विशेष : होली तेरे रूप अनेक,रमती सारे देश—विदेश - Live Aaryaavart

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शनिवार, 3 अप्रैल 2021

विशेष : होली तेरे रूप अनेक,रमती सारे देश—विदेश

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होली आनंद पर्व है। उमंग और उल्लास का पर्व है। यह आत्मा का हुलास पर्व है। अंतर्मन के प्रमुदित होने का पर्व है। होली प्रकटीकरण का पर्व है। इसमें छिपाव के लिए कोई जगह नहीं है। यह वैमनस्य मिटाने का पर्व है। पराया कोई नहीं है, सब अपने हैं, यह भाव जगाने का पर्व है। बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है। दुर्भावनाओं को मिटाने और सद्भावनाओं को अपनाने का पर्व है। होली मुक्त स्वच्छंद हास-परिहास का पर्व है। यह संपूर्ण भारत का मंगलोत्सव है। होली में कोई एक रंग नहीं रह जाता है। सभी रंग मिल जाते हैं और सबरंग हो जाता है। लिपे—पुते चेहरे में पहचान खत्म हो जाती है। होली का पर्व भले ही पहली बार भारत में मना हो लेकिन अब यह पूरी दुनिया में छा गई है लेकिन अलग नाम और अलग पहचान से। अब भारतवंशी दुनिया भर में रह रहे हैं। संभव है, वहां होली के प्रचलन का यह भी एक कारण हो लेकिन होली का मनाया जाना दुनिया भर में आनंद और उल्लास की प्रतिष्ठा तो है ही, इसे कौन नकारेगा?

  

होली  मनाने की अकेली वजह विष्णु भक्त प्रह्लाद का बच जाना और होली का जल जाना ही नहीं है। यह हिरण्यकश्यप के अहंकारों का भी दहन है। होली मनाने के एक नहीं,अनेक कारण हैं। इसी दिन भगवान शिव ने कामदेव को अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से जला दिया था लेकिन अपने विवाह वाले दिन यानी महाशिवरात्रि को उसे पुनर्जीवित भी कर दिया था। रति की पीड़ा उनसे बर्दाश्त नहीं हुई थी। फाल्गुन पूर्णिमा के दिन ही माता पार्वती का कैलाश आगमन हुआ था और उस दिन नंदी गणों नें, सप्त ऋषियों ने होली मनाई थी। कैलाश की उस होली में देव—दानव, यक्ष, किन्नर, गंधर्व , मनुज, सर्प सभी शामिल हुए थे। यह शायद धरती पर मनाई जाने वाली पहली होली थी जिसमें पूरी प्रकृति और प्राकृतिक जीव समान भाव से शामिल हुए थे। हिरण्यकश्यप का प्रसंग तो बहुत बाद का है। द्वापर में नारद जी के आग्रह पर धर्मराज युधिष्ठिर ने एक दिन सभी प्राणियों के उल्लास के लिए फाल्गुन पूर्णिमा पर सामूहिक उत्सव मनाने की परंपरा विकसित की थी। बालकृष्ण ने जब पूतना का वध किया था तब ग्वालों ने उसका पुतला जलाकर होली मनाई थी। नृत्य गायन किया था।  यह कहें कि होली मनाने के कारण जितने पौराणिक हैं, उतने ही सामाजिक,प्राकृतिक और वैेज्ञानिक भी हैं तो कदाचित गलत नहीं होगा।

  

होली के अवसर पर अगर हम प्रकृति की उन्मुक्तता के दर्शन करते हैं तो आम जन की उन्मुक्तता भी हमें उसी शिद्दत के साथ नजर आती है। भारत अपनी उत्सवधर्मिता के लिए जाना जाता है। उत्सव मनाने के बहाने तलाशता है। उन बहानों को आधारभूमि मिलती है पुराणों से, इतिहास से, कथा—कहानियों से लेकिन इसके मूल में तीन शब्द ही प्रमुख हैं। सत् चित् और आनंद। मनुष्य साकार ईश्वर की आराधना करे या निराकार ब्रह्म की, आनंद की अनुभूति ही उसका अभीष्ठ होती है। ईश्वर का अंश होने के नाते तमाम भटकावों के बावजूद उसकी व्याप्ति का केंद्र सत चित और आनंद ही रहता है। कथा गृह्य सूत्र  के एक सूत्र पर गौर करें तो होली पर्व मनाने के पीछे स्त्रियों के सौभाग्य की भावना ही प्रमुख होती है।'होला कर्म


