विशेष : ’बनवले रहिह सुहाग’ हे छठी मईया! - Live Aaryaavart

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रविवार, 7 नवंबर 2021

विशेष : ’बनवले रहिह सुहाग’ हे छठी मईया!

न कोई कर्मकांड, न कोई वैदिक विधि-विधान, घोषित-स्थापित मंत्रोच्चारण भी नहीं। मन-मिजाज व पवित्रता ऐसी कि अगर दउरा में पैर सटा, तो उठक-बैठक कीजिए। यदि हम हर रोज इतनी सफाई से रहें तो स्वच्छ भारत अभियान की जरुरत ही नहीं पड़ेगी। बिना किसी सरकारी सहायता के गांव-घरों में लोगबाग सड़क से लेकर घाटों तक की सफाई कर देते हैं। घर-आंगन की तो पूछिए मत। सबकुछ चकमक, सूरज की रोशनी की तरह। छठ पूजन में शास्त्रों से अलग यह जन सामान्य द्वारा अपने रीति-रिवाजों के रंगों में गढ़ी गई उपासना पद्धति है। इसके केंद्र में वेद, पुराण जैसे धर्मग्रंथ न होकर किसान और ग्रामीण जीवन है। छठ पर्व मूलतः महिलाओं का माना जाता है, जिन्‍हें पारम्‍परिक शब्‍दावली में ‘परबैतिन‘ कहा जाता है। पर छठ व्रत स्‍त्री-पुरूष दोनों ही रख सकते हैं    

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आरोग्य, सौभाग्य व संतान की खातिर भगवान भास्कर और ब्रह्मा की मानसपुत्री छठी मइया की आराधना की जाती है। व्रती कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन निर्जला व निराहार रहकर छठी मइया की पूजा करते हैं। कहते है प्रकृति के छठे अंश से षष्ठी माता उत्पन्न हुई हैं। उन्हें बालकों की रक्षा करने वाले भगवान विष्णु द्वारा रची माया भी माना जाता है। बालक के जन्म के छठे दिन भी षष्ठी मइया की पूजा की जाती है। ताकि बच्चे के ग्रह-गोचर शांत हो जाएं। एक अन्य कथानुसार, कार्तिकेय की शक्ति हैं षष्ठी देवी। षष्ठी देवी को देवसेना भी कहा जाता है। ज्योतिषियों की मानें तो सूर्य को अर्घ्य देने से व्यक्ति के इस जन्म के साथ किसी भी जन्म में किए गए पाप नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत से शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि हो जाती है।  मान्यता है कि नहाए-खाए से सप्तमी के पारण तक श्रद्धापूर्वक व्रत करने से न सिर्फ षष्ठी माता की कृपा बरसती है, बल्कि सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस पर्व को विधी-विधान के साथ करने से घर में लक्ष्मी का प्रवेश होता है। यही वजह है कि छठी मईया की उपासना से पहले साफ-सफाई और शुद्धता का खासा ख्याल रखा जाता है। इस पर्व में बनने वाले प्रसाद की शुद्धता का भी खासा ख्याल रखा जाता है। इस व्रत के लिए न विशेष धन की आवश्यकता है न पुरोहित, आचार्य और गुरु की। जरूरत पड़ती है तो पास-पड़ोस के साथ की, जो अपनी सेवा के लिए सहर्ष और कृतज्ञतापूर्वक प्रस्तुत रहता है। इस उत्सव के लिए जनता स्वयं अपने सामूहिक अभियान संगठित करती है। कहते हैं इस पूजा में हुई एक छोटी सी चूक उनकी पूरी मेहनत पर पानी फेर देती है। ऐसे में भक्त अपनी तरफ से देवी को खुश करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। 

