गौरवशाली मिथिला के सांस्कृतिक धरोहरों की सरकारी उपेक्षा अन्यायपूर्ण : मनोज झा - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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गुरुवार, 10 नवंबर 2022

गौरवशाली मिथिला के सांस्कृतिक धरोहरों की सरकारी उपेक्षा अन्यायपूर्ण : मनोज झा

Manoj-jha
गौरवशाली मिथिला के सांस्कृतिक धरोहरों की सरकारी उपेक्षा को अन्यायपूर्ण बताते हुए मिथिला लोकतांत्रिक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोज झा ने कहा है कि मिथिला नगरी रामायण काल से ही जगत जननी जानकी की प्राकट्य स्थली और उसके बाद भगवान श्रीराम के ससुराल के रूप में प्रचलित है। शास्त्र-पुराण विदित है कि अयोध्या नरेश राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र प्रभु श्रीराम का विवाह मिथिला नगरी के राजा जनक की पुत्री जानकी सीता से हुई थी। तब से लेकर अब तक इस पुण्य भूमि पर राम-जानकी विवाहोत्सव बड़े धूमधाम से मनाए जाने की परंपरा कायम है। इस पावन मौके पर हर वर्ष अयोध्या से यहां बारात आती है जिसका विधिपूर्ण स्वागत किया जाता है। विदित है कि मिथिला नगरी अपनी विद्वता, बुद्धि व गुरु सम्मान के लिए विख्यात रही है। यहां के लोगों के लिए शिक्षा सबसे  महत्वपूर्ण है। मिथिला की विद्वता के बल पर ही साक्षात भगवान महादेव के प्रतिनिधि शंकराचार्य को शास्त्रार्थ में इस जगह पराजित होना पड़ा था। विश्व विख्यात महाकवि बाबा विद्यापति की विद्वता से प्रसन्न भगवान शिव ने स्वयं उगना बनकर अंत तक उनके साथ रहना स्वीकार किया था। जगत जननी जानकी की प्राकट्य स्थली मिथिला की पवित्र भूमि पर जितना पग चलेंगे उतना ही ऐतिहासिक, पुरातात्त्विक और धार्मिक महत्त्व के स्थल मिलेंगे, जिसकी पहचान सनातनी भी है। इन सबको चिन्हित कर पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित कर मिथिला क्षेत्र की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ किया जा सकता है। पर्यटनिक विकास होते ही मिथिला क्षेत्र में विकास की धारा को गति मिलेगी और मिथिला की सनातनी प्रतिष्ठा को स्थापित किया जा सकता है। अन्यायपूर्ण है कि क्षेत्र के पर्यटन केन्द्र के रुप में स्थापित होने वाले स्थल आज सरकारी उपेक्षा का शिकार होकर अपने हालात पर आंसू बहाने को मजबूर हैं। मिथिला लोकतांत्रिक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोज झा ने कहा कि मिथिला के अक्षर-ब्रह्म के उपासक लोगों की कीर्ति का अवलोकन करने आज भी मिथिला में  देश-विदेश से लोग आते हैं। मिथिला क्षेत्र की सुदृढ़ विद्वत परम्परा उनको इस जगह तक आने पर मजबूर करती है। अपने शोध के क्रम में कई विदेशी छात्र और शिक्षक कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय आ संस्कृत शोध संस्थान के पुस्तकालय से सहयोग लेते हैं। इस  हिसाब से मिथिला के इस विशिष्ट क्षेत्र को शैक्षणिक पर्यटन केन्द्र के रूप में भी विकसित किया जा सकता है।

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