आलेख : शिवलिंगों के राजा लिंगराज महादेव : जहां पूजे जाते है शिव संग श्रीहरि - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 23 जुलाई 2023

आलेख : शिवलिंगों के राजा लिंगराज महादेव : जहां पूजे जाते है शिव संग श्रीहरि

वैसे तो शिव के अनेक रूप हैं और महादेव के हर रूप की महिमा निराली है. लेकिन छोटकी काशी के नाम से विख्यात उड़ीसा के भुवनेश्वर में भोलेभंडारी भगवान भोलेनाथ एक निराला रूप है, जिसे लिंगराज महादेव कहते है। लिंगराज की महिमा ऐसी है कि यहां आने वाले भक्त की हर मुराद पूरी होती है. तीनों लोकों के स्वामी भगवान त्रिभुवनेश्वर को समर्पित ये मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल तो नहीं है, लेकिन यहां की मान्यता किसी ज्योतिर्लिंग से कम नहीं है. कई धार्मिक ग्रंथों में भी लिंगराज मंदिर की महत्ता का जिक्र किया गया है. कहते यहां शिव के साथ श्रीहरि विराजते है। यहां शिव के हृदय में श्रीहिर का वास है। यहां श्रीहरि शालिग्राम के रूप में मौजूद हैं। इसीलिए इसे शिवलिंगों के राजा लिंगराज महादेव की उपाधि दी गयी है। यहां स्थित शिवलिंग स्वयंभू है। मंदिर के मुख्य गर्भगृह में भगवान भेलेनाथ संग श्रीहरि की संयुक्त प्रतिमा है। प्रतिमा में आधा हिस्सा शिवजी का है और आधा श्रीहरि का है। इसीलिए यहां पर शिव और हरि की साथ-साथ पूजा-अर्चना होती है। यहां बेलपत्र के साथ ही तुलसी भी चढ़ाई जाती है। 55 मीटर ऊंचे इस मंदिर के शिखर की ऊंचाई 180 फीट है। मुख्य मंदिर में स्थित शिवलिंग 8 फीट मोटा और करीब 1 फीट ऊंचा है। मंदिर गणपति, कार्तिकेय संग गौरी के भी तीन छोटे मंदिर है। गौरी मंदिर में मां पार्वती की प्रतिमा काले पत्थर की बनी है। कहते है यहां पर लिट्टी वसा नाम के राक्षस का वध मां पार्वती ने स्वयं किया था। इस राक्षस का वध करने के बाद मां गौरी को जब प्यास लगी तब शिवजी ने खूद सभी पवित्र नदियों के योगदान से बिंदु सागर सरोवर का निर्माण किया।


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बेजोड़ कलाकृतियों एवं गुफाओं के लिए विख्यात उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर स्थित लिंगराज मंदिर भारत का एकमात्र मंदिर है, जहां भगवान शिव के साथ भगवान विष्णु की पूजा होती है। लिंगराज मंदिर को लेकर ऐसी मान्यता है कि भुवनेश्वर नगर का नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया है। दरअसल भगवान शिव की पत्नी को यहां भुवनेश्वरी कहा जाता है। लिंगराज यानी लिंगम का राजा और भगवान शिव को लिंग के रूप में पूजा जाता है। लिंगराज मंदिर दक्षिण भारत का प्रमुख धर्मिक स्थल है। यह मंदिर हिन्दुओं की आस्था का केंद्र भी है। श्रीहरि यानी विष्णु, जिन्हें शिव ने हरा है। यह भारत का ऐसा इकलौता मंदिर है, जहां भगवान शंकर और भगवान विष्णु दोनों के ही रूप बसते हैं। सैकड़ों वर्षों से भुवनेश्वर यहीं पूर्वोत्तर भारत में शैव सम्प्रदाय का मुख्य केंद्र रहा है। कहते हैं कि मध्ययुग में यहाँ सात हज़ार से अधिक मंदिर और पूजा स्थल थे, जिनमें से अब क़रीब पांच सौ ही शेष बचे हैं। हर साल लाखों की संख्या में हिंदू इस मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में भुवनेश्वर को एकाम्र वन कहा जाता था। इस उद्यान में विभिन्न प्रकार के पौधे हैं, जो विभिन्न हिंदू देवी-देवताओं से जुड़े हैं और अपने औषधीय गुणों के लिए जाने जाते हैं।


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खास बात यह है कि इस मंदिर में दर्शन-पूजन के लिए सिर्फ और सिर्फ हिंदू भक्तों को ही मंदिर में प्रवेश दिया जाता है। लिंगराज मंदिर के प्रांगण में लगभग 50 छोटे मंदिर विराजमान है। खासियत यह है कि इस मंदिर में प्रतिदिन 22 सेवा पूजा की जाती है। लिंगराज मंदिर के कुछ हिस्से का निर्माण 7 वीं शताब्दी में किया गया था। इस मंदिर के वर्तमान स्वरूप का निर्माण 11 वीं शताब्दी का भले हो लेकिन मंदिर के भोग मंडप का निर्माण 12 वीं शताब्दी का है। लिंगराज मंदिर का निर्माण सोमवंशी राजा ययाति प्रथम द्वारा करवाया गया। बाद में जाजति केशरी नाम के राजा ने भुवनेश्वर को अपनी राजधानी बनाया। उस समय इस मंदिर के आस पास के क्षेत्र को एकमरा के रूप में जाना जाता था। तब उस समय रानियों ने यह सम्पूर्ण क्षेत्र मंदिर में पूजा पाठ करने वाले ब्राह्मणों को दान कर दिया था। सभी ब्राह्मण मंदिर के आस पास गांव बनाकर रहने लगे। इन सभी ब्राह्मणों को जीवन यापन करने के लिए शाही अनुदान मिलता था। 11 वीं शताब्दी में मंदिर निर्माण के बाद राज राजा द्वितीय इस मंदिर में दर्शन के लिए आए और उन्होंने इस मंदिर को बहुत सारे सोने के सिक्के दान किए थे। उन सिक्कों का उपयोग इस मंदिर के रख रखाव में किया जाता था। इस भव्य प्राचीन संरचना की एक झलक पाने के लिए गैर-हिंदुओं के लिए परिसर के बाहर एक मंच बनाया गया है। मंदिर का एक दिलचस्प पहलू यह है कि यह हिंदू धर्म के दो प्रमुख संप्रदायों - शैववाद और वैष्णववाद - के एक साथ आने का प्रतीक है।


