बिहार : कॉमरेड अनिता सिंहा के पति प्रोफ़ेसर अरविन्द कुमार सिंह नहीं रहे - Live Aaryaavart

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गुरुवार, 13 मई 2021

बिहार : कॉमरेड अनिता सिंहा के पति प्रोफ़ेसर अरविन्द कुमार सिंह नहीं रहे

  • कॉमरेड शशि यादव का कहना है कि अनिता जी सच में आप के अन्दर बहुत हिम्मत हैं.हम सब आपके साथ हैं.अरविंद जी ऐसे चले जायेंगे विश्वास नहीं होता.ऐसे  साथी बिरले ही होते हैं.कॉमेड को लाल सलाम..

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पटना. कॉमरेड अनिता सिंहा लिखती हैं कि मेरे जीवन साथी आप व हमलोगों को ऐसे ही छोड़ कर चले जाएंगे, वह किसी ने नहीं सोचा था. लेकिन यह कटु सत्य है. आपके साथ बिताए हुए लम्हों में आपका सकारात्मक सोच, जीवन को शिद्दत से प्यार करना, नया समाज बनाने के लिए अनवरत कोशिश में लगे रहना, नौजवानों की तरह उर्जा एवं उत्साह आपके भीतर समाहित था.  कॉमरेड कहती हैं कि जितने दिन हमलोग साथ रहे आप हमेशा हर काम में हाथ बंटाए, वह चाहे घरेलू कामकाज हो, बच्चों को पालने की बात हो. आप हमेशा कहा करते थे कि ये सारी जिम्मेदारियां हम दोनों की है. और संगठन के काम को उन्होंने हमेशा सर्वोपरि रखा. पार्टी और क्रान्ति के प्रति कितने समर्पित थे आप.  जब हमारी शादी हुई उसके बाद आपने कहा हम दोनों पति-पत्नी के साथ कामरेड भी है और आप पार्टी में जितना शिद्दत से काम करेंगी हमारे और आपके बीच प्यार और ज्यादा प्रगाढ़ होगा. पूरी जिंदगी हर पल  , हर काम में साथ रहने वाले हमसफ़र को अंतिम विदाई! आपके अधूरे काम को अंतिम मंजिल तक पहुंचाएंगे! अंतिम लाल सलाम!!


सलाम प्रोफ़ेसर अरविन्द कुमार सिंह 

कॉमरेड विनोद कुमार कहते है कि हमारे आपके जिंदगी में कई ऐसे वरिष्ठों का दखल होता है जिनसे आपके होने और बनाने में बड़ी भूमिका होती है. आम जन के प्रति समर्पण भाव , नौजवान स्टूडेंट्स को दोस्त की तरह लेना, पढ़ना- पढ़ाना ,  उनको  जीवन के बेहतर बनानेवाले मूल्यों से लैस करने करने में बगैर किसी शोर शराबे और प्रचार से दूर रहकर काम करनेवालों में आप अरविन्द सर कभी रुखसत नहीं होंगे. हमलोग कॉलेज के दिनों में पेंटिंग, पोस्टर , नाटक सब में लगे रहते थे, जीने के के कायदे कानून सीखने की कोशिश करते रहते थे और इसमें कई बार कॉलेज की पढाई छूट जाती थी, ऐसे में आप ही तो थे जो कॉलेज से अलग रात - रात  भर जागकर पढ़ाई की भरपाई करा देते थे. और हम फिर दूसरे दिन नुक्कड़  प्रदर्शनियों, अख़बार में कला पर लिखने में लग जाते थे.  जीवन मूल्य , समाजवाद, साम्यवाद, पूंजीवाद पर घंटो आपसे सुनना फिर हमारे मतान्तर को भी उतनी ही तवज्जो देना.सुनने का महत्व  आपसे ही जाना था. कई बार जब सुदूर देहात में रहने वाले मेरे खेतिहर  विश्वनाथ  मामा भी जब आपका जिक्र करते तो समाज में काफी भीतर तक आपके पैठ का एहसास होता और आपके प्रति आदर भाव भी बढ़ जाता.  आपने हमेशा रचनात्मकता को बढ़ाया पर बहुत चुपके से सब हो गया सा लगता है. आपके होने से हमेशा एक अभिभावकत्व का एहसास रहा. आपके अब न रहने से भी वो एहसास कभी कम नहीं होगा.आपने जीवन में अपनी हर भूमिका का निर्वाह जो किया वो अनुकरणीय है. हालाँकि आपका अभी रहना जरुरी था सर. बस.

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