पीयूष मिश्रा का पहला उपन्यास छपते ही बना नंबर एक बेस्टसेलर - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा , झंडा ऊँचा रहे हमारा। देश की आज़ादी के 75 वर्ष पूरे होने पर सभी देशवासियों को अनेकानेक शुभकामनाएं व बधाई। 'लाइव आर्यावर्त' परिवार आज़ादी के उन तमाम वीर शहीदों और सेनानियों को कृतज्ञता पूर्ण श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए नमन करता है। आइए , मिल कर एक समृद्ध भारत के निर्माण में अपनी भूमिका निभाएं। भारत माता की जय। जय हिन्द।

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2023

पीयूष मिश्रा का पहला उपन्यास छपते ही बना नंबर एक बेस्टसेलर

  • · अमेजनडॉटइन पर सभी भाषाओं की सभी श्रेणियाँ की किताबों में पहले स्थान पर पहुंचा.
  • · एक हफ्ते में 'तुम्हारी औकात क्या है पीयूष मिश्रा' के तीन संस्करण प्रकाशित हुए.

Peeyush-mishra-novel
नई दिल्ली,16 फरवरी, चर्चित अभिनेता, गीतकार और नाटककार पीयूष मिश्रा का पहला उपन्यास  'तुम्हारी औकात क्या है पीयूष मिश्रा' प्रकाशित होते ही नंबर एक बेस्टसेलर बन गया है. पाठकों की तरफ से इस आत्मकथात्मक उपन्यास की इतनी माँग आ रही है कि अमेजनडॉटइन पर सभी भाषाओं की सभी श्रेणियों की किताबों में यह पहले स्थान पर पहुंच गया है. एक सप्ताह के अंदर 'तुम्हारी औकात क्या है पीयूष मिश्रा' के तीन संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं. 'तुम्हारी औकात क्या है पीयूष मिश्रा'  का प्रकाशन राजकमल प्रकाशन ने किया है. बीते मंगलवार चंडीगढ़ में आयोजित राजकमल किताब उत्सव में   इस किताब का लोकार्पण हुआ. राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने गुरुवार को बताया कि 'तुम्हारी औकात क्या है पीयूष मिश्रा' प्रकाशित होते ही पाठकों की पहली पसंद बन गई है. उनके मुताबिक, लोगों के बीच इस उपन्यास को लेकर असाधारण उत्साह है. इसका 3300 प्रतियों का पहला संस्करण बीते शुक्रवार (10 फरवरी) प्रकाशित हुआ था जो देखते-देखते समाप्त हो गया. बीते मंगलवार 5500 प्रतियों का दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ. दूसरा संस्करण भी जल्द समाप्त हो गया और लगातार आ रही माँग को देखते हुए 7700 प्रतियों का तीसरा संस्करण गुरुवार (16 फरवरी ) को प्रेस भेजना पड़ा. अशोक महेश्वरी ने कहा, हिंदी पाठकों का यह उत्साह स्वागतयोग्य है. आज के पाठकों की दिलचस्पी और अध्ययन का दायरा बहुत व्यापक हो चुका है. साहित्य का दायरा भी पारंपरिक विधाओं और विषयों से काफी आगे बढ़ चुका है. पीयूष मिश्रा के आत्मकथात्मक उपन्यास के प्रति लोगों की  प्रतिक्रिया उनके मिजाज और अपेक्षाओं का स्पष्ट संकेत है. उन्होंने कहा, हम विभिन्न विधाओं और विषयों की स्तरीय पुस्तकों के प्रकाशन के जरिये अपने पाठकों की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. 'तुम्हारी औकात क्या है पीयूष मिश्रा' का प्रकाशन इसी की कड़ी है. राजकमल प्रकाशन इससे पूर्व पीयूष मिश्रा के नाटकों और गीत संग्रहों का प्रकाशन कर चुका है.

'तुम्हारी औकात क्या है पीयूष मिश्रा' के बारे में

पीयूष मिश्रा जब मंच पर होते हैं तो वहाँ उनके अलावा सिर्फ़ उनका आवेग दिखता है। जिन लोगों ने उन्हें मंडी हाउस में एकल करते देखा है, वे ऊर्जा के उस वलय को आज भी उसी तरह गतिमान देख पाते होंगे। अपने गीत, अपने संगीत, अपनी देह और अपनी कला में आकंठ एकमेक एक सम्पूर्ण अभिनेता! अब वे फिल्में कर रहे हैं, गीत लिख रहे हैं, संगीत रच रहे हैं; और 'तुम्हारी औक़ात क्या है पीयूष मिश्रा' उनकी आत्मकथा है जिसे उन्होंने उपन्यास की तर्ज़ पर लिखा है। और लिखा नहीं; जैसे शब्दों को चित्रों के रूप में आँका है। इसमें सब कुछ उतना ही ‘परफ़ेक्ट’ है जितने बतौर अभिनेता वे स्वयं। न अतिरिक्त कोई शब्द, न कोई ऐसा वाक्य जो दृश्य को और सजीव न करता हो। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक ‘अनयूजुअल’-से परिवार में जन्मा एक बच्चा चरण-दर-चरण अपने भीतर छिपी असाधारणता का अन्वेषण करता है; और क़स्बाई मध्यवर्गीयता की कुंठित और करुण बाधाओं को पार करते हुए धीरे-धीरे अपने भीतर के कलाकार के सामने आ खड़ा होता है। अपने आत्म के सम्मुख जिससे उसे ताज़िन्दगी जूझना है; अपने उन डरों के समक्ष जिनसे डरना उतना ज़रूरी नहीं, जितना उन्हें समझना है। इस आत्मकथात्मक उपन्यास का नायक हैमलेट, यानी संताप त्रिवेदी यानी पीयूष मिश्रा यह काम अपनी ख़ुद की क़ीमत पर करता है। यह आत्मकथा जितनी बाहर की कहानी बताती है—ग्वालियर, दिल्ली, एनएसडी, मुम्बई, साथी कलाकारों आदि की—उससे ज़्यादा भीतर की कहानी बताती है, जिसे ऐसी गोचर दृश्यावली में पिरोया गया है जो कभी-कभी ही हो पाता है। इसमें हम दिल्ली के थिएटर जगत, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और मुम्बई की फ़िल्मी दुनिया के कई सुखद-दुखद पहलुओं को देखते हैं; एक अभिनेता के निर्माण की आन्तरिक यात्रा को भी, और एक संवेदनशील रचनात्मक मानस के भटकावों-विचलनों-आशंकाओं को भी। लेकिन इस किताब की सबसे बड़ी उपलब्धि इसका गद्य है। पीयूष मिश्रा की कहन यहाँ अपने उरूज़ पर है। पठनीयता के लगातार सँकरे होते हिन्दी-परिसर में यह गद्य खिली धूप-सा महसूस होता है।

कोई टिप्पणी नहीं: