विशेष : राष्ट्र की अवधारणा - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शनिवार, 21 जनवरी 2023

विशेष : राष्ट्र की अवधारणा

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भारत के लोगों की अनेक विशेषताओं में से एक यह भी है कि यहाँ के लोगों की पहचान, मूल्य, व्यवस्था, जीवन दृष्टि, जीवनदर्शन आदि में अति प्राचीन समय से एक सातत्य बना हुआ है। इस मार्ग में बधाएं आई, कुछ लाई गई किन्तु उन बाधाओं को चीरकर, कभी उन्हे किनारे राह देते हुये, यह प्रवाह सतत आगे बढ़ता ही गया, जो सदियों पूर्व से चलकर अनवरत आज भी जारी है। अंग्रेज जब भारत आए, उन्होंने जब इस देश को देखा तो उन्हें यह समझ नहीं आया कि इतनी बड़ी देश, इतने प्रकार की पूजा-पाठ, रहन-सहन, खान-पान के तरीके की विभिन्नता, यानी प्रकार के विविधताओं से भरा कोई एक समाज कैसे हो सकता है? जब एक समाज नहीं हो सकता, तो कोई एक राष्ट्र कैसे हो सकता? इसीलिए, अंग्रेजों ने भारत के संदर्भ में कहा कि- “यह कोई राष्ट्र नहीं बल्कि भारत तो एक उपमहाद्वीप है।“ यह मात्र एक भौगोलिक उपमहाद्वीप है। इसमें अनेक प्रकार के लोग रहते हैं। यह अनेक प्रकार के लोग नहीं, बल्कि अनेक प्रकार के राष्ट्र हैं। इसीलिए भारतीय उपमहाद्वीप के बारे में इन पश्चिमी विद्वानो सहित अंग्रेज़ो का मानना था कि-“इंडिया मल्टीनेशनल कल्चर यानि भारत एक बहूराष्ट्र का देश है। इसी को और सृदृढ  करने के लिए अंग्रेजों ने एक सिद्धांत गढ़ा जो पूर्णत असत्य एवं कुटिल प्रचार का  कपोलकल्पित सिद्धांत था,वह सिद्धांत अब पूरी तरह से झूठ साबित हो चुकी है कि-“भारत में सिर्फ द्रविड और दलित ही मूलवासी हैं शेष बाहरी है। उन बाहरी लोगों में  ही आर्य, ग्रीक, शक, हूण, यूनानी, तुर्क, अरब, मंगोल आए और हम अंग्रेज भी आए यानी आर्य  से अंग्रेजों तक सब बाहर से ही आए हैं। 

ऐसी कुटिल इतिहास स्थापित करने का दुस्साहस भी किया। इतना भर से ही उन अंग्रेजों का दिल नहीं भरा बल्कि उसने कहा कि इस देश की तो अपनी कोई  पहचान ही नहीं है। अब यदि कोई पहचान बन गई है तो इसके तीन स्वरूप दिखाई देते हैं- पहला हिंदू- जो मूर्तिपूजक हैं, जो अपने आप को सनातनी कहते हैं, दूसरा- जो मध्यकाल में बर्बर इस्लामी आक्रांताओं के भय से मतांतरित होकर मुसलमान बने वह है। और तीसरा जो आर्य बाहर से आए थे, वह यहां के लोगों को गुलाम बनाए और वह द्रविड और दलित थे। इस तरह तीन प्रकार के निवासी का मनगढ़त सिद्धान्त यहां अंग्रेजो की कुटिलताओं का उपज मानी जाती है। इस कुटिल अंग्रेजों के अनुसार भारत एक राष्ट्र नहीं अपितु हिंदू-,मुसलमान’ और ‘द्रविड- दलितों’ का देश है। राष्ट्र के संदर्भ में स्वामी विवेकानंद ने कहा कि विश्व के राष्ट्रों के बीच भारत का विशेष जन्म लक्ष्य “धर्म” है। एक दशक बाद महर्षि अरविंद ने अपने उतरपाड़ा के विख्यात संबोधन में उसी को दोहराया। हिन्द स्वराज में गांधी जी ने कहा -“अंग्रेज़ो के आगमन के पूर्व ही भारत आसेतु हिमालय एक राष्ट्र है।“ 

