शिव व सिद्धि योग में मनेगी नाग पंचमी - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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सोमवार, 1 अगस्त 2022

शिव व सिद्धि योग में मनेगी नाग पंचमी

  • बरसेगी धन संपदा, मिलेगी आध्यात्मिक शक्ति, पूरी होगी मन्नतें 

ज्योतिष की मानें तो इस बार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र और शिव योग बन रहा है. यह एक अत्यंत मंगलकारी संयोग है. इस दिन भगवान भोलेनाथ और नागदेव की पूजा से मनोवांछित फलों की प्राप्ति हो सकती है. इस दिन नागों की पूजा करके आध्यात्मिक शक्ति, सिद्धियां और अपार धन की प्राप्ति की जा सकती है. अगर कुंडली में राहु-केतु की स्थिति ठीक ना हो तो भी इस दिन विशेष पूजा से लाभ पाया जा सकता है. सर्प के स्वप्न आते हों या सर्प से भय होता हो तो भी इस दिन नागों की पूजा का विशेष महत्व होता है. नागपंचमी पर बिना शिवजी की पूजा के कभी नागों की पूजा न करें. यानी नागों की स्वतंत्र पूजा करने से बचें. उनकी पूजा शिवजी के आभूषण के रूप में ही करें. जो लोग नागों की कृपा पाना चाहते हैं, उन्हें इस दिन न तो भूमि खोदनी चाहिए और न ही साग काटना चाहिए. चांदी के दो सर्प और एक स्वास्तिक बनवाएं. एक थाल में स्वास्तिक को रखकर पूजा करें. नागों को कच्चा दूध और स्वस्तिक को बेलपत्र अर्पित करें.  “ॐ नागेन्द्रहाराय नमः“ का जाप करें. इसके बाद नागों को शिवलिंग पर  अर्पित करें और स्वास्तिक को गले में धारण करें. 

nag-panchami
नाग पंचमी के दिन भगवान शिव के आभूषण नागों की पूजा की जाती है. यह दिन नाग देवता की पूजा के लिए समर्पित है। मान्यता है कि नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। पौराणिक काल से सर्प देवताओं की पूजन की परंपरा है। ऐसी मान्यता है कि नाग की पूजा करने से सांपों के कारण होने वाला किसी भी प्रकार का भय खत्म हो जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नाग पंचमी के दिन नाग देवताओं की आराधना करने से जातकों को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस बार 2 अगस्त को नाग पंचमी का पर्व मनाया जाएगा। नाग पंचमी तिथि की शुरुआत- 02 अगस्त सुबह 05 बजकर 13 मिनट से है और समाप्ति- 03 अगस्त सुबह 05 बजकर 41 मिनट तक है। जबकि शुभ मुहूर्त- 02 अगस्त सुबह 05 बजकर 43 मिनट से सुबह 08 बजकर 25 मिनट तक है। नाग पंचमी के दिन जिन नाग देवों का स्मरण कर पूजा की जाती है। उन नामों में अनंत, वासुकी, पद्म, महापद्म, तक्षक, कुलीर, कर्कट, शंख, कालिया और पिंगल प्रमुख हैं। इस दिन घर के दरवाजे पर सांप की 8 आकृतियां बनाने की परंपरा है। हल्दी, रोली, अक्षत और पुष्प चढ़ाकर सर्प देवता की पूजा करें। कच्छे दूध में घी और शक्कर मिलाकर नाग देव का स्मरण कर उन्हें अर्पित करें। इस दिन सवेरे-सवेरे स्नान करके भगवान शिव का स्मरण करें. पहले भगवान शिव का अभिषेक करें. उन्हें बेलपत्र और जल अर्पित करें. फिर शिवजी के गले में विराजमान नागों की पूजा करें. नागों को हल्दी, रोली, चावल और फूल अर्पित करें. इसके बाद चने, खील बताशे और कच्चा दूध अर्पित करें. घर के मुख्य द्वार पर गोबर, गेरू या मिट्टी से सर्प की आकृति बनाएं और इसकी पूजा करें. इसके बाद “ॐ कुरु कुल्ले फट स्वाहा“ का जाप करते हुए पूरे घर में जल छिड़कें. कहते है नागदेवता को दही, दूध, अक्षत, जल, पुष्प, नैवैद्य आदि अर्पित करने से वर्ष भर परिवार पर सर्प देवता व भगवान शिव की कृपा बनी रहती है।  पौराणिक कथा के अनुसार जनमेजय अर्जुन के पौत्र राजा परीक्षित के पुत्र थे। जब जनमेजय ने पिता की मृत्यु का कारण सर्पदंश जाना तो उसने बदला लेने के लिए सर्पसत्र नामक यज्ञ का आयोजन किया। नागों की रक्षा के लिए यज्ञ को ऋषि आस्तिक मुनि ने श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन रोक दिया और नागों की रक्षा की। इस कारण तक्षक नाग के बचने से नागों का वंश बच गया। आग के ताप से नाग को बचाने के लिए ऋषि ने उनपर कच्चा दूध डाल दिया था। तभी से नागपंचमी मनाई जाने लगी। वहीं नाग देवता को दूध चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई। वैसे भी हिंदू धर्म में नाग या सर्प पूजा का बहुत ही बड़ा महत्व है. मान्यता है कि इस दिन नाग देवता को दूध अर्पित करने के साथ दूध से स्नान कराने से पुण्य फलों की प्राप्ति होती है. इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर काल सर्प दोष से मुक्ति मिल सकती है। मान्यता है कि नाग देवता की पूजा करने से आपके घर की बुरी शक्तियों से रक्षा होती है. इस दिन सपेरों से किसी नाग को खरीदकर उन्हें मुक्त भी कराया जाता है. एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने सावन मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को कालिया नाग का वध किया था. इस तरह उन्होंने गोकुलवासियों की जान बचाई थी. तब से नाग पूजा का पर्व चला आ रहा है. हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार इन बारह नागों की पूजा का विशेष रूप से महत्व माना जाता है। इन नागों के नाम इस प्रकार हैं अनंत, वासुकी, शेष, पद्म, कम्बल, कर्कोटक, अश्वतर, धृतराष्ट्र, शङ्खपाल, कालिया, तक्षक और पिङ्गल नाग हैं। 