विशेष: सौभाग्याय स्त्रीणां प्रातरनुष्ठीयते। तत्र होलाके राका देवता।' अर्थात होला एक विशेष कर्म है, जो स्त्रियों के सौभाग्य के लिए संपादित होता है। इसमें राका (पूर्ण चंंद्र) देवता हैं।

  

होली एक तरह का खेल भी है जिसमें जाने—अनजाने लोगों की रंग चिकित्सा हो जाती है। तरह—तरह के रंग होली खेलने वालों को मौसम जनित रोगों और विकारों से बचाने का भी काम करते हैं। होली भारत में प्रचलित 20 क्रीड़ाओं में एक मानी गई है। वात्स्यायन ने गाय की सींग से एक-दूसरे पर रंग और सुगंधित चूर्ण यानी अबीर-गुलाल डालने का जिक्र किया है। लिंगपुराण में फाल्गुन-पूर्णिमा को बाल क्रीड़ाओं से पूर्ण और ऐश्वर्यदायिनी बताया गया है। वराह पुराण में इसे पटवास-विलासिनी  अर्थात चूर्ण से युक्त क्रीड़ाओं वाली कहा गया है। वैदिक काल में  इसे  ‘नवान्नेष्टि’ कहा  जाता था।  खेत के अधपके अन्न का हवन कर उसे प्रसाद स्वरूप बांटा जाता था। इस पर्व को नवसंवत्सर का आगमन तथा बसंतागम के उपलक्ष्य में किया हुआ यज्ञ भी माना जाता है। कुछ लोग  इसे अग्निपूजन  मानते हैं। मनु का जन्म भी इसी दिन हुआ था। अत: इसे मन्वादि तिथि भी कहा जाता है।  फागुन शुक्ल पूर्णिमा को आर्य लोग जौ की बालियों की आहुति यज्ञ में देकर अग्निहोत्र का आरंभ करते हैं, कर्मकांड में इसे ‘यवग्रयण’यज्ञ का नाम दिया गया है। बसंत में सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में आ जाता है इसलिए होली के पर्व को ‘गवंतरांभ’भी कहा गया है। महाकवि वाणभट्ट के कादंबरी,भवभूति के मालती माधव में भी होली खेलने का जिक्र है। राजशेखर की काव्य-मीमांसा में मदनोत्सव पर झूला झूलने का भी उल्लेख मिलता है । ‘नारद पुराण’व ‘भविष्य पुराण’और अन्य ग्रंथों में भी इस पर्व का वर्णन है। सुप्रसिद्ध पर्यटक अलबरुनी ने भी ‘होलिकोत्सव’का वर्णन किया है।


मुगल काल में अकबर का जोधाबाई के साथ और जहांगीर का नूरजहां के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। राजस्थान के एक प्रसिद्ध शहर अलवर के संग्रहालय के एक चित्र में तो जहांगीर को नूरजहां के साथ होली खेलते हुए दर्शाया गया है। शाहजहां के जमाने में होली को‘ईद-ए-गुलाबी’कहा जाता था। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को होली पर उनके मंत्री रंग लगाया करते थे। मेवाड़ की चित्रकारी में महाराणा प्रताप अपने दरबारियों के साथ मगन होकर होली खेला करते थे। होली प्राचीन हिंदू त्योहारों में से एक है और इसके ऐसे प्रमाण मिले हैं कि ईसा मसीह के जन्म से कई सदियों पहले से होली का त्योहार मनाया जा रहा है। होली का वर्णन जैमिनि के पूर्वमीमांसा सूत्र और कथक गृह्य सूत्र में भी है। प्राचीन भारत के मंदिरों की दीवारों पर भी होली की मूर्तियां मिली हैं। विजयनगर की राजधानी हंपी में 16वीं सदी का एक मंदिर है। इस मंदिर में होली के कई दृश्य हैं जिसमें राजकुमार, राजकुमारी अपने दासों सहित एक दूसरे को रंग लगा रहे हैं।

   

