विस्थापन-दिवस : जलावतनी का दर्द - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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मंगलवार, 18 जनवरी 2022

विस्थापन-दिवस : जलावतनी का दर्द

visthapan-day
हमारा देश धर्म-निरपेक्ष देश है। कितना है और कब से है, यह शोध का विषय है। मिलजुल कर रहना और एक दूसरे के सुख-दुःख में शामिल होना कौन नहीं चाहता? सभी समुदायों में, सभी धर्मावलम्बियों और सम्प्रदायों में सौमनस्य बढ़े और धार्मिक उन्माद घटे, आज की तारीख में समय की मांग यही है। मगर यह तभी सम्भव है जब सभी धर्मानुयायी ऐसा मन से चाहेंगे। लगभग ३२ वर्ष पूर्व कश्मीर में पंडितों के साथ जो अनाचार और तांडव हुआ उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। घाटी में उनके साथ रोंगटे खड़ी करने वाली जो बर्बरतापूर्ण घटनाएं हुईं, उन्हें कश्मीरी पंडित समाज अब तक भूला नहीं है। आज अधिकांश पंडित-समुदाय अपने ही देश में बेघर हुआ शरणार्थियों का जीवन व्यतीत कर रहा है।


बत्तीस साल की जलावतनी और वह भी अपने ही देश में! यानी लगभग तीन दशक से ऊपर! बच्चे जवान हो गए,जवान बुजुर्ग और बुजुर्गवार या तो हैं या फिर 'त्राहि-त्राहि' करते देवलोक सिधार गए।कैसी दुःखद/त्रासद स्थिति है कि नयी पीढ़ी के किशोरों-युवाओं को यह तक नहीं मालूम कि उनका जन्म कहाँ हुआ था?उनकी मातृभूमि कौन-सी है?बाप-दादाओं से उन्होंने जरूर सुना है कि मूलतः वे कश्मीरी हैं, मगर 1990 में वे बेघर हुए थे।सरकारें आईं और गईं मगर किसी भी सरकार ने उनको वापस घाटी में बसाने की मन से कोशिश नहीं की। की होती तो आज विस्थापित पंडित घाटी में लस-बस रहे होते। सरकारें जांच-आयोग तक गठित नहीं कर पाईं ताकि यह बात सामने आ सके कि इस देश-प्रेमी समुदाय पर जो अनाचार हुए,जो नृशंस हत्याएं हुईं या फिर जो जघन्य अपराध किए गए, उनके जिम्मेदार कौन हैं? दर-दर भटकने को मजबूर इस कौम ने अपनी राह खुद बनायी और खुद अपनी मंजिल तय की।लगभग तीन दशकों के निर्वासन ने इस पढ़ी-लिखी कौम को बहुत-कुछ सिखाया है।स्वावलम्बी,मजबूत और व्यवहार-कुशल बनाया है।जो जहां भी है,अपनी मेहनत और मिलनसारिता से उसने अपने लिए एक जगह बनायी है।बस,खेद इस बात का है कि एक ही जगह पर केंद्रित न होकर यह छितराई कौम अपनी सांस्कृतिक-धरोहर शनै:-शनै: खोती जा रही है।समय का एक पड़ाव ऐसा भी आएगा जब विस्थापन की पीड़ा से आक्रान्त/बदहाल यह जाति धीरे-धीरे अपनी पहचान और अस्मिता खो देगी।नामों-उपनामों को छोड़ इस जाति की अपनी कोई पहचान बाकी नहीं रहेगी। हर सरकार का ध्यान अपने वोटों पर रहता है। उसी के आधार पर वह प्राथमिकता से कार्य-योजनाओं पर अमल करती है और बड़े-बड़े निर्णय लेती है। पंडित-समुदाय उसका वोट-बैंक नहीं अपितु वोट पैदा करने का असरदार और भावोत्तेजक माध्यम है।अतः तवज्जो देने लायक भी नहीं है।





शिबन कृष्ण रैणा

अलवर

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