चार धाम यात्रा करें, लेकिन गंदगी न फैलाएं : मोदी - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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सोमवार, 30 मई 2022

चार धाम यात्रा करें, लेकिन गंदगी न फैलाएं : मोदी

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नयी दिल्ली 29 मई, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तराखंड में चार धाम यात्रा कर रहे श्रद्धालुओं से यात्रा के दौरान साफ सफाई का ध्यान रखने का आग्रह करते हुए कहा है कि कुछ यात्री इन पवित्र तीर्थ स्थलों पर गंदगी फैला रहे हैं इसलिए सफाई पर ध्यान देकर अपनी आस्था को नया आयाम दें। श्री मोदी ने रविवार को रेडियो पर प्रसारित अपने मासिक कार्यक्रम ‘मन की बात’ की 89वीं कड़ी में श्रद्धालुओं से कहा कि लोग बड़ी संख्या में लोग ‘चार-धाम’ और खासकर केदारनाथ में हर दिन हजारों की संख्या में पहुँच रहे हैं और यात्रा के सुखद अनुभव भी बांट रहे हैं लेकिन कुछ यात्रियों द्वारा फैलाई जा रही गंदगी से कई लोग बहुत दुखी भी हैं। उन्होंने कहा,“हम, पवित्र यात्रा में जायें और वहां गन्दगी का ढ़ेर हो, ये ठीक नहीं। शिकायतों के बीच कई अच्छी तस्वीरें भी मिल रही हैं। कई श्रद्धालु ऐसे भी हैं जो बाबा केदार के धाम में दर्शन पूजन के साथ स्वच्छता की भी साधना कर रहे हैं। कोई अपने ठहरने के स्थान के पास सफाई कर रहा है तो कोई यात्रा मार्ग से कूड़ा-कचरा साफ कर रहा है।” उन्होंने कहा,“स्वच्छ भारत की अभियान टीम के साथ मिलकर कई संस्थाएँ और स्वयंसेवी संगठन भी वहां काम कर रहे हैं। हमारे यहाँ जैसे तीर्थ-यात्रा का महत्व होता है वैसे ही तीर्थ-सेवा का भी महत्व बताया गया है और मैं तो ये भी कहूँगा तीर्थ-सेवा के बिना तीर्थ यात्रा भी अधूरी है।” प्रधानमंत्री ने कहा कि देवभूमि उत्तराखंड में कई लोग स्वच्छता और सेवासाधना में लगे हुए हैं। उन्होंने रूद्रप्रयाग के मनोज बैंजवाल का ज़िक्र किया और कहै कि पिछले पच्चीस वर्षों से पर्यावरण की देख-रेख का बीड़ा उठाये है। स्वच्छता के साथ ही पवित्र स्थलों को प्लास्टिक मुक्त करने में भी जुटे हैं। इसी तरह से गुप्तकाशी के सुरेंद्र बगवाड़ी भी स्वच्छता को अपना जीवन मंत्र बनाये है। वह गुप्तकाशी में नियमित रूप से सफाई कार्यक्रम चलाते हैं और इस अभियान का नाम भी उन्होंने ‘मन की बात’ रख लिया है। ऐसे ही, देवर गाँव की चम्पादेवी पिछले तीन साल से अपने गाँव की महिलाओं को कूड़ा प्रबंधन सिखा रही हैं। चंपा ने सैकड़ों पेड़ भी लगाये हैं और अपने परिश्रम से एक हरा भरा वन तैयार कर दिया है। श्री मोदी ने कहा,“ऐसे ही लोगों के प्रयासों से देव भूमि और तीर्थों की वो दैवीय अनुभूति बनी हुई हैं जिसे अनुभव करने के लिए हम वहाँ जाते हैं, इस देवत्व और आध्यात्मिकता को बनाए रखने की जिम्मेदारी हमारी भी तो है।”

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