जब नील का दाग मिटा : बिहार के चंपारण में किसानों की दुर्दशा का लेखा-जोखा - Live Aaryaavart

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गुरुवार, 22 जुलाई 2021

जब नील का दाग मिटा : बिहार के चंपारण में किसानों की दुर्दशा का लेखा-जोखा

  • • जब नील का दाग मिटा: चंपारण 1917 अब स्टोरीटेल पर एक ऑडियोबुक के रूप में उपलब्ध है।
  • • सत्याग्रह, एक ऐसा आन्दोलन जिसका भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में ऐतिहासिक एवं  महत्वपूर्ण स्थान है।
  • • फेसबुक लाइव में लेखक पुष्यमित्र, सोपान जोशी एवं स्टोरीटेल  के पब्लिशिंग मैनेजर गिरिराज किराडू ने इस पुस्तक पर बात की।

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नई दिल्ली : महात्मा गांधी अंग्रेजों द्वारा किसानों पर किये जा रहे अत्याचारों से किसानों की मदद करने के इरादे से चंपारण गए थे। ब्रिटिश कानून के तहत किसानों को अपनी जमीन पर नील की खेती करने के लिए मजबूर किया जाता था और इसके लिए उन्हें बहुत कम भुगतान मिलता था। गांधी जी द्वारा जो कदम उठाए गये वह 'सत्याग्रह' के रूप में जाना गया। यह संघर्ष से आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में ऐतिहासिक रूप से एक महत्वपूर्ण विद्रोह रहा था। जब नील का दाग मिटा : चंपारण1917, लेखक पुष्यमित्र ने ऐसी घटनाओं, किसानों की दुर्दशा को चित्रित किया है, और कई लोगों के चेहरों का भी उल्लेख किया है, जिनका पहले शायद ही कहीं कोई उल्लेख हो,और सही अर्थों में असल में स्वतंत्रता सेनानी कौन थे, यह भी इस पुस्तक में आपको सुनने मिलता है । अब स्टोरीटेल पर इस ऐतिहासिक दस्तावेज को ऑडियोबुक के रूप  में सुन सकते हैं।


स्टोरीटेल  के पब्लिशिंग मैनेजर गिरिराज किराडू द्वारा होस्ट किए गए फेसबुक लाइव पर लेखक पुष्यमित्र ने कहा कि यह एक घटना के बारे में है जो लगभग एक सौ चार साल पहले हुई थी। बिहार सरकार ने 2017 में चंपारण सत्याग्रह की शताब्दी वर्ष मनाने का फैसला किया; पुष्यमित्र ने तब एक अखबार में काम करते हुए इस कहानी को बड़े पैमाने पर कवर किया। इसने उन्हें किसानों के विद्रोह की कहानी से रूबरू कराया। उन्होंने अपने फेसबुक पर घटनाओं के बारे में पोस्ट करके शुरुआत की, लेकिन बाद में राजकमल प्रकाशन से पूरी किताब प्रकाशित हुई। उन्होंने कहा कि उन्होंने इसे इतिहास की कहानी के रूप में लिखा है; पूरी घटना को तथ्यों के साथ एक कहानी के रूप में पेश किया है। यह शोध कहानी को कवर करते हुए उन्होंने  बिहार राज्य संग्रह के दस्तावेजों और उनके पहले के पत्रकारिता शोध को आधार बनाकर लिखा है। इंग्लैंड और यूरोप में नील रंग की भारी मांग थी; और इसलिए, नील की खेती  एक बड़ा व्यापार था; लेकिन भारतीय किसानों को इसकी भारी कीमत चुकानी होती थी, अंग्रेजों द्वारा किसानों खेतों पर जबरन खेती की जा रही थी। किसान अनाज उगाना चाहते थे क्योंकि उस क्षेत्र में लगातार अकाल पड़ता था, लेकिन अंग्रेज यह नही चाहते थे, जिसका किसानों ने विरोध किया।


पुष्यमित्र ने आज के भारत के उदाहरणों का हवाला देते हुए किसानों की आत्महत्या और उनकी दुर्दशा की जमीनी हकीकत की बात की। उन्होंने कहा कि  सत्याग्रह आन्दोलन के सौ साल बाद भी हमारे देश के किसान आज भी पीड़ित हैं। अतिथि के रूप में फेसबुक लाइव में लेखक सोपान जोशी  भी शामिल थे, उन्होंने कहा कि, भारत ने अपने पूरे इतिहास में विभिन्न राजाओं को देखा है, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि भूमि की पूरी संपत्ति राजा के पास हो। भारत के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि शासक ने किसानों को जबरन कुछ ऐसा उगाने को कहा ,जो केवल शासकों को लाभान्वित  करे। यह यूरोपीय विचार है जो अंग्रेजों के साथ आया था कि भूमि राजा की थी; और यदि किसी को देना हो, तो वह राजा द्वारा दिया जाएगा। उन्होंने आगे कहा, अंग्रेजों ने कभी भी किसानों से सीधे बात नहीं की, बल्कि उनके पास जागीरदार थे जो किसानों से निपटते थे, और इसलिए मालिक केवल वही उगाना चाहते थे जिससे उन्हें फायदा हो; उन्होंने किसानों के सामाजिक कल्याण की परवाह नहीं की। अंग्रेजों और भारत के वर्तमान परिदृश्य के बीच एक अंतर बताते हुए, सोपान ने कहा कि आज भी भारतीय किसान और राजसत्ता के बीच संघर्ष ज़ारी है! किसान आज भी राजसत्ता और पूँजीपतियों के बीच अपने वज़ूद की लड़ाई लड़ रहे हैं! 


टाइटल : जब नील का दाग मिटा : चंपारण 1917

लेखक : पुष्यमित्र

वाचक : प्रभाकर तिवारी

भाषा : हिंदी

केटेगरी :  इतिहास

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