ॐ भुजंगेशाय विद्महे, सर्पराजाय धीमहि, तन्नो नागः प्रचोदयात्।।

’सर्वे नागाः प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथ्वीतले। ये च हेलिमरीचिस्था ये न्तरे दिवि संस्थिताः।। 

ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिनः। ये च वापीतडागेषु तेषु सर्वेषु वै नमः।।’ 


काशी में दंगल की परंपरा  तुलसीदास ने की थी शुरू

मान्यता है कि नागपंचमी पर्व पर काशी में दंगल की परंपरा की शुरूआत गोस्वामी तुलसीदास ने की थी। मुगलकाल काल में मुगलों से लोहा लेने और सनातन धर्म की रक्षा के लिए युवाओं को अखाड़े में उतार उन्हें बलशाली बनाया जाता था। काशी में युवाओं को बलशाली बनाने के लिए गोस्वामी तुलसीदास ने तुलसी घाट पर अखाड़ा स्वामीनाथ की खुद स्थापना की थी। इस अखाड़े से कई नामी गिरामी पहलवान निकले। काशी में अखाड़ों की समृद्ध परम्परा रही है। पंडाजी का अखाड़ा, राज मन्दिर अखाड़ा, अखाड़ा शकूर खलीफ़ा, औघड़नाथ तकिया अखाड़ा, बेनियाबाग स्थित रामसिंह अखाड़ा, जग्गू सेठ अखाड़ा, मुहल्ला बड़ागणेश अखाड़ा, बबुआ पाण्डेय अखाड़ा, अखाड़ा अशरफी सिंह-भदैनी, कल्लू कलीफा-मदनपुरा, इशुक मास्टर-मदनपुरा, शकूर मजीद, छत्तातले-दालमण्डी, मस्जिद में जिलानी, बचऊ चुड़िहारा-चेतगंज, गंगा-चेतगंज, वाहिद पहलवान-अर्दली बाज़ार, चुन्नी साव-राजघाट चुँगी ,रामकुंड अखाड़ा से पहलवान तैयार होते रहे हैं। इन अखाड़ों को बनाने का उद्देश्य रहा है युवाओं को बलशाली और चरित्रवान बनाना। नागपंचमी पर्व पर युवाओं के दमखम के प्रदर्शन को देख अन्य युवा भी बलशाली बनने के लिए प्रेरित होते हैं। 


