विशेष : माफियाओं पर टिकी है कुनबे की सियासत - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 5 दिसंबर 2021

विशेष : माफियाओं पर टिकी है कुनबे की सियासत

 

  • यूपी में भले ही मौसम जाड़े का है, लेकिन चुनावी तपिश धीरे-धीरे तेज होती जा रही है। सत्ता हथियाने के लिए सियासी दलों में जुबानी जंग जिन्ना, दंगा, विकास के बाद अब बुलडोजर पर आ टिकी है। अखिलेश यादव कहते हैं कि जब हमारी सरकार आएगी तो बुलडोज़र वापस हो जाएगा। इसके पीछे उनका कहने का तात्पर्य क्या है यह तो वे ही जानें, लेकिन उनका यह पहला नारा नहीं है, इसके पहले भी जब वे चुनाव मैदान में थे तो सभाओं में खुलेआम कहते थे, सरकार बनी तो माफियाओं, दंगाईयों व आतंकवादियों के मुकदमें वापस होंगे। परिणाम यह हुआ सारे माफिया व अपराधी एकजुट होकर उनकी सरकार बनवा दी। लेकिन बड़ा सवाल तो यही है क्या सपा की बुनियाद ही माफियाओं, दंगा-फसाद करने वाले व आतंकवादी समर्थकों के साथ-साथ भ्रष्ट अफसरों व भ्रष्टाचरियों पर टिकी है? 


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फिरहाल, बुलडोजर वापस लेने की बात कहकर अखिलेश यादव ने इतना तो साफ कर ही दिया है कि जो अवैध कब्ज़ा करके बैठें माफियां और डॉन है, उनपर चले बुलडोज़र वापस होंगे। मतलब साफ है जो अपनी सरकार में माफिया और आतंकवादियों के पायलट बने रहे, उनकी योगी सरकार के माफिया विरोधी बुलडोजर हजम नहीं हो पा रहा है। हलांकि सपा का इससे पहले भी माफिया प्रेम जगजाहिर है। अगर उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य कहते है कि सपा से माफिया, गुंडों को निकाल दो तो बचेगा ही क्या, यह तो गुंडों की पार्टी है। उनकी बात में दम इसलिए है कि क्योंकि जब सपा सरकार में थी तो लुंगी छाप, जाली टोपी वालों से लेकर माफिया डॉ मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद व बाहुबलि विजय मिश्र की गुंडागर्दी चरम पर थी। इनके आतंक से चाहे व्यापारी हो या सच बया करने वाले पत्रकार रहे हो या समाजसेवी सबका जीना मुहाल था। जमीनों पर अवैध कब्जे, खनन बलातकार, चोरी-डकैती, हत्या, लूटपाट, अपहरण, फिरौती व दंगा करना तो इनकी खेती हो गयी थी। फर्जी मुकदमें तो इस कदर दर्ज होते थे कि आप सात समुन्दर पार हो तो भी हत्या, डकैती रंगदारी के मुकदमें दर्ज हो जाते थे। लेकिन जनता को जब मौका मिला तो सारी हेकडी एक झटके में भुलवा दी। 


