बिहार : मोदी-शाह के फासीवादी राज के खिलाफ निर्णायक जनांदोलन : माले - Live Aaryaavart

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बुधवार, 28 जुलाई 2021

बिहार : मोदी-शाह के फासीवादी राज के खिलाफ निर्णायक जनांदोलन : माले

  • भाकपा-माले के पहले महासचिव काॅ. चारू मजूमदार शहादत दिवस पर राज्यव्यापी श्रद्धांजलि सभा का आयोजन

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पटना 28 जुलाई, भाकपा-माले के पहले महासचिव काॅ. चारू मजूमदार के 50 वें शहादत दिवस के मौके पर आज पटना स्थित राज्य कार्यालय, चितकोहरा, पटना सिटी सहित पूरे राज्य में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया. राज्य कार्यालय में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में पार्टी के वरिष्ठ नेता शामिल हुए. मुख्य रूप से पार्टी के राज्य सचिव कुणाल, पार्टी के पोलित ब्यूरो के सदस्य राजाराम सिंह, वरिष्ठ पार्टी नेता बृजबिहारी पांडेय, प्रो. संतोष कुमार, प्रो. भारती एस कुमार, मीना तिवारी, शिवसागर शर्मा, उमेश सिंह, कमलेश शर्मा, संतोष सहर, नवीन कुमार, सरोज चैबे, प्रदीप झा, पवन शर्मा सहित कई पार्टी नेता शामिल थे. श्रद्धांजलि सभा का संचालन वरिष्ठ पार्टी नेता राजाराम ने किया. चितकोहरा में पार्टी की वरिष्ठ नेता शशि यादव के नेतृत्व में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया. माले नेताओं ने कहा कि 28 जुलाई 2021 को कॉमरेड चारु मजूमदार की हिरासत में हत्या के 49 साल पूरे हो रहे हैं और भाकपा (माले) के पुनर्गठन के 47 साल पूरे हो रहे हैं। आज उस 70 के तूफानी दशक के करीब 50 साल पूरे होने वाले हैं जिसका अंत 1975 में आपातकाल लगाने से हुआ था। आज एक बार फिर राज्घ्य आपातकाल के दौर वाले दमनकारी चेहरे के साथ फिर से हाजिर है। यह उत्घ्पीड़न और क्रूरता के मामले में अंग्रेजों के शासन को भी मात दे रहा है।   इतना खुले आम दमन हो रहा है कि अदालतों को बार-बार आगाह करना पड़ रहा है कि मोदी सरकार का अंधाधुंध दमन संवैधानिक लोकतंत्र के ढांचे के खिलाफ है। दिल्घ्ली हाईकोर्ट ने लोकतंत्र में असहमति और विरोध के अधिकार के महत्घ्व को रेखांकित किया है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि आजादी के सात दशक बाद भी उसे गुलामी के समय के राजद्रोह कानून की जरूरत क्घ्यों है?


राजनीतिक कैदियों की रिहाई, अंग्रेजों के समय के राजद्रोह कानून और आजादी के बाद के यूएपीए जैसे खूंखार कानूनों को रद्द करने की मांग एक बार फिर लोकप्रिय विमर्श का हिस्घ्सा बन रही है। नागरिकता कानून में भेदभावपूर्ण संशोधन को वापस लेने, विनाशकारी कृषि कानूनों को रद्द करने, नये श्रम कानूनों को रद्द करने और श्रम अधिकारों की गारंटी करने, निजीकरण और मंहगाई पर रोक लगाने, मजदूरी बढ़ाने और रोजगार के अवसर पैदा करने, कोविड से हुई मौतों का मुआवजा देने, सबसे लिए शिक्षा व स्घ्वास्घ्थ्घ्य की गारंटी करने की मांगें इस समय की मूल लोकतांत्रिक मांगें हैं। मंत्रिमंडल में बदलाव करके मोदी सरकार जब अपने जंबो मंत्रिमंडल के साथ संसद के मानसून सत्र के लिए तैयार है तो विपक्षी पार्टियों विशेषकर संसद में मौजूद वामपंथी पार्टियों और सड़क पर चल रहे आंदोलनों को सरकार पर दबाव बढ़ाने के लिए और निर्णायक प्रतिरोध के लिए तैयारी करनी चाहिए। इन परिस्थितियों की मांग के अनुरूप पार्टी के सदस्घ्यों व कमेटियों को पूरी ऊर्जा के साथ खड़े होना होगा। यह लगातार दूसरा साल है जब हम कोविड-19 महामारी और इसके चलते लगे तमाम प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं। इस दौरान हमने अपने कई कॉमरेड खो दिए और कई अब भी कोविड की वजह से पैदा जटिलताओं का सामना कर रहे हैं। इसके चलते हमारी कई रोजमर्रा की गतिविधियों को कम करना पड़ा है और एकत्र होकर विरोध प्रदर्शन करने का तरीका भी थम सा गया है। इसके बावजूद हम डिजिटल और शारीरिक माध्घ्यमों को समन्वित करते हुए कई प्रभावशाली पहलकदमियां लेने में कामयाब रहे। महामारी की अवधि बढ़ती ही जा रही है और श्सामान्घ्य जीवनश् बहाल होने के बारे में अनिश्चिततायें भी बढ़ रही हैं। ऐसे में हमें अपने आंदोलन की पहुंच को बढ़ाने के लिए और भी रचनात्घ्मक तरीके सोचते रहने होंगे।

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