विचार : बोर्डरूम से आया बजट? - Live Aaryaavart

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मंगलवार, 2 फ़रवरी 2021

विचार : बोर्डरूम से आया बजट?

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मुझे अक्सर आश्चर्य होता है कि भारत की प्रतिष्ठित प्रशासनिक सेवाओं के मौजूद रहते इतने सारे सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण की नौबत क्यों आ बनती है! कॉरपोरेट हस्तियों के पास आखिर ऐसी कौन सी प्रबंधन तरकीबें हैं जिन्हें हमारी सरकारें और ज़्यादा मानवीय तरीके से उपयोग में नहीं ला सकतीं! भारत का वार्षिक बजट पढ़ना अब एक निरर्थक अभ्यास सा लगता है! आप पेड़ों की गिनती करते रहते हैं, वे जंगल साफ करने पर उतारू दिखते हैं! आप शिक्षा, स्वास्थ्य या रोजगार की संख्याओं में उलझे रहते हैं, वे राष्ट्रीय संपत्ति, बैंक और सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने में पूरी ताक़त लगा देते हैं! आप अपने गाँव के लिए आवंटन ढूंढते हैं; वे इस दायित्व से दूर भागते दिखते हैं कि किसान पर्याप्त भोजन उगा भी सकें और खा भी सकें!


आज के समय में कॉरपोरेट हस्तियों के हाथों में कितना कुछ है - मीडिया चैनल, बीमा सौदे, ऋण छूट, किसानों की आय, श्रमिकों की मजदूरी, सूची लंबी है! लगता है कि उनके ही हवाले वह सारी ज़िम्मेदारियाँ हैं जो चुनी हुई सरकारों को करना था - रोजगार पैदा करना, कृषि को लाभप्रद बनाए रखना, अर्थव्यवस्था चलाना, यहां तक ​​कि शिक्षा और स्वास्थ्य भी प्रदान करना! शायद हम कहने को ही एक समाजवादी गणराज्य हैं! इस वर्ष के बजट का एक नमूना देखें। 3 बैंकों सहित कम से कम 10 सार्वजनिक उपक्रमों के लिए विनिवेश शुरू किया जाना है। मनरेगा के लिए परिव्यय, जो कि कोविड के आक्रमण के बाद से ही एक जीवन रक्षक भूमिका निभाता रहा है, में लगभग 34 प्रतिशत की भारी गिरावट आई है। कोविड की वजह से यह पिछले साल 1,11,500 करोड़ रु. था, अब सिर्फ रु. 73,000 करोड़। शिक्षा के प्रमुख कार्यक्रम समग्र शिक्षा का आवंटन पिछले साल के बजट अनुमान से 19.9% ​​कम हुआ है, यानी इस बार सिर्फ रु. 31,050 करोड़ उपलब्ध हैं, जबकि स्कूलों में कोविड की वजह से हुए भीषण स्तर के ड्रॉपआउट की चुनौती से टकराने के लिए शिक्षा के बजट में पर्याप्त वृद्धि की आवश्यकता थी। पिछले वर्ष के संशोधित अनुमानों की तुलना में अनुसूचित जाति और अल्पसंख्यकों के लिए पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति क्रमशः 10.5% और 12.5% ​कम हो गई है।  


पोषण, बाल संरक्षण और महिला कल्याण के कार्यक्रमों के मामले में अच्छी बाजीगरी देखने को मिल रही है। छत्र ICDS कार्यक्रम के कई घटकों को अब नई पहचानों में ढाला गया है। बाल सुरक्षा सेवाओं (ICPS) को बाल कल्याण सेवाओं के साथ मिलाकर 'मिशन वात्सल्य' के तहत 900 करोड़ रुपये आवंटित किये गए हैं, जो पिछले साल के परिव्यय रु. 1,500 करोड़ से काफ़ी काम है। छत्र आईसीडीएस कार्यक्रम को अब सक्षम आंगनवाड़ी नामक कार्यक्रम में समाहित किया गया है, जिसमें किशोरी लड़कियों के लिए योजना को भी शामिल किया गया है। इस कार्यक्रम के लिए कुल 20,105 करोड़ रु. आवंटित हैं, जो पिछले साल के 28,557 करोड़ के परिव्यय से काफी कम है। यह बजट सरकार के लिए एक सुनहरा अवसर था कि वह किसानों की मांग के अनुसार एमएसपी को कानूनी दर्जा देने की वित्तीय ज़रूरतों के लिए संसाधन उपलब्ध कराती, जिसे पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है। इसके विपरीत, कृषि के लिए उपलब्ध विभिन्न केंद्रीय क्षेत्र की योजनाओं और केंद्र प्रायोजित योजनाओं का कुल परिव्यय पिछले साल के मुक़ाबले 8.5% कम हो गया है, यानी रु. 1,34,399.77 करोड़ से घटकर रु. 1,23,017.57 करोड़। सार्वजनिक ज़मीन को इस साल के बजट में बलि का बकरा बनाया गया है। राजकोषीय घाटे को दूर करने का नाम पर सार्वजनिक ज़मीन की बिक्री में तेजी लाने के लिए एक विशेष प्रयोजन वाहन स्थापित किये जाने की पेशकश है। कहने की आवश्यकता नहीं कि भूमिहीन आबादी के प्रति सरकार के दायित्वों के लिए इसके गंभीर निहितार्थ हैं। पता नहीं अगला पड़ाव क्या होगा! भारतीय गणराज्य प्राइवेट लिमिटेड?


अनिन्दो बनर्जी 

(लेखक प्रैक्सिस नामक संस्था से जुड़े हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं।)   


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