योगी के सत्ता सभालते ही अपराधियों की शामत आ गई। जब उन्होंने अपनी अनोखी कार्यशैली से गुंडे-माफियाओं के गांव, गली और चौराहों पर उनकी करतूत की मुनादी करवानी शुरू करने के साथ-साथ बुलडोजर चलवाई तो माफियाओं की चूले हील गयी। बुलडोजर इस कदर दौड़ने लगा कि देखते ही देखते माफियाओं के करोडों-अरबों के आलीशान महल तास के पत्ते की तरह बिखरते चले गए। आजम खां जैसे भूमाफिया से लगायत डॉन मुख्तार अंसारी, अतीक, विजय मिश्रा तक न सिर्फ जेल में रहम की भीख मांग रहे है बल्कि उनके चेले चापड सब झटके में ही निपट गए। उनकी करोड़ों-अरबों की काली कमाई जब्त हो गयी। खास यह है कि जब ये सब हो रहा था तब इन माफियाओं के आका अखिलेश यादव भी शांत रहने में अपनी भलाई समझ रहे थे, अब चुनावी बेला में इनके मुकदमें वापस लेने की हुंकार भर रहे है। यह अलग बात है इसका जवाब योगी खुद दे रहे है। एक चुनावी समभा में योगी न कहा सपा शासन काल में आतंकियों के मुकदमे में वापस होते थे। हिंदूओं पर झूठे मुकदमे दर्ज होते थे। रामभक्तों पर गोलियां चलाई जाती थीं और आतंकियों की आरती उतारी जाती थी, खुलेआम दंगे कराएं जाते थे, लेकिन उन साजिशकर्ताओं एवं सफेदपोशों पर अब बुलडोजर चल रहा है।  यहां सपा काल के कुछ घटनाओं का जिक्र करना इसलिए जरुरी है कि बगैर इसके बात अधूरी होगी। इसमें मथुरा में जवाहरबाग प्रकरण की मिसाल भी है। तत्कालीन एसएसपी राकेश सिंह के कार्यालय से कुछ दूरी पर जवाहरबाग में अवैध कब्जा हो गया लेकिन उन्हें इसकी भनक तक नहीं लगी। पुलिस बल में आपसी तालमेल न होने की कीमत 2 जून को एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी और थानेदार संतोष यादव ने जान गवां कर चुकाई। पूरेप्रकरण में पुलिस प्रशासन की लापरवाही फौरी तौर पर नजर आ गई थी लेकिन सरकार सपा के एक शीर्ष नेता के करीबी होने की वजह से एसएसपी राकेश सिंह को हटाने की हिम्मत न जुटा सकी। जब चौतरफा दबाव बढ़ा तब घटना के चौथे दिन एसएसपी राकेश सिंह का केवल ट्रांसफर कर दिया गया। ये दो घटनाएं साफ कर देती हैं कि पुलिस व्यवस्था किस कदर राजनैतिक दबाव में जकड़ चुकी थी। इसी जकडऩ ने 20 करोड़ की जनसंख्या वाले देश के सबसे बड़े सूबे की पुलिस बल का इकबाल छीन लिया। सत्ता का संरक्षण पाए अपराधियों के हौसले इस कदर बुलंद थे कि प्रदेश के हर हिस्से में गुंडे-माफिया अपने मंसूबों को अंजाम देने के लिए पुलिस को ही निशानशाना बनाने से नहीं चूक रहे थे। प्रदेश में सपा सरकार के सत्ता संभालने के बाद से चार साल में पुलिस पर हमले के कुल 1,045 मामले थाने में दर्ज किए गए जो किसीभी शासनकाल का सर्वाधिक आंकड़ा है। 


नेता-अपराधी-पुलिस गठजोड़ 

उस वक्त हाइकोर्ट ने यूपी पुलिस को लेकर सबसे तल्ख टिप्पणी की थी। मामला सहारनपुर की एक लड़की के अपहरण और गैंगरेप सेजुड़ा था। अगस्त, 2014 की इस घटना पर पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही, क्योंकि आरोपी सत्ता पक्ष से जुड़े थे। बाद में कोर्ट के आदेश पर अधिकारियों ने कार्रवाई शुरू की। कोर्ट ने टिप्पणी की, ’’उत्तर प्रदेश में नेता, अपराधी और पुलिस गठजोड़ काम कर रहा है। समय रहते यह रवैया न सुधारा गया तो स्थितियां नियंत्रण से बाहर हो सकती हैं।“ पुलिस पर दबाव केवल राजनैतिक ही नहीं होता, बल्कि नौकरशाही भी अपनी मनमर्जी से इस बल का उपयोग करती है। लखनऊ के एसएसपी रहे राजेश पांडेय की गिनती भी एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के तौर पर होती है। लेकिन एक बड़े नौकरशाह के बेटे के रिसेप्शन में उपहार के तौर पर मिले 30 लाख रुपए के हार की चोरी राजेश पांडेय की लखनऊ से विदाई की वजह बन गई। दबाव में पुलिस ने किसी लिखा-पढ़ी के बगैर नौकरशाह के घर में तैनात दो नौकरों को हिरासत में रखा और उन्हें ही मुल्जिम बना दिया।  


