विशेष : कृषि कार्य के लिए बाजार पर निर्भरता कम करने का समय - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 22 जनवरी 2023

विशेष : कृषि कार्य के लिए बाजार पर निर्भरता कम करने का समय

राजस्थान सरकार वर्ष 2023-24 का बजट प्रस्तुत करने की तैयारी कर रही है। सरकार से ऐसे स्वराजी बजट की अपेक्षा की जा सकती है, जिसमें आदिवासी क्षेत्र के किसानों की बाजार पर निर्भरता कम से कम हो तथा जो उनकी संप्रभुता, उनके पोषण की संप्रभुता एवं उनकी कृषि की संप्रभुता को मजबूत बनाए।

राजस्थान सरकार वर्ष 2023-24 का बजट प्रस्तुत करने की तैयारी कर रही है। सरकार से ऐसे स्वराजी बजट की अपेक्षा की जा सकती है, जिसमें आदिवासी क्षेत्र के किसानों की बाजार पर निर्भरता कम से कम हो तथा जो उनकी संप्रभुता, उनके पोषण की संप्रभुता एवं उनकी कृषि की संप्रभुता को मजबूत बनाए। यह सोचने की आवश्यकता है कि ऐसे क्या कारण रहे हैं, जिनसे हमारी कृषि की बाजार पर निर्भरता बढ़ गई है? असल में सरकार आदिवासियों की सहायता भी इस प्रकार कर रही है कि आदिवासी खेती के लिए पूर्णतया बाजार पर आश्रित हो गया है। खाद, बीज, दवाइयां सब कुछ बाजार से खरीदना पड़ रहा है। आदिवासी अपनी संप्रभुता बचाने के लिए देशी बीज का उत्पादन कर शुद्ध तथा पौष्टिक खानपान चाहते हैं। क्या इस बजट में ऐसी कृषि योजनाओं की घोषणा की जा सकती हैं, जो किसानों को व्यापक रूप से लाभ पहुंचा सकें? आदिवासी तथा ग्रामीण क्षेत्र में देसी गाय के गोबर को एकत्रित किया जाता है। सरकार को ऐसी योजना लानी चाहिए, जिसके तहत देसी गाय के गोबर से उन्नत खाद बनाने एवं उसमें फास्फोरस को मिलाते हुए उसे बाजार में बिकने वाले जैविक खाद के अनुरूप परिवर्तित करने के कार्य को प्रोत्साहित किया जाए। इस तरह की योजनाओं से किसान की उन्नत खाद को लेकर बाजार पर निर्भरता कम होगी।


वर्तमान में बाजार में सभी फसलों का इस तरह का संकर बीज आ गया है, जिसका पुन: उत्पादन नहीं किया जा सकता है। बीज संरक्षण की प्रथाओं के धीरे-धीरे लुप्त होने से किसानों के पास देसी बीज नहीं रहे। इसलिए किसान इन संकर बीजों का उपयोग करने के लिए मजबूर हंै। विगत वर्षों में स्थानीय बीजों की बहुत सी प्रजातियों का राज्य बीज निगम द्वारा उत्पादन सीमित अथवा बंद कर दिया गया है। इन बीजों के पुन: उत्पादन पर ध्यान दिया जाना चाहिए, जिससे किसान उन बीजों को पुन: संरक्षित कर उनका पुन: उपयोग कर सकें। इसका लाभ यह होगा कि रासायनिक खाद तथा कीटनाशक का भी कम से कम उपयोग हो सकेगा। किसानों को सहज रूप से देसी गोबर की खाद एवं स्थानीय बीज उपलब्ध हो जाएं, इसके लिए स्थानीय सहकारी समितियों पर इनकी उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है। आदिवासी क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों तथा तृतीय फसल (ग्रीष्मकालीन) के लिए उपयुक्त है। राज्य का करीब 13 प्रतिशत आदिवासी क्षेत्र का 80 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र तृतीय फसल के अनुरूप है। यहां पर यदि किसानों को जायद फसल के लिए स्थानीय बांध, तालाब तथा बड़ी परियोजनाओं का उपयोग करते हुए सीमित पानी भी उपलब्ध करवा दिया जाता है, तो आदिवासी क्षेत्र में मूंग तथा सब्जियों की खेती की जा सकती है। यह मृदा, पशु एवं इंसानों की पोषण आवश्यकताओं को पूर्ण करने में मददगार होगी और राज्य की फसल सघनता में व्यापक परिवर्तन करने में यह सफल कदम सिद्ध होगा। इसके साथ ही यह ग्रीष्मकालीन ऋतु में आदिवासी क्षेत्र से होने वाले पलायन को भी कम करने में मदद मिलेगी।


सिंचाई के साधनों की बात करें ,तो मुख्य रूप से केवल पम्प, स्प्रिंकलर या बिजली के कनेक्शन पर सब्सिडी का सहयोग है, परन्तु स्थानीय सिंचाई के लिए विभिन्न तरीके जैसे कुओं का गहरीकरण एवं पानी के संचयन की गतिविधियों को सम्मिलित करने के प्रावधान को इस बजट में जोड़ा जा सकता है। आदिवासी किसानों की कृषि जोत छोटी होती है तथा इसके अनुरूप 1-2 हॉर्स पावर के सोलर पंप पर भी अनुदान का प्रावधान करते हुए विशेष रूप से आदिवासी किसानों के लिए किसान हिस्सा राशि में छूट दी जाए। इसे व्यापक रूप से उपलब्ध करवाए जाने से क्षेत्र में बिजली की आपूर्ति में मदद मिल सकेगी एवं पर्यावरणीय संवेदनशील हरित ऊर्जा में एक उदाहरण बनेगा। आदिवासी क्षेत्र में होने वाले परंपरागत कृषि उत्पाद के कृषि प्रसंस्करण से संबंधित स्व रोजगार शुरू करने के लिए स्थानीय युवाओं को प्रेरित किया जाना चाहिए। इससे आदिवासी क्षेत्र में परंपरागत कृषि को बढ़ावा मिलेगा। सरकार को आदिवासियों की इन मांगों के साथ-साथ आगामी बजट में युवा किसानों को ध्यान में रख कर बजट तैयार करना चाहिए, जिससे आदिवासी समुदाय को लाभ मिल सके।




Jayesh-joshi

जयेश जोशी

कृषि मामलों के जानकार, 

सचिव और सीईओ, वाग्धारा

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