बिहार : स्वाधीनता आंदोलन में किसानों-मज़दूरों को केंद्र में लाये स्वामी सहजानन्द सरस्वती - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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गुरुवार, 3 मार्च 2022

बिहार : स्वाधीनता आंदोलन में किसानों-मज़दूरों को केंद्र में लाये स्वामी सहजानन्द सरस्वती

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पटना, स्वामी सहजानन्द सरस्वती की 134 जयंती के अवसर पर  'श्री सीताराम आश्रम'  पर उनपर केंद्रित संग्रहालय का उद्घाटन किया गया।  स्वामी सहजानन्द सरस्वती के निजी उपयोग की सामग्रियों को 70 वर्षों में पहली बार सावर्जनिक रूप से प्रदर्शित किया था।  इसमें  उनका चश्मा, घड़ी, उस्तरा, बर्तन, गुटका आदि के साथ-साथ इसके अलावा स्वामी सहजानन्द की तस्वीरों की गैलरी भी  जिसमें सुभाषचन्द्र बोस सहित स्वाधीनता आंदोलन के अन्य नेताओं  व कार्यकर्ताओं के साथ की तस्वीरें प्रदर्शित की गई थी। श्री सीताराम आश्रम ट्रस्ट में पहली बार प्रदर्शित इन तस्वीरों के साथ साथ स्वामी सहजानन्द सरस्वती के आंदोलन के पर्चे खास तौर पर आकर्षण का विषय था।  इस संग्रहालय को देखने आसपास के गांवों के अलावा पटना से भी बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।  आगत अतिथियों  का स्वागत  श्री सीताराम आश्रम ट्रस्ट के सचिव डॉ सत्यजीत सिंह ने किया। उदघाटन वक्तव्य देते हुए पदमश्री सम्मानित  प्रख्यात गांधीवादी नेता रामजी प्रसाद सिंह ने कहा "   स्वतन्त्रता  आआन्दोलन में महत्वपूर्ण योगदान था। ऐसे लोगों के3ए बात उठाई जो पीछे पड़ गया था। आज मुझे बहुत खुशी हो रही है स्वामी सहजानन्द सरस्वती से जुड़ी सामग्रियों , किसान आन्दोलन  के इतिहास  को देखकर ।  यह ऐतिहासिक मौका है। मुझे सुभाषचन्द्र बॉस देखने का मौका मिला है। स्वामी जी उनके साथ थे।"


पूर्व सांसद रामेश्वर प्रसाद ने अपने संबोधन में कहा " स्वामी जी की यात्रा परिवर्तन की मिसाल है। वे सन्यासी से किसान सभा करते हुए कम्युनिस्ट आन्दोलन  तक आये। स्वतन्त्रता आंदोलन का पहला स्लोगन था कि मेहनत करने वालों को सत्ता मिले। किसान मज़दूर मेहनत करते हैं उनको सत्ता देने की बात किया करते थे। इस बात ने पूरे देश के किसान-मज़दूरों में जोश पैदा किया। अंग्रेजों के खिलाफ मुहिम बढ़ाया किया। अंग्रेजों, महाजनों, सेठों-साहूकारों से मुक्ति की बात की। उन्होंने अलग-अलग लड़ने की नहीं एक साथ लड़ने की बात की। किसान, मज़दूरों, छात्रों, नौजवानों हिदुस्तान के तमाम वर्गों को लड़ने का आह्वान किया। आज देश की सत्ता पर बैठने वाले जाति व धर्म के आधार पर बांटने की कोशिश कर रहेहैं। स्वामी जी को याद करने का मतलब ऐरफ फूल-माला चढ़ाना नहीं, उनके चिंतन को आगे बढ़ाने के जरूरत है।किसान कैसे लड़ते हैं इस स्वामी जी ने बताया था।" चर्चित साहित्यकार प्रेम कुमार मणि ने अपने संबोधन में कहा "  स्वामी जी कहा करते थे कि किसानों के बगैर आज़ादी के आन्दोलन के  कल्पना नहीं की जा सकती। किसान अंगेज़ों से ज्यादा जमींदारों से भयभीत रहा करते थे। स्वामी जी का ' मेरा जीवन संघर्ष' हम सबको पढ़ना चाहिए। कैसे कायाकल्प होता है एक सन्यासी का।  वे एक जातीय सभा मे जाते हैं फिर किसान सभा बनाते नहीं। कांग्रेस को वामपन्थी संगठन बनाने की सबसे अधिक प्रेरणा स्वामी जी से मिली। स्वामी जी का पत्राचार है अंबेडकर का। स्वामी जी, अंबेडकर और एस. एम जोशी ने मिलकर पूंजीवाद, और ब्राहमणवाद को अपना शत्रु बताया था। अंबेडकर ने कहा कि वे स्वामी जी के नजदीक महसूस करते थे। 1942 के  आन्दोलन  को सबसे अधिक प्रेरणा मिली थी। नारा लगता था  कि अंग्रेज राज खत्म हो, किसान राज कायम हो। स्वामी जी के आन्दोलन  में सभी तबकों के गीत थे। उनके गीतों में वास्तविक आज़ादी का स्वप्न पूरे हिंदुस्तान में फैला। आजादी के आंदोलन को गति मिली महात्मा गांधी के 1917 के बाद। उसी साल रूसी क्रांति हुई। गांधी व नेहरू दोनों कांग्रेस से निराश थे। गांधी ने आत्मकथा में कहा है कि  कांग्रेस ने ठगने का काम किया है। नेहरू उसे पिकिनिक पार्टी कहा करते थे। "  अवकाश प्राप्त प्रशासनिक पदाधिकारी उज्ज्वल चौधरी ने अपने संबोधन में कहा " हमें स्वामी जी के विचारों को आगे बढ़ाने के लिए एक रोडमैप बनाना चाहिए। आगे बढ़ने के लिए दिशानिर्देश  होने चाहिए।हमारे पाठ्यक्रम में स्वामी जी को जगह नहीं मिली है। नेशनल बुक ट्रस्ट, एन. सी.ई.आर.टी में उन्हें पढ़ाया जाना चाहिए।"


