बिहार : अन्नदाता के लिए अन्नत्याग, 07 दिसंबर को बारह घंटे का उपवास - Live Aaryaavart

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रविवार, 6 दिसंबर 2020

बिहार : अन्नदाता के लिए अन्नत्याग, 07 दिसंबर को बारह घंटे का उपवास

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पटना. केंद्र सरकार के किसान विरोधी कानूनों के खिलाफ सर्व सेवा संघ के अध्यक्ष चंदन पाल और अखिल भारत सर्वोदय समाज के संयोजक पी  वी राजगोपाल ने संयुक्त वक्तव्य जाहिर कर राष्ट्रीय स्तर पर 'अन्नदाता के लिए अन्नत्याग' 07 दिसंबर 2020 को बारह घंटे का उपवास और "जनांदोलन" के तहत 08 दिसंबर 2020 को भारत बंद - जनांदोलन में सहभागिता करने का आह्वान किया है. केंद्र सरकार दिल्ली की सीमा पर चल रहे किसान आंदोलन को दबाने की कोशिश कर रही है.वह किसानों पर पानी के फव्वारों, आंसू गैस का उपयोग करके, राजमार्गों पर खाइयों को खोदकर, जीवनघाती तरीकों  और किसानों के नेताओं को स्थानबद्ध करके आंदोलन को दबाने की कोशिश कर रहीं है.केंद्र सरकार के,  ब्रिटिश राजशाही को भी शर्मिंदा करें, ऐसे  दमन के बावजूद, लाखों किसान दिल्ली की सीमा पर अडिग बैठें हैं.आज सर्व सेवा संघ  सर्वोदय समाज के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर इस आंदोलन को तेज करने की अपील कर रहा हैं. सर्व  सेवा संघ (अखिल भारत सर्वोदय मंडल) और सामाजिक, राजनीतिक और परिवर्तनवादी संगठनों ने 8 दिसंबर 2020 को केंद्र सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ चल रहे देशव्यापी जनआंदोलन को तेज करने का निर्णय  लिया है.इससे पहले तीनों कानून क्यो विवादास्पद हैं इसके बार में समझे.


1) आवश्यक वस्तु अधिनियम में परिवर्तन:

1955 में लागू किया गया यह  कानून, सरकार को पूंजीपतियों और कंपनियों द्वारा खाद्यान्न के भंडारण और मूल्य को नियंत्रित करने का अधिकार देता है. लेकिन केंद्र सरकार का नया कानून उक्त कानून को निष्प्रभावी बनाता है. यदि अतिभंडारण(स्टॉकपिलिंग) और कीमतों पर सभी प्रतिबंध हटा दिए जाते हैं, तो बड़े व्यापारिक संगठन, कंपनियां, पूंजीपति बड़े पैमाने पर स्टॉकपाइल्स बनाएंगे, बाजार में भोजन की कमी पैदा करेंगे और कीमतें बढ़ाएंगे.


2) अनुबंध खेती(contract farming)

अधिनियम: किसी भी कृषि प्रसंस्करण कंपनी, पूंजीपति व्यापारी या कृषि कंपनी को किसानों के साथ कृषि समझौतों में प्रवेश करने की अनुमति देता है. इस अधिनियम के माध्यम से, छोटे किसानों के कृषि भूमि  के स्वामित्व को समाप्त कर दिया जाएगा. इससे  यह स्पष्ट है कि सरकार आजादी के बाद खत्म कि गयी जमींदारी प्रथा को एक नए रूप में स्थापित करने जा रहीं हैं.


3) कृषि उपज मंडी समिति अधिनियम को दरकिनार:

उक्त व्यवस्था को सामान्य किसानों को लालची और शक्तिशाली व्यापारियों द्वारा लूटने से रोकने के लिए बनाया गया था.


ये समितियाँ सरकार के खाद्य खरीद केंद्र भी बन गए. 

नये संशोधन से कृषि उपज खरीद बिक्री की यह व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी.यह सच है कि व्यापारियों और दलालों ने कार्टेल बनाए जिससे वे किसानों को लूटते थे , लेकिन इस भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के नाम पर सरकार किसानों से माल खरीदने के लिए बड़ी कृषि कंपनियों (कृषि उपज मंडी समिति को छोड़कर) को खुली  अनुमति दे रही है.


इन कानूनों के परिणाम:

हमें इन तीनों कानूनों को एक साथ देखना होगा. यह सब बड़े व्यापारियों और कंपनियों के लिए कृषि व्यवसाय पर पूर्ण नियंत्रण हासिल करना आसान बना देगा. तीसरे मुद्दे को लेकर किसान ज्यादा गुस्से में हैं. उन्हें डर है कि अगर एपीएमसी का प्रचलित प्रभुत्व नष्ट हो जाता है, तो निजी ऑपरेटर / व्यापारी / कृषि  दरों को नियंत्रित करेंगे.नए कानून में कहा गया है कि इन निजी कम्पनियों को कोई शुल्क, उपकर या कर नहीं देना होगा. कुल मिलाकर नये कानून ने देश में निजी पूंजीपतियोंके बाजार को बढ़ावा देने का एक रास्ता खोल दिया है. सरकार का कहना है कि कृषि उत्पादो के लिए बहुत सारी कंपनियां आएंगी, किसानों से माल खरीदने के लिए उनके बीच प्रतिस्पर्धा होगी और इससे किसानों के माल को बेहतर कीमतें मिलेंगी. लेकिन वास्तव में बड़ी कंपनियां एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं करती हैं, क्योंकि अगर ये कंपनियां कीमतों के लिए एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करती हैं, तो वे एक-दूसरे को नष्ट कर देंगी.तो कीमत के मामले में, वे एक सहयोगात्मक तरीके से काम करेंगी.इसके लिए वे कार्टेल बनाएगे और बाजार को आपस में बांट लेंगे.


