शीतला अष्टमी: बच्चों पर बरसेगी मां की कृपा, करेंगी रोगों से रक्षा - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 23 मार्च 2022

शीतला अष्टमी: बच्चों पर बरसेगी मां की कृपा, करेंगी रोगों से रक्षा

लोक माता के तौर पर पूजी जाने वाली शीतला माता की बखान जितना भी की जा कम है। प्राचीनकाल से ही इनका महत्व रहा है। इनके आगमन से लोग भयभीत भी रहते हैं तो विधि- विधान से की गयी पूजा से आर्शीवाद भी मिलता है। मूलतः ये बीमारियों की ही देवी मानी जाती हैं। मान्यता है कि शीतला माता बच्चों की सेहत की रक्षा करती हैं। साथ ही धन दौलत का अंबार भर देती हैं। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि यानी होली के आठवें दिन शीतला अष्टमी मनाया जाता है। इसे बसौड़ा के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि इस दिन माता शीतला को बासी भोजन का भोग लगाया जाता है। इस दिन माता का व्रत एवं पूजन किया जाता है। इस बार शीतला अष्टमी 25 मार्च, शुक्रवार को है। पूजा का समय सुबह 06ः20 बजे से लेकर शाम 06ः35 बजे तक है। कहते है शीतला माता को बासी भोजन अर्पित करने से वे प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों का कल्याण करती हैं और बच्चों की रोगों से रक्षा करती हैं। इस दिन बांसी भोजन करने से व्यक्ति हष्ट-पुष्ट बना रहता है, उसे किसी तरह के रोग या परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता है। माता शीतला स्वच्छता की देवी हैं। ये हमें पर्यावरण को साफ-सुथरा रखने की प्रेरणा देती हैं। इसलिए अपने आस-पास साफ-सफाई का पूरा ख्याल रखना चाहिए और संभव हो तो कोई एक पेड़-पौधा भी अवश्य लगाना चाहिए। इससे पर्यावरण में और आपके परिवार में भी शुद्धता बनी रहेगी  

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भारतीय भूमि को चमत्‍कार और इतिहास की धरती माना जाता है। यहां पर भक्‍त और भगवान के बीच आस्‍था और विश्‍वास का अनूठा बंधन देखने को मिलता है। उन्हीं में से एक है शीतला माता, जो देवी की तरह होती हैं। इनकी कृपा पाने के लिए हर ग्राम में इनके थान बने होते हैं जहां इनकी पूजा-अर्चना की जाती है। ऐसा ही एक माता शीतला एक स्थान है यूपी के मिर्जापुर के अदलपुरा में, जहां भक्त बारहों मास दर्शन के लिए उमड़ते है। गर्दभ यानी गधा माता की सवारी हैं। उनके हाथ में झाड़ू होती है। नीम के पत्तों को जेवर की तरह पहने होती हैं। उनके एक हाथ में शीतल यानी ठंडे जल का कलश भी होता है। माता साफ सफाई, स्वस्थ्य जीवन और शीतलता की प्रतीक हैं। माता को चेचक तथा कई रोगों की देवी भी कहा जाता हैं। शीतला-मंदिरों में प्रायः माता शीतला को गदर्भ पर ही आसीन दिखाया गया है। शीतला माता के संग, ज्वर का दैत्य, हैजे की देवी, चौंसठ रोग, घेंटुकर्ण- त्वचा-रोग के देवता एवं रक्तवती रक्त संक्रमण की देवी-देवता होते हैं। इनके कलश में विषाणु या शीतल स्वास्थ्यवर्धक एवं रोगाणु नाशक जल होता है। श्रद्धालुओं की माता शीतला के प्रति इस कदर आस्था है कि वे मंदिर परिसर के बाहर दिन-रात चादर बिछाकर रहते हैं, वहीं खाना बनाते हैं। तेज गर्मी की मार, गंदगी और दूसरी कठनाईयाँ भी आस्था के सामने छोटी पड़ जाती हैं। मंदिर में मां के दर्शन के लिए देश के कोने कोने श्रद्धालु आते है।  मा शीतला को पूर्वान्चल की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है। मां शीतला के र्दशन से माताओं को पुत्र की प्राप्ति होती हैं। नवरात्री में मां के दर्शन के लिए दिन भर मेले स नजारा मंदिर में दिखता है। इलाहबाद के कौशाम्बी में शीतला धाम कड़ा का अतीत बहुत ही गौरवशाली रहा है। 51 शक्तिपीठों में से एक मां कड़ा शीतला धाम मंदिर विराजमान है। उन्हीं का अंश मिर्जापुर के अदलपुरा में हैं। शीतला मां के कर यानी हाथ का पंजा के निशान मंदिर में गर्भगृह में आज भी मौजूद हैं। शीतला मां के मनोहारी रूप का दर्शन पाकर भक्त अपने आप को धन्य समझते है। मां के दर्शन के लिए भक्तों को काफी समय तक लाइन में खड़े रहना पड़ता है। घंटों लाइन में लगे रहने के बाद मां के दर्शन कर भक्तों की सारी थकान दूर हो जाती है। स्कंद पुराण में इनका जिस प्रकार से वर्णन किया गया है उसके अनुसार इन्हें स्वच्छता की देवी भी कहा जा सकता है। देहात के इलाकों में तो स्मालपोक्स (चेचक) को माता, मसानी, शीतला माता आदि नामों से जाना जाता है। मान्यता है कि शीतला माता के कोप से ही यह रोग पनपता है इसलिये इस रोग से मुक्ति के लिये आटा, चावल, नारियल, गुड़, घी आदि सीद्धा माता के नाम पर रोगी श्रद्धालुओं से रखवाया जाता है।


