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शुक्रवार, 27 नवंबर 2020

डॉक्टर पर कार्रवाई नहीं होगी तब तक हस्ताक्षर अभियान जारी रहेगा

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नालंदा। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिला नालंदा के अनुमंडलीय अस्पताल राजगीर में नवजात शिशु रोग विशेषज्ञ नहीं होने के कारण डिलीवरी के समय बच्चा जनने पर कभी-कभी कई तरह की समस्या उत्पन्न हो जाती है। जिसके चलते नवजात बच्चा बच नहीं पाता।  देखा जाए तो राजगीर अस्पताल में मूलभूत सुविधाओं का काफी अभाव है। यहां ट्रामा सेंटर, ब्लड बैंक या हड्डी रोग विशेषज्ञ, नवजात शिशु रोग विशेषज्ञ नहीं है। इसके लिए लोग बाहर जाकर इलाज करवाने को बेबस हैं। दुर्घटनाग्रस्त मरीज तो रास्ते में जाते-जाते दम तोड़ देते हैं। ऐसे ही घटना गिरियक रोड निवासी संजीव कुमार उर्फ बिट्टू ने राजगीर अस्पताल में अपनी पत्नी को डिलीवरी कराने लाया, जहां बच्चे के पिता संजीव कुमार ने बताया कि 10 तारीख को 12:40 रात्रि अस्पताल में बच्चे का जन्म नर्स की देखरेख में हुई। परंतु एक रात रहने के बाद कोई नहीं बताया कि बच्चे के साथ क्या समस्या है। 


जब अस्पताल में टीका लगाने गया तो बच्चा को देखकर नर्स ने कहा कि इसे किसी शिशु रोग चिकित्सक से दिखा दीजिए। इतना कहने के बाद बच्चे को लेकर मै पटना ले गया तब तक बहुत देर हो चुकी थी। चिकित्सक इलाज के दौरान बच्चा को बचा नहीं पाया। इस घटना को लेकर राजगीर की जनता काफी आहत हैं। लोगों ने अस्पताल में मूलभूत सुविधा उपलब्ध कराने को लेकर लोगों से साक्षर अभियान तक चलाया गया। साथ ही साथ अस्पताल की व्यवस्था को लेकर रविवार की शाम 5:00 बजे कैंडल मार्च निकाली गई।  इस घटना को लेकर संजीव कुमार ने जिलाधिकारी एवं सिविल सर्जन  शिकायत की है जिसमें जांच के लिए सिविल सर्जन डॉ राम सिंह एक सप्ताह पहले राजगीर अस्पताल पहुंचकर कई बिदुओं पर जांच पड़ताल की। इधर, राजगीर अनुमंडलीय अस्पताल के उपाधीक्षक उमेश चंद्र ने कहा कि बच्चे नर्स की देखरेख में हुई है। उन्होंने कहा कि कभी-कभी मां में आर एच माइनस प्लस होने पर इस तरह की मामला हो जाती है। इसमें खून  की कमी हो जाती है और खतरा बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है। कारण जो भी हो इस पर्यटन स्थल राजगीर अस्पताल में चिकित्सकों की कमी के कारण आए दिन इस तरह की समस्या उत्पन्न होती रहती है। 


सूबे की सरकार के द्वारा राजगीर अस्पताल को भव्य बिल्डिग बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा गया है परंतु इलाज के मामले में चिकित्सकों की कमी दिखाई पड़ती है। इस  घटना को लेकर राजगीर की आम जनता ने सरकार एवं जिला प्रशासन से मांग की है कि राजगीर अस्पताल में ट्रामा सेंटर, हड्डी रोग विशेषज्ञ, नवजात शिशु रोग विशेषज्ञ, ब्लड बैंक की व्यवस्था की जाए।  राजगीर अनुमंडलीय अस्पताल में एक नवजात बच्चे की मौत हो गई थी। परिजनों के अनुसार चिकित्सक की लापरवाही के कारण बच्चे की मौत हुई है। इस मामले ने तूल पकड़ लिया है। घटना के बाद नवजात के पिता इंसाफ के लिए दर-दर भटक रहा है।  लापरवाह डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई को लेकर मृतक के पिता गिरियक निवासी संजीव कुमार ने थाने में शिकायत दर्ज करायी थी। राजगीर थाना में शिकायत दर्ज नहीं की गयी थी। इस के बाद पीड़ित ने नालंदा सांसद कौशलेंद्र कुमार और डीएम योगेंद्र सिंह को घटना की लिखित जानकारी दी। सिविल सर्जन डाक्टर राम सिंह ने राजगीर अनुमंडलीय अस्पताल पहुंचकर घटना की जानकारी ली और कार्रवाई की बात कही थी। अभी तक कार्रवाई नहीं होने से पीड़ित के पिता ने स्वास्थ्य विभाग के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया है। इन्हें स्थानीय लोगों का सहयोग भी मिल रहा है। पीड़ित के पिता संजीव कुमार ने बताया कि कही से इंसाफ नहीं मिल रहा है। थक हारकर स्वास्थ्य विभाग के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया है। 