विशालकाय विदेशी कृषि कंपनियां :

ये कृषि कंपनियां और विशेष रूप से विदेशी कंपनियां बहुत बड़ी हैं.एक उदाहरण देने के लिए, बायर एकमात्र कंपनी है जो पूरे महाराष्ट्र से कृषि उत्पाद खरीद सकती है! ऐसे समय में जब रिलायंस जैसी कंपनी खुदरा क्षेत्र में प्रवेश करने की तैयारी कर रही है, इस तरह के कानून इन कंपनियों को बढ़ावा देने की पृष्ठभूमि तैयार कर रहे हैं.यह कृषि और किसानों को समाप्त करने की साजिश है. ये शक्तिशाली कंपनियाँ क्षेत्र भर के किसानों के साथ समझौते करेंगी, शुरू में किसानों को अच्छे दामों की पेशकश करेंगी क्योंकि उनके पास बड़ी पूंजीगत राशि है.स्टॉकपिलिंग सीमा को हटाने और कृषि उपज बाजार समिति अधिनियम के निरसन के साथ, वे किसानों से बड़ी मात्रा में फसलों की खरीद और भंडारण कर सकेंगे.इस प्रकार, कुछ वर्षों में, ये विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में कृषि व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करेंगी. जब उनका एकाधिकार स्थापित हो जाएगा, तो सभी छोटे व्यापारी समाप्त हो जाएंगे.उसके बाद, ये कंपनियां कृषि उत्पादन का भाव खुद तय करेंगी  और किसानों को कम कीमत देंगी, क्योंकि तब किसानों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं होगा. दूसरी ओर, मंडियों में किसानों से माल खरीदने वाले लाखों छोटे व्यापारियों, दलालों और बिचौलियों का कारोबार बंद हो जाएगा.


भूख-कुपोषण-मुद्रास्फीति भस्मासुर:

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह  देश की  भूख और कुपोषण की समस्या ’को बढ़ाएगा. वर्तमान में कृषि मण्डिया सरकारी अन्न खरीद की मुख्य केंद्र है इनके निष्प्रभावी होने से सरकार धीरे-धीरे अन्न खरीद बंद करके  सार्वजनिक वितरण प्रणाली को समाप्त कर देगी.उसकी जगह बहुसंख्यक सीमांत  किसानों और गरीब / कमजोर जनता के खातों में प्रत्यक्ष अनुदान राशि जमा की अस्थायी योजना को लागू करके, पूरी खाद्य सुरक्षा योजना को तोड़ना ही इसका उद्देश्य है. सार्वजनिक वितरण प्रणाली के टूटने से निजी व्यापारी जमाखोरों करके खाद्य कीमतों  बढ़ा देंगे. इसलिए, देश में अरबों गरीब लोगों पर एक बड़ा संकट आने वाला है.सार्वजनिक वितरण प्रणाली देश में जमाखोरी और मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के लिए शुरू की गई थी. इस प्रकार, इन तीन कानूनों को पारित करके, खुद को  'देशभक्त' कहने वाली  सरकार ने भारतीय कृषि प्रणाली  न केवल  कंपनियों का नियंत्रण प्रतिस्थापित करने  के लिए परिस्थितियां पैदा कर रही है, बल्कि देश को भूख और कृत्रिम सूखे की घाटी में धकेल रही है. देश भर के किसान संगठन इसका विरोध कर रहे हैं. हम किसानों के इस आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं. हम सरकार से निम्नलिखित मांग कर रहे हैं: वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा पारित तीनों किसान विरोधी कानूनों को बिना शर्त  तत्काल रद्द करना चाहिए.सभी फसलों के लिए जो उत्पादन लागत है उसका देड गुना न्यूनतम मूल्य घोषित किया जाना चाहिए और सरकारी खरीद की कानून द्वारा किसानों को गारंटी दी जानी चाहिए. केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा कृषि पर व्यय को दोगुना किया जाना चाहिए। बीज-उर्वरकों पर अनुदान बढ़ाएँ.स्वामीनाथन आयोग की स्थापना केंद्र सरकार ने नवंबर 2004 में की थी, जिसमें भारतीय किसानों की परिस्थितियों में सुधार के लिए इस आयोग द्वारा प्रस्तुत सिफारिशों को लागू करें.तीनों किसानो /श्रमिको के  विरोधी कानून को तत्काल निरस्त करें. सर्व सेवा संघ के अध्यक्ष चंदन पाल और अखिल भारत सर्वोदय समाज के संयोजक पी  वी राजगोपाल ने कहा है कि आइए हम सभी भारतीय इन चरमपंथी और हानिकारक कानूनों के खिलाफ 'एक दिवसीय उपवास' व 'भारत बंद' के राष्ट्रव्यापी आंदोलन में शामिल हों.7 दिसंबर 2020, सोमवार को सुबह 07.00से शाम 07.00 बजे तक उपवास रखें.व 8 दिसंबर, 2020, मंगलवार को  सुबह 11.00 बजे से शाम 4.00 बजे तक स्थानिक किसानों के साथ इन कानूनों के विरोध में आंदोलन करके ज्ञापन जिलाधिकारी द्वारा केंद्र सरकार को भेंजे.

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