बिहार : डोंबारी दिवस पर बिहार में कई जगह प्रतिवाद - Live Aaryaavart

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सोमवार, 10 जनवरी 2022

बिहार : डोंबारी दिवस पर बिहार में कई जगह प्रतिवाद

पटना 10 जनवरी, 9 जनवरी को डोंबारी दिवस के अवसर पर भाकपा-माले की पहलकदमी पर हाल ही में राष्ट्रीय स्तर पर गठित आदिवासी संघर्ष मोर्चा के आह्वान पर बिहार में भी कई स्थानों पर आदिवासी समुदाय के अधिकारों पर काॅरपोरेट व आरएसएस के हमलों के खिलाफ प्रतिवाद दर्ज किया गया. बिहार के बंटवारे के बाद आदिवासी समुदाय का बड़ा हिस्सा झारखंड में चला गया; लेकिन पश्चिम चंपारण, कैमूर, जमुई, पूर्णिया आदि जिलों में आदिवासी समाज आज भी मौजूद है. इन जिलों में आदिवासी संघर्ष मोर्चा के बैनर तले प्रतिवाद दर्ज किए गए.


भाकपा-माले के बिहार राज्य सचिव कुणाल ने आदिवासी संघर्ष मोर्चा के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि कॉरपोरेट लूट व आदिवासियों की भूमि-छिनतइ के खिलाफ सभी आदिवासी क्षेत्रों में संविधान की 5वीं अनुसूची लागू करने; वन विभाग, पुलिस और सशस्त्र बलों के हाथों आदिवासियों पर हमले को समाप्त करने और वन अधिकार अधिनियम, 2006 को अक्षरशः लागू करने जैसे एजेंडों पर इस मोर्चा का गठन किया गया है. इसी आलोक में जल्द ही बिहार स्तर पर भी इस मोर्चा का गठन किया जाएगा. 9 जनवरी को डोंबारी दिवस के अवसर पर यह कार्यक्रम लागू हुआ. विदित हो कि 9 जनवरी 1900 को हजारों मुंडा समुदाय के आदिवासी तीर-धनुष और परंपरागत हथियारों के साथ उलगुलान नायक बिरसा मुंडा के नेतृत्व में अंग्रेजी राज के खात्मे के लिए झारखंड के डोम्बारी बुरू पहाड़ी पर इकट्ठा हुए थे. गुप्तचरों ने अंग्रेजी पुलिस तक मुंडाओं के इकट्ठा होने की खबर पहले ही पहुंचा दी थी. अंग्रेजों की पुलिस और सेना ने पहाड़ी को चारों ओर से घेर लिया. दोनों पक्ष में भयंकर युद्ध हुआ. हजारों की संख्या में आदिवासी बिरसा मुंडा के नेतृत्व में लड़े. अंग्रेज बंदूकें और तोप चला रहे थे और बिरसा मुंडा और उनके समर्थक तीर बरसा रहे थे. डोंबारी बुरू के इस युद्ध में न जाने कितने आदिवासी बेरहमी से मार दिये गये. सही आंकड़ा आज तक पता नहीं चल सका, लेकिन मोटे तौर पर यह आंकड़ा 400 के आसपास बताया जाता है. कहते हैं कि इस जनसंहार से डोंबारी पहाड़ी खून से रंग गयी थी. लाशें बिछ गयी थीं और शहीदों के खून से डोंबारी पहाड़ी के पास स्थित तजना नदी का पानी लाल हो गया था. इस युद्ध में अंग्रेज जीत तो गये, लेकिन विद्रोही बिरसा मुंडा उनके हाथ नहीं आए. जालियांवाला कांड से पहले वैसा ही कांड अंग्रेज रचा चुके थे.


आजादी के बाद के भारत में आज आदिवासियों को अपनी पहचान और अधिकारों पर सबसे बड़े हमले का सामना करना पड़ रहा है. कॉरपोरेटपरस्त सरकार की नीतियों ने आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन और प्राकृतिक संसाधनों की लूट की छूट कंपनियों को दे दी है. खदानों, बांधों, राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों आदि के नाम पर कॉरपोरेट कब्जा और विस्थापन आदिवासियों पर थोपा जा रहा है. पूरे मध्य भारत में तथाकथित विकास परियोजनाओं के नाम पर आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल कर दिया जा रहा है. दूसरी ओर, पूर्वोत्तर राज्यों में आदिवासियों को सशस्त्र बलों के हाथों अन्यायपूर्ण ‘विशेष सशस्त्र बल अधिनियम’ के दुरुपयोग का शिकार होना पड़ रहा है. सशस्त्र बलों के हाथों नागालैंड में 14 आदिवासियों का नरसंहार हाल का उदाहरण है. दक्षिण भारत में आदिवासियों को 5 वीं अनुसूची के संवैधानिक संरक्षण से वंचित रखा गया है. देश भर में जमींदारी और सूदखोरी आदिवासियों को गुलाम और लाचार बनाने वाले जुड़वां हथियार है. आदिवासियों को बुनियादी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक की पहुंच से वंचित रखा जाता है. किसी भी आदिवासी प्रतिरोध को विकास-विरोधी एवं राष्ट्रविरोधी कृत्य करार दिया जाता है और बर्बर दमन व सुनियोजित उत्पीड़न द्वारा कुचल दिया जाता है. इस आर्थिक बेदखली और राज्य दमन के साथ-साथ, आदिवासियों को तीखे सांस्कृतिक हमले का भी सामना करना पड़ रहा है. आरएसएस आदिवासियों को धार्मिक आधार पर विभाजित करने के लिए दिन-रात साजिश में लगा हुआ है. आज इन्हीं स्थितियों में आदिवासी समुदाय अपनी सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए चल रहे कॉर्पोरेट एवं सांप्रदायिक आक्रमण, जमींदारी और सूदखोरी के खिलाफ दृढ़ता से लड़ाई लड़ रहे हैं. आदिवासी संघर्ष मोर्चा बिरसा मुंडा के उलगुलान के इस खास दिन, डोंबारी संघर्ष दिवस के अवसर पर उत्पीड़न और कॉरपोरेट गुलामी के खिलाफ आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई तेज करने का संकल्प लेता है.

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