होली भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में मनाया जाता है। यह और बात है कि उनके नाम और मनाने के स्वरूप में थोड़ा फर्क होता है। आस्ट्रेलिया में होली पर तरबूज ही तरबूज नजर आते हैं। पोलैंड में होली की तरह ही अर्सीना नामक त्यौहार मनाया जाता है। चेकोस्लोवाकिया में भी बलिया कनौसे नाम से यह  त्यौहार मनाया जाता है। जापान में लोग चेरी के फूल की पंखुडियों से सबका स्वागत करते हैं। इटली में बैटल आफ आरेंज फेस्ट मनाया जाता है तो स्पेन में टमाटर फेंककर लोग इसे ला टामाटीना पर्व के रूप में मनाते हैं। थाईलैंड में एक दूसरे पर ठंडा पानी डालकर सोंगक्रन नामक त्यौहार मनाया जाता है। दक्षिण कोरिया में अप्रैल में बोरीयोंग मड फेस्टिवल मनाया जा रहा है। इस महोत्सव की शुरुआत 1996 से हुई थी। म्यामांर में मेकांग के नाम से पानी का त्योहार मनाया जाता है। इसे थिंगयान भी कहा जाता है। सर्वप्रथम फ्लोरिडा के एक कॉलेज में कलर पार्टी मनाई गई। अब 'लाइफ इन कलर' नाम से कलर पार्टी मनाने का चलन पूरे विश्व में चल पड़ा है।

  

नृत्य और  गायन के साथ-साथ रंगों में डूबे हुए लोग अमेरिका के टेक्सास में कलर जाम  मनाते हैं। इस त्योहार में लोग जमकर नाचते और गाते हैं । केपटाउन में होली वन, स्पेन के इबिजा में होली गार्डेन फेस्टिवल के नाम से यह त्यौहार मनाया जाता है। मालवा में होली के दिन लोग एक दूसरे पर अंगारे फेंकते हैं। राजस्थान में होली पर नुक्कड़ नाटक या तमाशे होते हैं। बरसाने की लट/ठमार होली, काशी की श्मशान होली दुनिया भर में प्रसिद्ध है। मथुरा के कोसी शेरगढ़ मार्ग पर फालैन गांव  में एक अनूठी होली होती है। गांव का एक पंडा होली की धधकती आग में से निकल कर प्रह्लाद की याद को ताज़ा कर देता है। बिहार में होली खेलते समय सामान्य रूप से पुराने कपड़े पहने जाते हैं। मिथिला प्रदेश में होली खेलते समय लड़कों के झुंड में एक दूसरे का कुर्ता फाड़ देने की परंपरा है।  


नेपाल के काठमांडू में एक सप्ताह के लिए प्राचीन दरबार और नारायण हिटी दरबार में बांस का स्तम्भ गाड़ कर आधिकारिक रूप से होली के आगमन की सूचना दी जाती है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और मारीशस में भारतीय परंपरा के अनुरूप ही होली मनाई जाती है। कैरिबियाई देशों में भी सोल्लास होली का त्यौहार मनाया जाता है। भारत की तरह यहां भी होली को फगुआ ही कहते हैं।गुआना में होली के दिन राष्ट्रीय अवकाश रहता है। विशेष तरह के समारोह आयोजित होते हैं।  ट्रिनीडाड एंड टोबैगो में होली भारत जैसी ही मनाई जाती है। थाईलैंड में नव वर्ष सौंगकरन नामक पर्व से प्रारंभ होता है इसमें बुजुर्गों को इत्र मिश्रित जल डालकर आशीर्वाद लिया जाता है। लाओस में इस दिन लोग एक दूसरे पर पानी डालते हैं। म्यांमार में इसे जल पर्व कहा जाता है। यहां तिजान, मेकांग या थिंगयान नामक त्यौहार चार दिनों तक चलता है। इस दौरान सब एक दूसरे को पानी से भिगोते हैं। पेरू में पांच दिवसीय इरकान उत्सव होता है।  जर्मनी में घास का पुतला जलाकर लोग एक दूसरे पर रंग डालते हैं। हंगरी का ईस्टर होली के अनुरूप ही है। अफ्रीका में ओमेना वोंगा मनाया जाता है। पोलैंड में आर्सिना पर लोग एक दूसरे पर रंग और गुलाल मलते हैं। कंबोडिया में चाउन चानम थेमी और लाओस में पियामी के नाम से यह पर्व मनाया जाता है, जिसमें लोग एक दूसरे पर पानी डालते हैं। अमरीका में मेडफो नामक पर्व मनाने के लिए लोग नदी के किनारे एकत्र होते हैं और गोबर तथा कीचड़ से बने गोले एक दूसरे पर फेंकते हैं। अमरीका में इस दिन सूर्य पूजा की जाती है। इसे होबो कहते हैं। इसे होली जैसा ही मनाया जाता है।