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जिन घरों में यह पूजा होती है, वहां भक्तिगीत गाए जाते हैं। इस त्योहार को जितने मन से महिलाएं रखती हैं पुरुष भी पूरे जोश-ओ-खरोश से मनाते हैं और व्रत रखते हैं। नहाय-खाय के दिन से ही व्रतधारी जमीन पर सोते हैं। आत्म शुद्धि के लिए भक्त केवल अरवा खाते हैं यानी शुद्ध आहार लेते हैं। इसमें नमक नहीं खाने का भी अपना महत्व है। चर्म रोग में नमक का निषेध जरुरी बताया गया है। व्रत के दौरान दूध का प्रयोग पकवान बनाने में होता है और दूध व नमक में बैर बताया गया है। श्वेत कुष्ठ में भी नमक का कम प्रयोग की बात कहीं गयी है। ऐसा माना जाता है कि इसी वजह से व्रत में नमक का प्रयोग निषेध है। खरना में भी नमक वर्जित है। प्रसाद के रुप में पूड़ी, कहीं-कहीं सादी व घी लगी रोटी भी बनायी जाती है। साठी धान के चावल में गुड़ या शक्कर डालकर खीर बनायी जाती है। उसके साथ पूड़ी या रोटी का प्रसाद ग्रहण करते हैं। घर के सभी सदस्यों के प्रसाद लेने के बाद ही व्रती प्रसाद ग्रहण करते है और इसके बाद उनका 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरु होता हैं।  इस व्रत को भीख मांगकर करने में ज्यादा सफलता की बात कहीं गयी है। लेकिन अब मनौती के रुप में ही भीख का प्रचलन देखने को मिलता है। जो लोग छठ पूजा की सामाग्री खरीदने में असमर्थ होते हैं वे दूसरों से दान लेकर पूजन सामाग्री खरीदते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार छठ सूर्यवंशी राजाओं के मुख्यपर्वों में से एक माना जाता था। कहा जाता है कि एक समय मगध सम्राट जरासंध के एक पूर्वज को कुष्ठ रोग हो गया था। रोग से निजात पाने के लिए राज्य के ब्राह्मणों ने सूर्य देव की उपासना की थी। जिसके बाद राजा के पूर्वज को कुष्ठ रोग से छुटकारा मिल गया था। वर्षकृत्य के अनुसार, प्रियव्रत नामक एक राजा थे। उन्हें कोई संतान नहीं थी। ऋषि कश्यप की सलाह पर उन्होंने पुत्रसृष्ठि यज्ञ किया। यज्ञ के बाद उन्हें संतान की प्राप्ति तो हुई पर वह मृत पैदा हुआ। अपने मृत बालक को सीने से लगाए राजा एकटक आसमान की ओर देखते रहे। उनके सीने से मृत बालक को हटाने की हिम्मत किसी को नहीं हो रही थी। इसबीच आसमान से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं। यह और कोई नहीं षष्ठी देवी थी। उन्होंने राजा से कहा कि मैं बालकों की देवी हूं। मैं ब्रह्माजी की मानस पुत्री हूं। मेरे आशीर्वाद से निःसंतानों को भी संतानसुख मिलता है। इसके बाद राजा ने उनकी स्तुति की। उनके आशीर्वाद से राजा का मृत बालक जीवित हो उठा। छठी मइया ने राजा से कहा कि पृथ्वी पर ऐसी व्यवस्था हो कि सब उनकी पूजा करें। राजा की आज्ञा पर हर शुक्ल पंचमी को षष्ठी देवी की पूजा होने लगी। कार्तिक व चैत्र मास में भी छठ पूजा होने लगी। 

छठ व्रत से मिलता है फल

छठी पूजा करने से निःसंतान दंपत्तियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है। छठी मैया संतान की रक्षा करती हैं और उनके जीवन को खुशहाल रखती हैं। छठ पूजा करने से सैकड़ों यज्ञों के फल की प्राप्ति होती है। परिवार में सुख समृद्धि की प्राप्ति के लिए भी छठी मैया का व्रत किया जाता है। छठी मैया की पूजा से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। 


पांडवों को मिला आशीर्वाद

एक पौराणिक कथा के मुताबिक, जब पांडव अपना सारा राज-पाठ कौरवों से जुए में हार गए, तब दौपदी ने छठ व्रत किया था. इस व्रत से पांडवों को उनका पूरा राजपाठ वापस मिल गया था. छठ व्रत करने से परिवार में सुख समृद्धि बनी रहती है.


द्रौपदी ने की सूर्य देवता की उपासन

पांडवों की पत्नी द्रौपदी अपने परिवार के उत्तम स्वास्थ्य और लंबी उम्र के लिए नियमित तौर पर सूर्य पूजा किया करतीं थीं. कहा जाता है कि जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने सूर्य भगवान की आराधना की और छठ का व्रत रखा. सूर्य देव के आशीर्वाद से उनकी सारी मनोकामनाएं पूरी हुई.