अस्पताल की व्यवस्था सुधारने को लेकर हस्ताक्षर अभियान शुरू किया है। आम लोगों और कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं का सहयोग मिल रहा है। उन्होंने कहा कि जब तक डॉक्टर पर कार्रवाई नहीं होगी तब तक हस्ताक्षर अभियान जारी रहेगा। नर्स करवाती हैं प्रसव बताते चलें कि राजगीर अनुमंडल अस्पताल में नर्स ही प्रसव करवाती है। जिसके कारण इस तरह की घटना हो रही है। मृतक के पिता ने बताया है कि 9 नवंबर की रात लगभग 8:15 बजे अपनी 28 वर्षीय पत्नी खुशबू कुमारी को प्रसव पीड़ा के बाद राजगीर अनुमंडल अस्पताल ले गए। जहां डॉक्टर मौजूद नहीं थी। एक नर्स थी। नर्स बोली यहां ग्लब्स नहीं है। बाहर से लाना पड़ेगा। जांच के बाद नर्स ने बताया कि प्रसव रात में होने की संभावना है। रात में आराम से आइये। रात्रि करीब 10:15 बजे पुन: पत्नी को लेकर अस्पताल गये तो उस समय भी डॉक्टर मौजूद नहीं थी। नर्स ने कहा कि कोई दिक्कत नहीं है। डिलीवरी हम लोग ही कराते हैं। रात्रि 12:50 पत्नी ने बच्चे को जन्म दिया। सुबह तक कोई डॉक्टर बच्चे की जांच करने नहीं पहुंचे। सुबह 9:00 बजे नर्स ने ही प्रिस्क्रिप्सन और डिस्चार्ज पत्र थमा दिया। जिसमें जच्चा बच्चा को गुड कंडीशन में होने की बात लिख कर दी गई थी। घर जाने से पहले बच्चे को टीका लगाने वाली कक्ष में नर्स के पास गये तो नर्स बोली कि लगता है बच्चे को जॉन्डिस है। डॉक्टर से दिखा लीजिए। बगल वाले कक्ष में एक डॉक्टर से दिखाया तो उन्होंने कहा कि बच्चे को जॉन्डिस है। यहां जांच और इलाज की व्यवस्था नहीं है। डॉक्टर ने इलाज नहीं कर रेफर कर दिया। इसके बाद बच्चे की हालत गंभीर हो गयी। निजी अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। 


डाॅक्टरों के नौ पद खाली है जब अनुमंडलीय अस्पताल की व्यवस्था की गहन जांच की यहां डॉक्टर और स्टाफ की घोर कमी पायी गयी। अस्पताल से मिली जानकारी के अनुसार यहां कुल 11 डॉक्टर हैं। जिसमें मात्र एक महिला डॉक्टर हैं। जबकि 9 डॉक्टर का पद खाली है। अस्पताल में शिशु रोग विशेषज्ञ, महिला रोग विशेषज्ञ, आंख का डॉक्टर, हड्डी का डॉक्टर एवं एक भी सर्जन नही है। इतना ही नहीं माली का पद खाली है। रात्रि प्रहरी का 2 पद भी खाली है। रेडियोलॉजिस्ट का 1 पद खाली है। फार्मासिस्ट का 2 पद है। जिसमें 1 खाली है। आदेशपाल का 2 पद है। वह सभी खाली है। सफाई कर्मियों का 2 पद खाली है। लैब टेक्नीशियन का दो पद है। जिसमें एक पद खाली है और दूसरा टेक्नीशियन डिप्यूटेशन पर हिलसा में कार्यरत है। कलर्क का 3 पद है। जिसमें 2 खाली है। ड्राइवर का 1 पद खाली है। यहां जीएनएम का 50 पद है। जिसमें 25 खाली है। 25 जीएनएम ही अस्पताल में कार्यरत है। फोर्थ ग्रेड कर्मी में 4 महिला में 2 पद खाली है। पुलिस में 4 पद है। जिसमें 1 खाली है।  इतना ही नहीं यंहा 6 महीने से लैब टेक्नीशियन नहीं रहने के कारण जांच पूर्ण रूप से बंद है। बोले पदाधिकारी प्रभारी डा. उमेश चंद्र ने बताया कि डाक्टरों एवं स्टाफ की कमी को लेकर कई बार विभाग को अवगत कराया गया है। अभी तक नियुक्ति नहीं हो पाई है। स्टाफ और डॉक्टर की कमी का असर काम पर पड़ता है। बदल सकते हैं प्रभारी सिविल सर्जन डॉ. राम सिंह ने बताया कि मृतक नवजात के पिता की शिकायत पर उन्होंने जांच की है। इलाज में लापरवाही का आरोप गलत है। जॉन्डिस की पुष्टि जांच के बाद ही की जा सकती है। हालांकि अस्पताल में व्यवस्थागत खामियां है। ऐसे प्रभारी का विकल्प तलाशा जा रहा है। 

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