हालैंड का कार्निवल और बेल्जियम की होली भारत सरीखी होती है और लोग इसे मूर्ख दिवस के रूप में मनाते हैं।  बेल्जियम में लोग पुराने जूतों की होली जलाते हैं। इटली में रेडिका त्योहार फरवरी के महीने में एक सप्ताह तक हर्षोल्लास से मनाया जाता है। रोम में इसे सेंटरनेविया कहते हैं तो यूनान में मेपोल। रोम में रेडिका पर्व पर मनाया जाता है। लकड़ियां एकत्र कर जलाई जाती हैं और फिर नाच गाना होता है। ग्रीस का लव ऐपल होली भी प्रसिद्ध है। स्पेन के वैलेशिया शहर में मार्च में आग की रात के नाम से पर्व मनाया जाता है जिसमें आतिशबाजी होती है। जापान में टेमोंजी ओकुरिबी नामक पर्व पर कई स्थानों पर आग जला कर यह त्योहार मनाया जाता है। साईबेरिया में घास फूस और लकड़ी से होलिका दहन जैसी परिपाटी देखने में आती है। नार्वे और स्वीडन में सेंट जान का पवित्र दिन होली की तरह से मनाया जाता है। शाम को किसी पहाड़ी पर लकड़ी जलाई जाती है और लोग आग के चारों ओर नाचते—गाते और  परिक्रमा करते हैं। मारीशस में बसंत पंचमी से शुरू होकर 40 दिन तक होली का आयोजन होता है। यहां भी कई जगह होलिका दहन होता है। इंग्लैंड में मार्च के अंतिम दिनों में लोग अपने मित्रों और संबंधियों को रंग भेंट करते हैं। न्यूजीलैंड में कई शहरों में रंगीला त्यौहार मनाया जाता है। यहां शरीर पर पेंटिंग प्रतियोगिता होती है। यह उत्सव 6 दिन तक चलता है। पापुआ न्यूगिनिया में लोग माउंट हेगन की तलहटी में पारंपरिक आदिवासी नृत्य करते हैं। नेपाल में लोला उत्सव आयोजित होता है। इसमें रंगीन पानी से भरे गुब्बारे को को लोग एक दूसरे पर फेंकते हैं। चीन में होली की तरह है ही 15 दिन का  च्वेजे पर्व  मनाया जाता है। लोग आग से खेलते हैं और सज धज कर परस्पर गले मिलते हैं। चीन के युवान प्रांत में मार्च-अप्रैल में पानी फेंकने का उत्सव मनाया जाता है। इस त्योहार को वहां बुद्ध का स्नान कहा जाता है। तिब्बती इस पर्व को रोमांचक अंदाज में मनाते हैं। जुलाई माह के पहले दस दिन में तिब्बतियों का स्नान पर्व मनाया जाता है। भारत में मुंबई की कम्युनिटी होली, शांतिनिकेतन, पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक होली, जयपुर की हाथी होली, उदयपुर की रॉयल होली, पुरुलिया,पश्चिम बंगाल की लोक होली, आनंदपुर साहिब, पंजाब की वॉरियर होली, दिल्लीकी म्यूजिकल होली देश भर में आकर्षण का केंद्र होती है। यह एक ऐसा त्यौहार है जो लोगों को एक दूसरे से जोड़ता है। इस बार कोरोना के चलते  इस त्यौहार की रंगत फींकी जरूर नजर आ रही है लेकिन तमाम बंदिशों के बावजूद लोग होली सेलिब्रेट करने में जुट गए हैं। आनंदित होने,हंसने—खिलखिलाने के इस पर्व के आनंद से कोई वंचित नहीं रहना चाहता लेकिन इस कोरोना काल में विवेक को आगे रखकर ही होली खेली जानी चाहिए। रंग में किसी भी तरह की भंग न पड़े, इस पर नजर रखने में ही सबका हित है। 






-सियाराम पांडेय 'शांत'-

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