पटना कॉलेज के प्राचार्य रघुनन्दन शर्मा के अनुसार "  स्वामी जी   ने मार्क्स की प्रस्थापना बदली। स्वामी जी ने उन किसानों को अपना मुख्य आधार बनाया जिन्हें नकारा गया। लेकिन आप देखिए कि स्वामी जी ने किसानों को अपना बुनियाद बनाया। खाली विदेश पढ़े-लिखे लोगों  रूसी क्रांति भी कृषि पुत्रों द्वारा सम्पन्न किया गया। स्वाधीनता आंदोलन में गांधी की भूमिका अधिक रही या सुभाष चन्द्र बोस की। सुभाष बाबू की धारा से अंग्रेज़ डर कर भागे थे। सुभाष चन्द्र बोस जे नेतृत्व वाले आई.एन. ए वाले छब्बीस हजार लोग मारे गए। स्वतन्त्रता सिर्फ बिना खड्ग, बिना ढाल नहीं मिली है। अब गांवों में वैसे लोग खेती कर रहे हैं जो पहले मज़दूर थे। किसान खेती करने के बदले अपार्टमेंट में गेट पर चौकीदार  बना करते हैं। आज लोग दूध बेचकर दवा का इंतज़ाम करता है इस कारण पूरा समाज अनीमिया का शिकार हो गया है।" समारोह  को अनीश अंकुर,  कैलाशचंद्र झा व विश्वजीत कुमार ने भी संबोधित किया।संचालन युवा रँगकर्मी जयप्रकाश ने किया ।  अध्यक्षता पटना कॉलेज के पूर्व प्राचार्य व अर्थशास्त्री नवल किशोर चौधरी ने किया। सभा में बड़ी संख्या में विभिन्न गांवों, कस्बों व शहरों से लोग स्वामी सहजानन्द सरस्वती की 134 वीं वर्षगांठ के मौके पर मौजूद थे।  प्रमुख लोगों में  एटक के राज्य अध्यक्ष अजय कुमार,  केदारदास श्रम व समाज अध्ययन संस्थान अशोक कुमार सिन्हा,  इंजीनियर सुनील सिंह, कवि चन्द्रबिन्दु सिंह, अशोके गगन, अभिषेक, राकेश कुमुद, धनन्जय कुमार, रमाकान्त भगत, बिक्की निखिल आनन्द, अभिषेक कुमार, अमहरा गांव के पूर्व मुखिया आनन्द कुमार, भूषण शर्मा, राजकुमार शाही, योगेंद्र  सिंह, बिनेश कुमार सिंह,  प्रमोद कुमार, हरीश कुमार,  गोपाल शर्मा, महेश प्रसाद,   राहुल, बबलू, सर्वेश कुमार , लवकुश कुमार  , रामजीवन सिंह,  गोपाल शर्मा , अज कुमार आदि मौजूद थे।

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