक्रांत होने के कारण इलाज के लिए आपके पास आया हूं.’’ डाॅ सेन ने हंसते हुए सहज भाव से जवाब दिया-‘‘ मैं खासतौर से शारीरिक रोगों का निदान करता हूं, मनोचिकित्सक नहीं हूं. मैं शारीरिक रोग की जांच कर दे रहा हूं, बाद में आप किसी मनोचिकित्सक के पास चले जाइयेगा...’’ 

कई अन्य छोटे-मोटे नेताओं की तुलना में डाॅ सेन को अधिकतर नयी पीढ़ी नहीं जानती, क्योंकि वे आत्मप्रसिद्धी से हमेशा दूर रहते थे लेकिन आज भी पटना में कई झुग्गी-झोपड़ी में रहनेवाले परिवारों के बीच डाॅ सेन मसीहा की तरह ही दिलों में राज करते हैं, क्योंकि विधायक रहते हुए डाॅ सेन ने ही पहली बार ‘बेघरों के लिए घर’ की बात कर उन्हें स्थायी तौर पर बसाने का काम करवाया था. और फिर पटना के झुग्गी-झोपड़ी वालों के बीच यह कहावत भी तो उस समय मशहूर थी कि कुछ हो जाये, पहुंच जाओ डाॅ सेन के पास, रोते हुए जाओ, हंसते हुए आओ...

जब यह पोस्ट लिख रहा हूं तो विश्वजीत दा को याद कर रहा हूं. पटने में मेरा​ प्रिय ठियां—ठिकाना था दिनकर गोलंबर पर उनका घर. देहाती कुत्तों से उनकी यारी, छिपकिलियों से भी उतना ही मोहब्ब्त.विश्वजीत दा इन सबके बीच वहीं अपने घर में ​बिड़ी फुकफुकाते हुए रहते थे. किताबों के ढेर में. डॉ एके सेन के बेटे थे. आज डॉ एकेसेन पर लिखते हुए विश्वजीत दा की बहुत याद आ रही है.



साभार : निराला जी के पोस्ट 

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