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वन्देऽहंशीतलांदेवीं रासभस्थांदिगम्बराम्।। मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम्।। ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र की रचना भगवान शंकर ने लोकहित में की थी। यह मंत्र शीतला देवी की महिमा गान करता है, साथ ही उनकी उपासना के लिए भक्तों को प्रेरित भी करता है। मान्यता है कि कौशाम्बी स्थित कड़ा धाम के गंगा नदी किनारे स्थित इस धाम में देवी सती का दाहिना कर यानी पंजा गिरा था। जो आज भी देवी शीतला की मूर्ति के सामने कुंड में मौजूद है। इस कुंड की विशेषता है कि इससे हर समय जल की धारा निकलती रहती है। कहा जाता है इस कुंड को जल या दूध से भरवाने पर भक्तों की सभी मनौती पूरी होती है। माता का यहीं अंश बहते हुए अदलपुरा में पहुंचा, जिसे भक्तों ने मंदिर में स्थापित किया। मां शीतला के र्दशन से माताओं को पुत्र की प्राप्ति होती हैं। नवरात्री में मां के दर्शन के लिए दिन भर मेले स नजारा मंदिर में दिखता है। कड़े धाम 51 शक्तिपीठों में से एक है। श्रावण अष्टमी, चैत्र नवरात्र और आश्विन नवरात्र के दौरान यहां श्रद्धालुओं की अपार भीड़ जुटती है। जो एक बार माता के दर्शन कर लेता है, वह बार-बार यहां आकर माता का आशीर्वाद लेना चाहता है। लोग यहां अपने बच्चों का मुंडन संस्कार कराने की मान्यता भी मानते हैं। सबसे खास बात यह है कि यहां के पंडों के पास भारत के किसी भी कोने में रहने वाले व्यक्ति के पूर्वजों के बाबत पूरी जानकारी रहती है। मां के मंदिर पहुंचने वाले भक्तों का मानना हैं कि मां शीतला के दर्शन करने मात्र से उनके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। मां के दर्शन का वह कोई भी मौका नहीं गवांना चाहते हैं। मां के दर्शन से पहले भक्त पवन पुत्र हनुमान जी व बाद में काल भैरव का दर्शन करना नहीं भूलते हैं।  अदलपुरा मंदिर के युवा पुजारी वसंत साहनी का कहना हैं कि पहले हनुमान जी व बाद में काल भैरव के दर्शन से ही मा शीतला भक्तों को मनावांछ्ति फल देती हैं।यहां आस्था से लवरेज धर्मपरायण जनता ही नहीं वरन सभी आयु वर्गों के लोग बच्चे, बूढ़े, जवान, नवविवाहित युगल, माता के दरबार में दर्शन करने आते हैं। सबसे ज्यादा भीड़ चैत मेले मे सोमवार और रविवार को होती है। इस दिन ढेड़ से दो लाख लोग यहां दर्शन करने आते हैं। इस मौके पर बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को परेशानी न आए इसका प्रशासन की ओर से खास ध्यान रखा जाता है। इस पवित्र स्थान पर लोग अपने बच्चों का मुंडन कराने भी दूर-दूर से आते हैं। जो लोग अपने बच्चों का मुंडन यहां आकर नहीं करा पाते वह भी बाद में यहां अपने बच्चों को माता के दर्शन कराने के लिए जरूर लेकर आते हैं। इसी तरह अपने बच्चों की शादी की मन्नत भी लोग यहा मांगते हैं। देवी शीतला माता की आराधना करने से पूरे परिवार की एकता बनी रहती हैं। साथ ही माता रानी सभी मुरादें भी पूरी करती हैं। श्रद्धालुओं को माता शीतला के प्रति बड़ी आस्था है। 