माननीयों पर मेहरबानी

अपराधी प्रवृत्ति के नेताओं पर बिना किसी दबाव के मुकदमा दर्ज करने वाला पुलिस बल उस वक्त निरीह साबित होता है जब सरकार एक झटके में इनके मुकदमे वापस ले लेती है। जून, 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश देकर सांसद और विधायकों पर चल रहे मुकदमों को एक साल के भीतर फास्ट-ट्रैक-कोर्ट के जरिए निबटाने को कहा था। इसके उलट सपा सरकार ने अपने मंत्रियों महबूब अली, रघुराज प्रताप सिंह, विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह, ब्रहह्मा शंकर त्रिपाठी और नरेंद्र वर्मा पर दर्ज कई मुकदमे वापस ले लिए। इतना ही नहीं, विधायक अनूप गुप्ता, जगदंबा पटेल, मोहम्मद रिजवान जैसे विधायकों पर भी सपा सरकार मेहरबान रही। अपराध जगत से राजनीति में कदम रखने वाले माफिया मुख्तार अंसारी के खिलाफ 2010 में मऊ के दक्षिण टोला थाने में दर्ज मुकदमा में गवाही नहीं होने दी गयी और सत्ता के रसूख में कई गवाहों को छह इंच छोटा कर दिया गया। ऐसा इसलिए लिखना पड़ रहा है क्योंकि उस वक्त हर सपाई के जुबान पर यह शब्द था। 


विजय मिश्रा पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान रहा कुनबा 

भदोही के बाहुबली और सपा विधायक विजय मिश्र के खिलाफ एक मंत्री पर जानलेवा हमला कराने के पांच साल पुराने मुकदमे में कुल 84 गवाह थे, सबको खामोश कर दिया गया। इतना ही नहीं सौ से अधिक मुकदमें दर्ज होने के बाद भी जेल से बाहर आने का फरमान सुना दिया गया और जेल से बाहर आते ही न सिर्फ उसने बलातकार से लेकर हत्या व लूट की घटनाओं में बेतहासा वृद्धि कराया बल्कि कई मंत्री, विधायक व अन्य जनप्रतिनिधियों से सहित पत्रकारों पर फर्जी मुकदमें दर्ज कराकर उत्पीड़न कराया। उस वक्त के एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि सपा ’’सरकार ने एक खास रणनीति के तहत पुलिस के अभियोजन विभाग को खोखला कर रखा था ताकि अपने मनमाफिक काम लिया जा सके।“ 


आतंकी से मुकदमा वापस 

सपा सरकार ने गोरखपुर में 22 मई 2007 को हुए सिलसिलेवार विस्फोटों के आरोपी एवं आतंकी संगठन हूजी से कथित रूप से सबंध रखने वाले तारिक कासमी के खिलाफ दर्ज मुकदमा वापस ले लिया। श्रीराम जन्मभूमि पर आतंकी हमला करने वाले आतंकियों के मुकदमे वापस लेने का सबसे पहले काम किया था। गोरखपुर के साथ ही आजमगढ़ और वाराणसी रेंज की पुलिस के लिए चुनौती बन चुके माफिया धर्मेंद्र सिंह को एसटीएफ ने खोराबार इलाके में 20 मई को मार गिराया। 


मुक्त कराई जमीनों पर गरीबों के बनेंगे आवास

असल में राज्य में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद राज्य में माफिया के खिलाफ बड़ा अभियान शुरू किया गया। इसके तहत राज्य में माफिया के कब्जे से मुक्त जमीनों पर अब सरकारी कर्मचारियों और गरीबों के लिए आवास बनाने की तैयारी है। राज्य में सरकार ने माफिया के कब्जे से सरकारी और निजी जमीनों को मुक्त कराया है. वहीं प्रयागराज में इन जमीनों पर आवास बनाने की तैयारी शुरू हो गई है। राज्य के सीएम योगी ने दावा किया कि सरकार अब तक भूमाफिया के कब्जे से डेढ़ लाख एकड़ से अधिक जमीन मुक्त करा चुकी है। उन्होंने कहा कि इस जमीन पर कर्मचारियों, पत्रकारों और वकीलों के लिए सस्ते मकान बनाने की योजना है। 





-सुरेश गांधी-

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