स्वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद, महर्षि अरविंद जैसे महान हिंदुवादियों ने इसका प्रतिकार भी किया विशेषकर महर्षि अरविंद ने “फाउंडेशन ऑफ  इंडियन कल्चर” अंग्रेजों की इस कुंठित सिद्धांतों का भरपुर प्रतिकार उदाहरण सहित दिया है। लोकमान्य तिलक ने `गीता रहस्य` के माध्यम से तो, बिपिन चंद्र पाल हो या रविंद्र नाथ का साहित्य सहित उस वक्त ‘बंग-भंग आंदोलन’ में जितने भी साहित्य सृजित हुए, अंग्रेजों के इस कुटिल व्याख्या का भरपूर उत्तर भी दिया गया, कि भारत एक राष्ट्र है, प्राचीन राष्ट्र है, सनातन राष्ट्र है। राष्ट्र के विषय पर अंग्रेजों के आगमन के पश्चात जो बहस चली अनवरत बहस आज भी जारी है। जारी रहने का मूल कारण है कि, आजादी के पूर्व और बाद में भी अग्रेजों द्वारा स्थापित असत्य और कुटिलता से भरी वह परिभाषा को स्थापित करने का कुचक्र अनवरत चल रहा है कि भारत एक राष्ट्र नहीं बल्कि एक भूगोल है। भूगोल इसलिए है कि इस भूभाग में जो रहते हैं, उनमें कोई समानता नहीं है। इन समूह के अतिवादियों का मत है कि भारत वर्ष में इन अग्रेजों के आगमन के पूर्व राष्ट्र कि संकल्पना और तञ्जन्य राष्ट्र भाव नहीं था। ऐसा अतिवादी प्राचीन भारत के इतिहास कि ओर अज्ञ है या पूर्वग्रह के शिकार है या स्वार्थ तत्पर हठी सिद्धान्तवादी जो वामपंथी और सेमेटिक मतों के डीएनए. मे से ग्रसित है।   

यह वर्ग कितनी चालाकी से प्रारंभिक दौर में अनेक समूहों की विवेचना करते-करते, अंत में वह दो समूह पर इसे स्थापित करने की कुचेष्टा करते हैं। वह दो समूह एक हिंदू और दूसरा मुस्लिम है। यानी इस समूह के वितंडावादियों का बहु राष्ट्र की अवधारणा अंत में द्विराष्ट्र पर आकार रुक जाती है। इसी द्विराष्ट्र सिद्धान्त के आधार पर अंग्रेजों ने 1947 में भारत का विभाजन कर अपनी कुटिलता को साकार किया। बँटवारा होने के बावजूद स्वतंत्र भारत में एक ऐसी विचारधारा को स्वीकार किया जाता है जिसका नाम है- ‘सेकुलरिज्म’। पश्चिमी देशों में सेकुलरिज्म का अर्थ अलग है किंतु भारत में इसका अर्थ है- “भारत की सांस्कृतिक परंपरा और आक्रमणकारियों के माध्यम से आई हुई  विदेशी सांस्कृतिक परंपरा दोनों ही समान स्तर पर है। यह दोनों परंपरा जब मिलती है तब भारत की पहचान बनती है, इसीलिए यहां की मिली-जुली संस्कृति गंगा यमुना तहजीब की पहचान आदि-आदि बातें चली। 15 अगस्त 1947 को अग्रेजी सल्तनत से सत्ता हस्तांतरण के बाद भी इस वितण्डावाद से भारत को छुटकारा नहीं मिला। बल्कि उससे भी भयावह स्थिति का सामना भारत राष्ट्र को करना पड़ा। और इस तरह का अपप्रचार के लिए सता के सहयोग से चीन-रूस नियंत्रित वामपंथीयों ने किया। भारत की विचार प्रवाह में एक कलुषित धारा जो अंग्रेजों और साम्यवादियोंकि मिश्रित धारा है को और भी परिष्कृत कर, भारतीय चेतना को कुंठित किया गया। अपने जन्म काल से ही यह समूह भारत की संस्कृति पर कुठाराघात करता आया है, जो बदस्तूर आज भी जारी है।  

इसी वामपंथी समूह के एक तथाकथित विचारक थे ‘गंगाधर धर्माधिकारी’ उनका मानना था- कि- भारत एक बहू-राष्ट्र है। उन्होंने भाषा के आधार पर भारत को 17 राष्ट्र में विभक्त माना था। नेहरू- जिन्ना की जिद दायरे में भारत विभाजन की त्रासदी हिंदुओं ने झेला, इस विभाजन के पूर्व द्विराष्ट्र सिद्धांत का प्रमुख पैरोकार कोई था तो वह  इसी वामपंथी समूह का राजनीतिक नेतृत्व रहा था। हालांकि उस वक्त के राजनीतिक दल कांग्रेस ने विभाजन को तो स्वीकार किया ना किंतु द्विराष्ट्र सिद्धांत को उसने स्वीकार नहीं किया था। चुकी कांग्रेस अपने जन्म 28 दिसम्बर 1885 काल से ही द्वंद में जीता रहा है। इसके कार्य अलग होते हैं। इसका सिद्धान्त अलग है। कांग्रेस जो मानता है उसे स्वीकार नहीं करता और जो स्वीकार करता उसे मानता नहीं। इसी द्वंद में वह आज भी अपनी नैया पार करने की जद्दोजहद में है। किंतु कम्युनिस्ट पार्टी इस द्विराष्ट्र का  प्रबल समर्थक था यह समूह आज भी राष्ट्र कि अवधारणा को नकारते हुए भाषा, मत, पंथ, जाति जैसे लोकतंत्र विरोधी वैशाखी के सहारे समाज को बाँटने का वैचारिक व हिंसक दोनों रास्ते पर निर्लज्जता से आगे बढ़ समानता कि बात करता है। पश्चिमी देशों में जो राज्यों का अभ्युदय हुआ उसे बहुत बड़ा हाथ है भाषा का। वहां भाषा के आधार पर राज्यों का गठन हुआ है। 