शीतला माता की कथा 

एक गावं था वहां एक बूढ़ी माता रहती थी। एक बार गांव में आग लग गई थी। पूरा गाव जल गया था। लेकिन बूढ़ी माता का घर बच गया था। सबने बूढ़ी माता को पूछा कि उनकी झोपड़ी कैसे बच गई। बूढ़ी माता ने बताया कि वह चौत्र कृष्ण अष्टमी को व्रत रखती हैं। शीतला माता की पूजा करती हैं। बासी ठंडी रोटी खाती हैं। इस दिन चूल्हे की आग नहीं जलाती हैं। यही वजह है कि शीतला माता ने आग से मेरी झोपड़ी बचा ली। तभी से पूरे गांव में शीतला माता की पूजा की जाने लगी। 


पौराणिक मान्यताएं 

पौराणिक कथानुसार दक्ष-यज्ञ विध्वंस के पश्चात् उन्मत्त शिव जब सती की पार्थिव देह को उठाकर हिमराज की पर्वत श्रृंखलाओं को पार करते हुए तीव्र गति से चले तो भगवान विष्णु ने जगत कल्याण के लिए अपने सुदर्शन चक्र से माता सती जी के मृत शरीर के टुकड़े कर गिरा दिये। जिन-जिन स्थानों पर माता सती के जो अंग गिरे उन स्थानों को उसी नाम से शक्ति पीठ के रूप में ख्याति मिली। इस स्थान पर मां के हाथ गिरे, इसलिए इस शक्ति पीठ का नाम कडा धाम पड़ा। उन्हीं का अंश अदलपुरा में हैं। शीतला माता षष्टी व्रत कथा के अनुसार एक समय की बात है, कि एक ब्राह्माण के सात बेटे थे. उन सभी का विवाह हो चुका था. परन्तु उसके किसी बेटे की कोई संतान नहीं थी। एक बार एक वृ्द्धा ने ब्राह्माणी को पुत्र-वधुओं से शीतला माता का षष्टी व्रत करने की सलाह दी। उस ब्राह्माणी ने श्रद्वापूर्वक व्रत कराया। व्रत के बाद एक वर्ष में ही उसकी पुत्रवधुओं को संतान कि प्राप्ति हुई। एक बार ब्राह्माणी ने व्रत में कही गई बातों का ध्यान न रखते हुए व्रत के दिन गर्म जल से स्नान कर लिया। व्रत के दिन भी ताजा भोजन खाया और व्रत के समय बताये गये विधि-नियमों का पालन नहीं किया। यही गलती ब्राह्मणी की बहुओं ने भी की। उसी रात ब्राह्माणी ने भयानक स्वप्न देखा। वह स्वप्न में जाग गई ब्राह्माणी ने देखा की उसके परिवार के सभी सदस्य मर चुके है। अपने परिवार के सदस्यों को देख कर वह शोक करने लगी, उसे पडोसियों ने बताया की भगवती शीतला माता के प्रकोप से हुआ है। यह सुन ब्राह्माणी का विलाप बढ गया। वह रोती हुई जंगल की ओर चलने लगी। जंगल में उसे एक बुढिया मिली। वह बुढिया अग्नि की ज्वाला में तडप रही थी। बुढिया ने बताया कि अग्नि की जलन को दूर करने के लिये उसे मिट्टी के बर्तन में दही लेकर लेप करने के लिये कहा। उससे उसकी ज्वाला शांत हो जायेगी और शरीर स्वस्थ हो जायेगा। यह सुनकर ब्राह्माणी को अपने किए पर बडा पश्चाताप हुआ। उसने माता से क्षमा मांगी और अपने परिवार को जीवत करने की विनती की। माता ने उसे दर्शन देकर मृ्तकों के दिर पर दही का लेप करने का आदेश दिया। ब्राह्माणी ने वैसा ही किया। उसके बाद उसके परिवार के सारे सदस्य जीवित हो उठे। उस दिन से इस व्रत को संतान की कामना के लिये किया जाता है।   