राजा प्रियंवद को संतान की हुई प्राप्ति

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एक अन्य कथानुसार, राजा प्रियंवद जो निःसंतान थे. उन्हें तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराया. राजा ने रानी मालिनी को यज्ञ आहुति के लिए बनाई गई खीर प्रसाद के रूप में दी. जिसके प्रभाव से उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. लेकिन वह बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ.पुत्र वियोग में डूबे राजा प्रियंवद अपने मृत्य पुत्र के शरीर को लेकर श्मशान चले गए और अपने प्राण को त्यागने का प्रयास करने लगे. तभी भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई. उन्होंने प्रियंवद से कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण ही मैं षष्ठी कहलाती हूं. उन्होंने राजा से कहा कि हे राजन तुम मेरा पूजन करो और दूसरों को भी प्रेरित करो. राजा ने पुत्र इच्छा की भावना से सच्चे मन के साथ देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी. तब से लोग संतान प्राप्ति के लिए छठ पूजा का व्रत करते हैं.

स्वास्थ्य के लिहाज से भी है उत्तम है छठ 

बहुत कम लोगों तो पता होगा कि छठ का नाता केवल धर्म से नहीं बल्कि विज्ञान से भी है। छठ पर्व के वैज्ञानिक पहलू इस त्योहार का महत्व और बढ़ाते हैं। छठ पूजा का विधि-विधान व्रती के शरीर और मन को सौर ऊर्जा के अवशोषण के लिए तैयार करता है। छठ पूजा की इसी प्रक्रिया के जरिए प्राचीन भारत में ऋषि-मुनि कठोर तपस्या करने की ऊर्जा प्राप्त करते थे। षष्ठी तिथि (छठ) एक विशेष खगोलीय अवसर होता है। इस समय सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं। उसके संभावित कुप्रभावों से रक्षा करने का सामर्थ्य इस परंपरा में रहा है। डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने के दौरान इसकी रोशनी के प्रभाव में आने से कोई चर्म रोग नहीं होता और इंसान निरोगी रहता है। इस पूजन का वैज्ञानिक पक्ष ये है कि इससे सेहत से जुड़ी समस्याएं दूर होती हैं। या यूं कहें सूर्य की उपासना से हम अपनी ऊर्जा और स्वास्थ्य का स्तर बेहतर बनाए रख सकते हैं। दिवाली के बाद सूर्यदेव का ताप पृथ्वी पर कम पहुंचता है। इसलिए व्रत के साथ सूर्य के ताप के माध्यम से ऊर्जा का संचय किया जाता है, ताकि शरीर सर्दी में स्वस्थ रहे। इसके अलावा, सर्दी आने से शरीर में कई परिवर्तन भी होते हैं। खास तौर से पाचन तंत्र से संबंधित परिर्वतन. छठ पर्व का उपवास पाचन तंत्र के लिए लाभदायक होता है। इससे शरीर की आरोग्य क्षमता में वृद्धि होती है। छठ में दिए जाने वाले अर्घ्य का भी विशेष महत्व है. सुबह, दोपहर और शाम तीन समय सूर्य देव विशेष रूप से प्रभावी होते हैं, सुबह के वक्त सूर्य की आराधना से सेहत बेहतर होती है। छठी मैया को चढ़ने वाले प्रसाद भी सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं। गुड़ और आटे को मिलाकर ठेकुए का प्रसाद बनाया जाता है। छठ के साथ ही सर्दी की शुरुआत हो जाती है। गुड़ ठंड से बचने और सेहत को बेहतर रखने में मदद करता है। वहीं, डाभ नींबू कई मौसमी बीमारियों को दूर करता है। 


