बिहार : नेताओं के मन से हार का डर खत्म हो चुका है, इसलिए नहीं हो रहा विकास - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 14 दिसंबर 2022

बिहार : नेताओं के मन से हार का डर खत्म हो चुका है, इसलिए नहीं हो रहा विकास

  • जन सुराज पदयात्रा के 74वें दिन ढाका में 

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ढाका, पूर्वी चंपारण, जन सुराज पदयात्रा के 74वें दिन की शुरुआत पूर्वी चंपारण जिले के ढाका प्रखंड के करमवा गांव स्थित जन सुराज पदयात्रा शिविर में सर्वधर्म प्रार्थना से हुई। इसके बाद पदयात्रा का हुजूम पंडरी पंचायत के कुसमहवा चौक से बरवा, चन्दनबारा, पंडरी, हरुहानी, सरठा से गुजर कर वापस ढाका प्रखंड के करमवा गांव में रात्रि विश्राम के लिए पहुंचा। प्रशांत अबतक पदयात्रा के माध्यम से लगभग 800 किमी से अधिक पैदल चल चुके हैं। इसमें 550 किमी से अधिक पश्चिम चंपारण में पदयात्रा हुई और पूर्वी चंपारण में अबतक 250 किमी से अधिक पैदल चल चुके हैं। इस दौरान जमीन पर हुए अनुभवों और समस्याओं पर बात करते हुए उन्होंने शिक्षा, कृषि, स्वास्थ जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी बात रख रहे हैं और लोगों की समस्याओं को सुन समझ कर उसका संकलन करते जा रहे हैं।


जनप्रतिनिधियों के मन से हार का डर खत्म इसलिए नहीं हो रहा है बिहार का विकास

जन सुराज पदयात्रा के दौरान पूर्वी चंपारण जिले के पंडरी पंचायत में प्रशांत किशोर ने जनसभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि बिहार में लोगों की समस्याओं का समाधान इसलिए नहीं हो रहा, क्योंकि जनप्रतिनिधियों के मन से हार का डर खत्म हो चुका है। उन्हें यह एहसास हो गया है कि बिना कुछ काम किए भी वे हर बार की तरह चुनाव जीत लेंगे। पदयात्रा का अनुभव साझा करते हुए प्रशांत किशोर ने बताया कि पदयात्रा के दौरान लोग उन्हें बता रहे हैं कि शिक्षा का कोई साधन नहीं है, हर सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार है, किसानों को खेतों को पानी नहीं मिल पा रहा है, उनके गली-सड़क की हालत खराब हैं इसके बावजूद जब आप लोग वोट देने जाते हैं तब ये सारी बातों को भुला कर जात-पात, धर्म, और लालू के जंगल राज या भाजपा को जीताने के लिए वोट करते हैं। 


10-15 हजार की नौकरी के लिए बिहार के युवा जानवरों सी जिंदगी जीने को मजबूर

बिहार के युवाओं की जिंदगी पर चिंता व्यक्त करते हुए प्रशांत किशोर ने कहा कि बिहार के युवाओं की जिंदगी जानवर जैसी हो गई है। वह मात्र 10-15 हजार के रोजगार के लिए दूसरे राज्य में जाकर मजदूरी करने को लेकर मजबूर हैं। बिहार के युवा देश के अन्य राज्यों के सबसे खराब हालातों वालीं बस्तियों में रहकर अपने जीवन गुजारा करके अपना और अपने परिवार का पेट पालन रहें हैं। इस व्यवस्था पर निराशा ज़ाहिर करते हुए प्रशांत किशोर ने कहा हमारे बच्चों को यहां के नेताओं ने बिहार को मजदूरों की फैक्ट्री बना कर रख दिया हैं।

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