मां के व्रत से नहीं होती संक्रामक बीमारियां 

मान्यता है कि मां का व्रत चौत्र कृष्ण अष्टमी या चैत्र मासके प्रथम पक्ष में होली के बाद पडने वाले पहले सोमवार अथवा गुरुवार को किया जाता है। इस व्रत को करने से व्रती के कुल में दाहज्वर, पीतज्वर, विस्फोटक, दुर्गन्धयुक्त फोडे, नेत्रों के समस्त रोग, शीतला की फुंसियों के चिन्ह तथा शीतलाजनित दोष दूर हो जाते हैं। इस व्रत को करने से शीतला देवी प्रसन्‍न होती है। इस व्रत की विशेषता है कि इसमें शीतला देवी को भोग लगाने वाले सभी पदार्थ एक दिन पूर्व ही बना लिये जाते हैं अर्थात शीतला माता को एक दिन का बासी (शीतल) भोग लगाया जाता है। इसलिये लोक में यह व्रत बसौडा के नाम से भी प्रसिद्ध है। एक थाली में भात, रोटी, दही, चीनी, जलका गिलास, रोली, चावल, मूंगकी दाल का छिलका, हल्दी, धूपबत्ती तथा मोंठ, बाजरा आदि रखकर घरके सभी सदस्यों को स्पर्श कराकर शीतला माता के मन्दिर में चढाना चाहिये। इस दिन चौराहे पर भी जल चढाकर पूजन करने का विधान है। किसी वृद्ध को भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिये। इस व्रत को करने से उपवासक कि आयु तथा संतान की कामना पूरी होती है। कहीं-कहीं इस व्रत के दिन कुते की सेवा भी की जाती है तथा कुत्ते को टीका लगाकर उसे पकवान खिलाये जाते है। यह व्रत विशेष रुप से स्त्रियों के द्वारा किया जाता है। इस व्रत के दिन उपवास करने वाली स्त्रियों को गर्म जल से स्नान करने से बचना चाहिए। साथ ही इस दिन व्रत करने वाली स्त्रियों को गर्म भोजन करने से भी बचना चाहिए। शीतला मंदिर जाकर शीतला माता की पूजा करेंगे इसलिए उस दिन चूल्हा नहीं जलाने का रिवाज़ है और शीतला अष्टमी को वही बासी भोजन भोग लगाकर खाते हैं। शीतला माता अचानक सूर्य के ताप से बढ़ने वाली बीमारी को रोकती है और इसलिए माता को भोग लगाकर वहीं शीतल खाना खाना चाहिए। 


शीतला अष्टमी में शीतला माता की ऐसे पूजा करें-

- इस दिन से ठंडे पानी से स्नान शुरू होता है, क्योंकि सूर्य एक दम सीधे ऊपर आ जाने से गर्मी बढ़ जाती है। 

- इस दिन गंगाजल डालकर स्नान करें. नारंगी वस्त्र पहनें। 

- दोपहर 12 बजे शीतला मंदिर जाकर माता की पूजा करें। 

- माता को सुगंधित फूल, नीम के पत्तों और सुगंधित इत्र डालकर पूजा करें। 

- शीतला माता को ठंडे या बासी खाने का भोग लगाएं। 

- कपूर जलाकर आरती करें। 

- ॐ शीतला मात्रै नमः मंत्र का जाप करें। 


बासी खाने का महत्व-

- शीतला अष्टमी के दिन घर में ठंडा और बासी खाना खाया जाता है। इस दिन सुबह के समय घर में चूल्हा नहीं जलाते हैं। इस दिन थोड़ा नीम की पत्तियां भी खानी चाहिए।  

- इस दिन ठंडा बासी पुआ, पूरी, दाल भात, मिठाई का माता को भोग लगाकर खाया जाता है। 

- खाने से पहले भोजन दान भी करना चाहिए। 

अगर आपको किसी भी प्रकार का भय, रोग आदि बना रहता है तो इस सबसे छुटकारा पाने के लिये आज आपको शीतलाष्टक स्तोत्र में दिये माता शीतला के इस मंत्र का 21 बार जाप करना चाहिए। मंत्र इस प्रकार है-

वन्देैहं शीतलां देवीं सर्वरोग भय अपहाम्।

यामासाद्य निवर्तेत विस्फोटक भयं महत्।।

अगर आप अपनी नौकरी को लेकर कुछ परेशान हैं तो उस परेशानी से छुटकारा पाने के लिये आज आपको स्नान आदि के बाद शीतला चालीसा का पाठ करना चाहिए और पाठ करने के बाद देवी मां को पुष्प अर्पित करने चाहिए। आज शीतला चालीसा का केवल एक बार पाठ करने से ही आपको नौकरी में जो भी परेशानी आ रही हैं, उससे जल्द ही आपको छुटकारा मिलेगा। अगर आप अपनी दिन-दुगनी, रात-चौगनी तरक्की देखना चाहते हैं तो आज आपको शीतला माता के आगे घी का एक दीपक जलाना चाहिए और उनकी आरती का एक बार पाठ करना चाहिए। आज ऐसा करने से आपकी दिन-दुगनी, रात-चौगनी तरक्की होगी। अगर आप अपने जीवन में खुशियों की बौछार लाना चाहते हैं, तो आज आप अपने घर के आस-पास किसी मंदिर या किसी धर्मस्थल पर जाकर, वहां की साफ-सफाई करने में अपना सहयोग दें।आज ऐसा करने से आपके घर और जीवन में खुशियों की बौछार होती रहेगी।





--सुरेश गांधी--

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