अर्घ्य 

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मां की पूजा के लिए हर तरह के पकवान बनाकर और सात तरह के फल बांस के डालों में भरकर नदी या तालाब के किनारे जाते हैं। यहां गन्ने का घर बनाकर दिया जलाते हैं और डूबते सूरज को अर्घ्य देते हैँ। ये अर्घ्य कमर तक पानी में खड़े होकर दिया जाता है। सूरज ढ़लने के बाद भक्त घर आते हैं और फिर जागरण होता है। सप्तमी के दिन ब्रह्म मूहूर्त में लोग फिर से नदी या तालाब के तट पर इकट्ठे होते हैं और फिर उगते हुए सूरज को अर्घ्य दिया जाता है। भक्त अंकुरित चने हाथ में लेकर षष्ठी व्रत की कथा कहते और सुनते हैं। कथा के बाद प्रसाद वितरण किया जाता है और फिर सभी अपने-अपने घर लौट आते हैं। व्रत करने वाले इस दिन परायण करते हैं। इसके महत्व का इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसमें किसी गलती के लिए कोई जगह नहीं होती। इसलिए शुद्धता और सफाई के साथ तन और मन से भी इस पर्व में जबरदस्त शुद्धता का ख्याल रखा जाता है। इस त्योहार को जितने मन से महिलाएं रखती हैं पुरुष भी पूरे जोशो-खरोश से इस त्योहार को मनाते हैं और व्रत रखते हैं। कहा जा सकता है छठ पर्व हमारी रीति-रिवाज ही नहीं हमारी सांस्कृतिक विविधता का बेजोड़ उदाहरण है। यूपी-बिहार में इस पर्व को लोग जिस निष्ठा, भक्ति व समर्पण के साथ करते रहे हैं वह और कहीं देखने को नहीं मिलता। लोग आज भी इसकी तैयारी में पूरी आस्था और समर्पण से जुटते हैं। अपने घर, गांव व समाज में आकर छठ करने पर कुछ अलग महसूस होता है। इस दिन कितनी ही व्यस्तता हो लोग छठ के मौके पर अपने घर जरूर पहुंचते है। खास बात यह है कि लोगों को अपनत्व के बंधन में भी यह पर्व बांधता है। बेटियां इस मौके पर अपने मायके आती है। इसी बहाने दामाद भी आते है। घर में आनंद, उत्साह व प्रेम का एक अलग माहौल दिखता है। लोगों की बढ़ती आस्था का ही उदाहरण है कि अब विदेशों में रहने वाले भारतवंशी भी छठ व्रत करने लगे हैं। 

षष्ठी के दिन ही मां गायत्री प्रकट हुईं 

छठ पर्व सूर्य की उपासना का पर्व है। वैसे भारत में सूर्य पूजा की परम्परा वैदिक काल से ही रही है। सूर्य अर्थात सविता की संचित शक्ति का रूप षष्ठी देवी हैं जिन्हें छठी मइया से संबोधित किया जाता है। सविता की शक्तियां ही सावित्री और गायत्री मां हैं, जिनसे जीवन की सृष्टि और पालन होता है। सावित्री के पश्चात जीवों के पालन हेतु षष्ठी के दिन ही मां गायत्री प्रकट हुईं। विश्वामित्र ऋषि के मुख से गायत्री मंत्र षष्ठी के दिन ही प्रष्फूटित हुआ था। 


पौराणिक मान्यताएं 

सूर्य की कठिन साधना और तप के इस पर्व में दुख और संकट के विनाश के लिए सूर्य का आह्वान किया जाता है। इस पर्व के संबंध में कई कहानियां प्रचलित हैं। एक कथा यह है कि लंका विजय के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे तो दीपावली मनाई गई। जब राम का राज्याभिषेक हुआ, तो राम और सीता ने सूर्य षष्ठी के दिन तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए सूर्य की उपासना की। एक प्रसंग यह भी है कि पाण्डवों का वनवास सफलपूर्वक कट जाय इसके लिए भगवान श्री कृष्ण ने कुंती को षष्ठी देवी के अनुष्ठान करने का परामर्श दिया था। शकुनि के प्रपंच से जब पाण्डवों ने अपना सब कुछ खो दिया था, तो धौम्य ऋषि ने द्रोपदी से षष्ठी देवी की पूजा करवायी थी। 