भारत में एक ऐसा जमात सदा सक्रिय रहा, जो पश्चिमी अवधारणा की, भाषाओं के आधार पर राज्यों का सृजन हो। कम्युनिस्ट इसी अवधारणा का प्रबल समर्थक था। इसीलिए वह भारत को बहू राष्ट्र के चश्मे से देखता व प्रोपेगेंडा  फैला अपना उल्लू सीधा करने का प्रयास करता आया है। यह भारत के लिए दुर्भाग्य है कि आज भारत के किसी भी क्षेत्र में पृथक्ता की घिनौनी आवाज उठाई जाए, चाहे मजहब के आधार पर हो या भाषा के आधार पर हो बौद्धिक क्षेत्र के आधार पर हो, जाति के आधार पर हो, आपको इसके पीछे इन्हीं वामपंथी समूह का दबाव काम करता है। इसके तथाकथित अतिवादी हर शिक्षण संस्थान से लेकर महत्वपूर्ण स्थानों पर अपनी विष से युवा वर्ग को भ्रमित कर रहा है।जो आज भी बदस्तूर जारी है। वाम पंथी अतिवादियों के पीछे उसी गंगाधर धर्माधिकारी का बहुराष्ट्र सिद्धांत काम करता है। 

यह द्विराष्ट्र का जिन्न आज भी भारत में इन वामपंथियों की शह पर जिंदा है। उपमहाद्वीप का कपोल दलित कल्पना इन समूहों में आज भी जिंदा है कि भारत में एकात्मक राष्ट्र नहीं, द्वि राष्ट्र है ऐसे शक्तिया सतत्त कार्य कर रही है। इन शक्तियों के पीछे वैश्विक सेमेटिक विचार समूहों एवं इस समूह के विषधरों को पुरस्कृत कर भारत की, राष्ट्र की प्राचीन अवधारणा को, खंडित करने का कुचक्र अनवरत चल रहा है।  इन सिमेटिक मतों को अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए हर हाल में भारतीय चिंतन यानि सनातन चिंतन, सनातन संस्कार व सांस्कृतिक एवं सनातनी विचार प्रवाह को कठघरे में खड़ा करना हैं। इसके लिए यह वैश्विक जमात कुछ सनातनी रूपी भाड़े के टटूओं के सहारे इस दिशा में आगे बढ़ने का असफल प्रयास करता भी दिख रहा है। जो इस पवित्र भूमि को माता मानता है उसके लिए द्विराष्ट्र या उपमहाद्वीप जैसी भाषा एक चुनौती है। 

उनके अंतरआत्मा पर कुठाराघात है। क्योंकि ऐसे राष्ट्रवादीयों के लिए-‘ माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या: (अथर्ववेद 12.1.12) का भाव है। राष्ट्र और राष्ट्र में संजात जन- जन का पारस्परिक रिश्ता माता-पुत्र का है। सनातनी द्रष्टाओं की दृष्टि में राष्ट्र गुण केन्द्रित था भारत का वेदजन्य राष्ट्र नर केंद्रित न होकर सृष्टि केंद्रित रहा है। एकात्मक राष्ट्र की सनतनियों की,अवधारणा राष्ट्रवादियो की आत्मा में है। पश्चिमी साहित्य में राष्ट्र का अंग्रेजी के लिए नेशन शब्द है यह नेशन शब्द राष्ट्र से अलग है। पश्चिमी के नेशन शब्द राजनीतिक अराजकता को रोकने के लिए पश्चिमी  में इस शब्द का प्रयोग किया था। नेशन से अलग राष्ट्र की जो वैदिक अवधारणा है या यों कहें हिन्दू अवधारणा है ठीक उसी प्रकार जैसे धर्म को अग्रेजी शब्द का ‘रिलिजेन’ से जोड़कर हिन्दू चिन्तन में धर्म की व्याख्या को स्याह करने का दुश्चक्र के समान है। आजादी के उस अमृत काल में अंग्रेजो ओर अतिवादी वामपंथियों की कपोल कल्पनाओं की झंझावात से निकाल राष्ट्र की अवधारणा का हिन्दू चिन्तन ही एक भारत श्रेष्ठ भारत की कल्पना को साकार करता है। भारत एक सनातन राष्ट्र है, हिन्दू राष्ट्र है इसे सेमेटिक तत्वों के इन्द्रजाल से बाहर निकाल आज के युवा पीढ़ी के सामने सत्य को साझा करना हर हिन्दू का कर्तव्य है।  






—संजय कु.आज़ाद—

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