शिव पूजा के समान है नागपंचमी पूजा 

नागपंचमी के व्रत का सीधा संबंध उस नागपूजा से भी है जो शेषनाग भगवान शंकर और भगवान विष्णु की सेवा में भी तत्पर हैं। इनकी पूजा से शिव और विष्णु पूजा के तुल्य फल मिलता है। नागजाति का वैदिक युग में बहुत लंबा इतिहास रहा है जो भारत से लेकर चीन तक फैला है। चीन में आज भी ड्रैगन यानी महानाग की पूजा होती है और उनका राष्ट्रीय चिन्ह भी यही ड्रैगन है। एक समय था जब नागलोक धरती से लेकर समुद्र तल तक फैला था। नाग जाति की रक्षा के लिए ब्रह्माजी ने मानव जाति को वरदान दिया था कि जो इस लोक में नाग पूजा करेगा या उनकी रक्षा करेगा उसको कालभय, अकालमृत्यु, विषजन्य, सर्पदोष या कालसर्प दोष और सर्पदंश का भय नहीं रहेगा। ब्रह्माजी ने यह वरदान मानवजाति को पंचमी के दिन दिया था। आस्तिक मुनि ने भी पंचमी को ही नागों की रक्षा की थी। तभी नागपंचमी की यह तिथि नागों को अत्यंत प्रिय है। 


काशी में होता है नागकूप के दर्शन 

नाग पंचमी की अनोखी मान्‍यताएं काशी में आज भी जीवंत हैं। यहां पर मान्‍यताओं और परंपराओं का मेला आज भी सजता है और शास्‍त्रार्थ से लेकर महुअर खेलने तक की परंपरा गुड़‍यिा पर्व पर जीवंत होती है। इस दिन महुअर, शास्त्रार्थ, नागकूप के दर्शन की मान्यता है। जैतपुरा स्थित नागकूप पर महर्षि पतंजलि ने तपस्या की थी। महर्षि पतंजलि के इस तपस्थली का उल्लेख स्कंद पुराण में है। महर्षि पतंजलि शेषावतार भी माने जाते हैं। नाग पंचमी पर हर साल उनकी जयंती इस स्थान पर मनाई जाती है। जयंती पर नागकुआं पर शास्त्रार्थ का आयोजन होता है। मान्यता है कि नाग पंचमी के दिन स्वयं महर्षि पतंजलि सर्प रूप में आते हैं और बगल में नागकूपेश्वर भगवान की परिक्रमा करते हैं। इसके बाद शास्त्रार्थ में बैठते हैं और शास्त्रार्थ में शामिल विद्वानों और बटुकों पर कृपा भी बरसाते हैं। इस अनादि परंपरा को जीवंत पर्व के दिन बनाया जाता है। नागकूप के बारे में कहा जाता है कि पाताल लोक जाने का रास्ता है। इस कूप के अंदर सात कूप है। इसी तरह पर्व पर महुअर खेल का प्रदर्शन होता है। शहर में कहीं-कहीं तीतर और बटेर पक्षी के दंगल भी आयोजित होते हैं। लेकिन ये परम्परा अब लुप्तप्राय है। दरअसल महअर एक खेल है जिसमें तंत्र मंत्र के साथ ही इसके असर को देखकर लोग दंग हो जाते हैं। तंत्र मंत्र और जादू टोने पर आपको यकीन न हो तो आप महुअर को देखकर यकीन करने लगेंगे। चारों ओर तंत्र मंत्र भूत भभूत का साया और एक दूसरे पर भस्‍म फेंककर जख्‍मी करने की ताकत को दिखाता यह प्रदर्शन आपको हैरतअंगेज नजारे पेश करता नजर आता है। एक दूसरे को संभालने की ताकीद देते हुए मंत्रों की मार से चोटिल लोगों को देखकर हैरान होती भीड़ का मनोरंजन ही दरअसल महुअर होता है। यह स्‍वांग तंत्र मंत्रों की डुप्‍लीकेसी और डद्म प्रहार को देखकर जनता खुश होती है और महुअर करने वालों (स्‍वांग धरकर नाटक करना) को इनाम भी देती है। शास्‍त्रार्थ परंपरा युगों पुरानी वैदिक कालीन परंपरा से जुड़ी है। महर्षि पतंजलि की जैतपुरा में नागकूप में स्‍थापना मानी जाती है। पतंजलि की परंपरा शास्‍त्रार्थ की रही है, इस लिहाज से नागकूप में परंपरा का मान रखते हुए प्रतिवर्ष परंपराओं का अनुपालन किया जाता है। प्रतिवर्ष इसका निर्वहन नागकूप क्षेत्र में आज भी किया जाता है। पाणिनि अष्टाध्यायी से विल्वार्चन तथा धातूपाठ भगवान नागेश्वर महादेव का होगा। इसके बाद व्याकरण वेदांत न्यायशास्त्र साहित्य और मीमांसा आदि शास्त्रों पर चर्चा होगी। 