अब वैश्विक (ग्लोबल) पर्व बन गया है छठ  

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सूर्योपासना का पर्व छठ दरअसल प्रकृति की अनंत, अक्षय विराटता की उपासना है. कभी क्षेत्रीय स्तर पर मनाया जानेवाला यह लोकपर्व अब वैश्विक पहचान बनाने लगा है. यही नहीं पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानान्तरित भी हो रहा है. लेकिन, खास बात यह है कि ग्लोबल दुनिया में छठ की धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यताएं एवं स्थापनाएं पूर्ववत हैं और विरासत का विस्तार हो रहा है। इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं कि तमाम पर्व-त्योहारों ने अपनी मूल जड़ें खो दी हैं। पर छठ अभी भी अपने मूल स्वरूप में है। क्योंकि यह लोक पर्व है। इस पर्व में भगवान भास्कर की पूजा की जाती है। जो पूरी सृष्टि के जीवन दाता हैं। जैसे-जैसे बिहार और पूर्वाचल के लोग बाहर निकले वैसे-वैसे छठ ने विस्तृत फलक पर अपनी जगह बना ली और मुखर हो गया। देश के हिन्दी पंट्टी के राज्यों में ही नहीं अब विदेशों में भी छठ धूमधाम से मनाया जाता है। मेरे नजरिए से छठ अब वैश्विक (ग्लोबल) पर्व बन गया है। छठ पर सार्वजनिक अवकाश होना चाहिए। क्योंकि महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों की भी इसमें बराबर की हिस्सेदारी होती है। छठ के दौरान गीतों की परंपरा बहुत पुरानी है। ऋगवेद में भी इसका जिक्र मिलता है। छठ के दौरान निर्जला व्रत रखा जाता है। गीत पर्व की गरिमा को बढ़ाने का कार्य करते हैं। साथ ही गीतों की वजह से छठ व्रतियों में नीरसता और बोरियत नहीं आती है। गीत पर्व की महत्ता को भी बढ़ाते हैं। इससे जल प्रदूषण को भी समाप्त करने का अवसर मिलता है। छठ पूजा को महापर्व के नाम से अलंकृत किया जाता है। इसकी उपासना से आत्मिक उत्कर्ष के साथ परिवार के सुख सौभाग्य में वृद्ध होती है। कार्तिक मास में मनाया जानेवाला यह पर्व चार दिनों तक उल्लास पूर्वक मनाया जाता है। जिस तरह माता पार्वती कठोर तप करके शिव को प्राप्त किया, उसी तरह चार दिनों तक व्रती कठिन तपस्या के द्वारा अपने परिवार की सुख समृद्धि की कामना करते है। शक्ति व ऊर्जा के साक्षात प्रतीक सूर्य की आराधना का यह पर्व शारदीय छठ कहलाता है। इस पर्व को सभी आयु के लोग मनाते हैं। यह लोक आस्था का पर्व है। इस पर्व की विशेषता यह है की उगते सूरज ही नहीं डूबते हुए सूरज को भी उतनी ही श्रद्धा के साथ पूजा जाता है, क्योंकि सूरज तो सूरज है चाहे कुछ अंतराल के लिए डूब ही क्यों न जाये। डूबने के बाद उगने की शाश्वत करता है की डूबना अंत नहीं है। डूबना और उगना निरंतर चलने वाली अंतहीन प्रक्रिया है। इससे सामाजिक संदेश मिलता है की डूबते हुए का निरादर नहीं करना चाहिए, उसे भी उतना ही सम्मान मिलना चाहिए जितना उगते हुए को। यह महापर्व अमीरी-गरीबी का भेदभाव मिटाकर हमें समानता का पाठ पढ़ाता है। इससे आगे बिहारी अस्मिता और राजनीति का प्रतीक भी. इसका अपना एक अर्थशास्त्र भी है. जैसे दिवाली हिंदुस्तान की आर्थिक व्यापार और गतिशीलता को गति देते हैं, वैसे ही छठ बिहार के संवेदी सूचकांकों को ऊपर उठा देता है. इससे बाजार को गतिशीलता मिलती है। धार्मिक भावों से बाहर निकल कर देखें तो हिंदू पर्व - त्योहारों में सूर्योपासना की यह पहल सबसे प्राचीन परंपरा ठहरती है। तब जब भक्त और भगवान के बीच पंडे, पुजारी और धर्मगुरुओं का जन्म नहीं हुआ था। हिंदू धार्मिक रीति-रिवाजों में यह एकमात्र ऐसा हिंदू पर्व है, जिसकी पूजा-अर्चना एवं आराधना में किसी मध्यस्थ की जरुरत नहीं पड़ती है। भक्त अपने तरीके से भगवान सूर्य की उपासना करता है। उसे जो कुछ भेंट करता है, वह प्रकृति से ग्रहण कर प्रकृति को समर्पण है। अनुष्ठान के लिए कोई पुजारी धर्मगुरु नहीं होता, जिसके दक्षिणा और धन के बिना अनुष्ठान संभव नहीं। यह जनतांत्रिक पर्व है, जिसे सभी तबके के लोग एक ही श्रद्धाभाव से मनाते हैं। निचली जाति से लेकर तथाकथित ऊंची जाति के लोग एक ही तरह से मनाते हैं। इसे मनाने में कोई रोक टोक नहीं है। इसके लिए किसी मंदिर की जरुरत नहीं है, बल्कि नदी, तालाब, पोखर, आहर के किनारे या उसके जल के भीतर खड़े होकर उपासना की जा सकती है। 





--सुरेश गांधी--

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