कम फसल उत्पादकता के कारण स्थानीय भोजन की विविधता भी कम - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 16 दिसंबर 2022

कम फसल उत्पादकता के कारण स्थानीय भोजन की विविधता भी कम

Least-productivity
बाँसवाडा  जिले के सेरानगला आदिवासी गांवों की विशेषता है लहरदार स्थलाकृति , खंडित भूमि जोत, अनियमित वर्षा , मिट्टी का कटाव और कम फसल उत्पादकता .के कारण स्थानीय भोजन की विविधता भी कम हो गई है.  इन बाधाओं के बावजूद, आदिवासी महिला किसानों ने पोषण उद्यानों के माध्यम से पोषण से भरपूर विविध भोजन तक अपनी पहुंच बढ़ाई है. जैविक हरी और पत्तेदार सब्जियां, फलियां, कंद और पीले फल शामिल होते हैं . फसल रोपण कैलेंडर के अनुसार उगाई जाने वाली फसलों की विविधता को बढ़ाने के लिए वागधारा के सहजकर्ता कांता डामोर ने मार्गदशन  किए गए हैं.बताया कि गोबर, गोमूत्र, गुड़, दाल का आटा, मिट्टी और पानी के मिश्रण से किण्वन की एक अनूठी विधि द्वारा रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बजाय एक पारंपरिक जैविक खाद तैयार की जाती है जिसे जीवमृत ‘ कहा जाता है , इसका उपयोग जैविक उर्वरक और कीटनाशक के रूप में किया जाता है और किसानों को इसे तैयार करने के लिए प्रशिक्षित किया गया है. इसका एक उदाहरण मनीषा देवी रमणलाल डामोर हैं  गाव सेरानगला जो वागधारा गठित ग्रामविकास एवं बाल अधिकार समिती कि सदस्य हैं मनीषा अपने विगत दिनो के बारे बताती हैं कि मैं सेरानगला कि ग्राम विकास एवं बाल अधिकार समिति की सदस्या हु और हम गाव की समस्या पर हमारी समिती की मासिक बैठक होती हैं उसमे हम सब सभासद चर्चा और समस्या का निराकरण के बारे में कार्यवाही करने पर हम मंथन करते हैं, अपने गाव कि बाल अधिकार एवं ग्राम विकास समिती से जुडाव के सम्मिलित होने पर मनीषा बताती हैं कि 2019 में मेरे गाँव में समिती का गठन हुआ और मुझे वागधारा कि सहजकर्ता कांता डामोर ने समिती सदस्य होने का अनुरोध किया और फिर समय समय पर मुझे प्रशिक्षण दिया गया उसमे ग्राम विकास की योजना, एवं महीलाओ कि भागीदारी, पंचायतराज में महीला के अधिकार आदी के बारे में प्रशिक्षण में जानकारी मिली। फिर मैने मेरे गाव के पंचायत में सरकारी योजनाओं के तहत हँन्डपंप के लिए आवेदन किया और प्रस्ताव ग्रामपंचायत समक्ष प्रस्तुत किया फिर मुझे हँन्डपंप मंजुरी स्विकृत हूआ हँन्डपंप खुदवाने के बाद मेरे घर में पानी की सुविधा उपलब्ध हो गई और मैनै अपने घर में जैवीक पोषण वाटिका कि  मुझे खरीप मे वागधारा ने  बीज दिया था संस्था के माध्यम से मैने मिर्च टमाटर बेगन हलदी अद्रक अधिक खरीप मे लगाये अब मेरे रोज की सब्जी उपलब्ध होती है वह मे बाजार मे बेचती हू और अब मेरी पैसो कि जरुरत भी पुरी हो जाती हैं किचन गार्डेन से सप्ताह में 500-  1000रुपए की हो जाती है आमदनी छोटी जगह में शुरू हुई इस पोषण वाटिका से अब ये न केवल जैविक सब्जियां खा रही हैं बल्कि पास में लगने वाली हाट में बेचती भी हैं। आज ही कामे काफी बदलाव देख रही हू मे रोज पहले तो बाजार से सब्जी लाती थी और पैसे भी मेरे खर्च होते थे  और पैसे भी कमी थे अब रोज वाली सब्जी से मिर्च, टमाटर, बेगन अद्रक, बेचकर मे अपनी आजीविका सुधार लाई हु मैंने एक साल में 50000/- सब्जी बेची  हैं अभी मैने छोटीशी। किराना दुकान लगाई हैं जो मुझे मासिक 4000/- रूपये कि आय होती हैं मनीषा देवी जैसी आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र कि महीलाए बाजार के रासायनिक उर्वरकों से उत्पादित सब्जियों के बजाय वे स्वयं के द्वारा जैविक खाद से उत्पादित सब्जियों का प्रयोग कर बाजार में  रहे हैं, जिससे उनके सेहत में सुधार आया है,  आजिविका बढ़ कर संवर्धन पर्यावरण संरक्षण के प्रति भावनात्मक जुड़ाव भी हुआ है।

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