चंदौली में एक-दूसरे पर फेंकते हैं पत्थर 

नागपंचमी के मौके पर चंदौली के बिसुपुर व महुआरीखास गांव के ग्रामीण एक-दूसरे पर पत्थरबाजी करेंगे। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा का बखूबी निर्वहन आज भी ग्रामीण कर रहे हैं। यह पत्थरबाजी तब तक होती है, जब तक की दोनों गांव में से किसी भी एक सिर से खून न निकलने लगे। इस दौरान बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात रहती है। किसी एक के भी सिर से खून निकलने तक होते रहती है पत्थरबाजी। हालांकि पूर्व में कई लोग चोटिल होते थे, लेकिन पुलिस की सक्रियता के कारण अब ग्रामीण महज परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। मान्यता है कि नागपंचमी पर दोनों गांवों के बीच पत्थरबाजी होने से महामारी का खतरा टल जाता है। इस परंपरा के निर्वहन में युवाओं के साथ बड़ी संख्या में गांव की महिलाएं व युवतियां भी शामिल होती हैं। इस परंपरा का निर्वहन करने के लिए बकायदे दोनों गांवों के युवक, युवती, महिलाएं नागपंचमी पर्व पर पूजन करने के बाद तैयारी में जुट जाते हैं। इसे देखने के लिए आसपास व दूरदराज के गांवों से बड़ी संख्या में ग्रामीण पहुंचते हैं। साथ ही कोई अप्रिय घटना न हो, इसे लेकर बड़ी संख्या में पुलिस, पीएसी के जवान मौके पर तैनात रहते हैं। नाग पंचमी के दिन सुबह दोनों बिसुपुर व महुआरीखास गांव की महिलाएं व पुरुष अपने -अपने गांव में सुबह मंदिरों व घरों में नागपंचमी पर्व पर पूजन-अर्चन के बाद झूले का आंनद लेते हैं। कजरी गीत के बाद शाम करीब चार बजे के बाद दोनों गांव के लोग दोनों गांवों के बीच स्थित नाले के दोनों किनारों पर इकट्ठा हो जाते हैं। दोनों गांव की महिला व पुरुष एक-दूसरे को गालीगलौज देना शुरू कर देते हैं। फिर शुरू होता है कंकड़-पत्थर फेंकने का दौर। यह तब तक चलता है जब तक दोनों तरफ से किसी एक के सर से खून न निकल जाए। पहले इस परंपरा के दौरान काफी लोग चोटिल हो जाते थे। वहीं सुरक्षा में लगे पुलिस कर्मी भी घायल हो जाते थे। लेकिन पुलिस प्रशासन की सक्रियता के वजह से सिर्फ दोनों गांवों में परंपराओं निर्वहन किया जाता है। ताकि दोनों गांवों में कोई अप्रिय घटना न हो सकें। 




--सुरेश गांधी --


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