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लिंगराज मंदिर की पूजा पद्धति के अनुसार सबसे पहले बिंदु सरोवर में स्नान किया जाता है, फिर क्षेत्रपति अनंत वासुदेव के दर्शन किए जाते हैं। इसके बाद गणेश पूजा की जाती है। गणेश पूजा के बाद  गोपालनीदेवी व शिवजी के वाहन नंदी की पूजा की जाती है। फिर लिंगराज के दर्शन के लिए मुख्य स्थान में प्रवेश किया जाता है। शिवलिंग का बाहरी रूप पारम्परिक शिवलिंग जैसा गोलाकार है जिसमें से एक ओर से पानी जाने का मार्ग है लेकिन बीचों-बीच लिंग न होकर चांदी का शालीग्राम है जो विष्णु जी है। ये देखने में ऐसा प्रतीत होता है जैसे गहरे भूरे लगभग काले शिवलिंग की काया के बीच में सफेद शालिग्राम शिव के हृदय में विष्णु समाए है। इसीलिए इन्हें हरिहर कहा जाता है। लिंगराज मंदिर में शिव-विष्णु एक साथ होने से यहां फूल और तुलसी एक साथ चढ़ाए जाते है। ओडिशा में जगन्नाथ पुरी जाने से पहले पौराणिक मान्यता के अनुसार लिंगराज मंदिर में हरिहर के दर्शन किए जाने चाहिए। भीतर मुख्य गर्भगृह में हरि को हरने वाले इस हरिहर के अतिरिक्त लिंगराज मन्दिर के विशाल प्रांगण में अनेकों देवी-देवताओं के छोटे-छोटे मन्दिर है। इनमें  गणेश, पार्वती, महालक्ष्मी, दुर्गा, काली, नागेश्वर, राम, हनुमान, शीतला माता, संतोषी माता, सावित्री, व  यमराज के मंदिर शामिल है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार लिंगराज मंदिर से होकर एक नदी गुजरती है। इस नदी के पानी से मंदिर का बिंदु सागर टैंक भरता है। कहा जाता है कि यह पानी शारीरिक और मानसिक बीमारियों को दूर करता है। लोग अक्सर इस पानी को अमृत के रूप में पीते हैं और उत्सवों के समय भक्त इस टैंक में स्नान भी करते हैं। कहा जाता है कि लिंगम की उत्पत्ति गर्ब ग्रिहा में हुई थी और इस तरह इसे स्वेम्भु के नाम से जाना जाता है और लोग इसे भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों के रूप में पूजते हैं। एक त्रिशूल जिसमें भगवान शिव की एक प्रतिमा और प्रवेश द्वार के दोनों ओर भगवान विष्णु की दो मूर्तियाँ शामिल हैं जिसे मंदिर में प्रवेश करते हुए देखा जा सकता है। क्योंकि मंदिर दो गुटों के सामंजस्य का गवाह है इसे हरि-हारा माना जाता है जिसका गुप्त अर्थ है। हरि भगवान विष्णु का नाम है और हारा भगवान शिव का नाम है जो हरि-हारा बनाने के लिए गठबंधन करते हैं।


पौराणिक मान्यताएं

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लिंगराज मंदिर को प्राचीन समय में एकमरा क्षेत्र कहा जाता था, क्योंकि भगवान शिव का लिंग एक आम के पेड़ के नीचे स्थित था। पौराणिक कथाओं के अनुसार यहां पर पीठासीन देवता को त्रेता युग में नहीं देखा गया था, लेकिन द्वापर और कलियुग के दौरान यहां पर एक पत्थर का लिंग बना हुआ दिखा। इसलिए इस लिंग को स्वयंभू भी कहा जाता है। बाद में 11 वीं सदी में यहां पर भगवान शिव के मंदिर का निर्माण किया गया। आमतौर पर भगवान शिव के मंदिरों में झंडे पर त्रिशूल बनाया जाता है, लेकिन इस मंदिर के झंडे पर पिनाक धनुष बनाया गया। लिंगराज मंदिर की निर्माण शैली पूरी तरह से कलिंग शैली से मेल खाती है। मंदिर के सभी बाहरी दीवारों एक जैसी नक्कासी की गई है। यह मंदिर तीन खंडों में विभाजित है। प्रत्येक खंड में एक मंदिर बना हुआ है। मंदिर के प्रवेश द्वार में दक्षिण दिशा की ओर भगवान गणेश की मूर्ति विराजमान है। जो इस मंदिर की सुंदरता को बढ़ा देती है, पश्चिम दिशा की ओर माता पार्वती की मूर्ति विराजमान है और उत्तर दिशा की ओर भगवान कार्तिकेय की मूर्ति विराजमान है। इस मंदिर में कई स्तम्भ और हॉल बनाए गए हैं, जो इस मंदिर की सुंदरता में चार चांद लगा देते है। मंदिर के मुख्य द्वार पर भगवान गणेश का मंदिर स्थित है, उसके बाद नंदी बैल की मूर्ति स्थित है। यह मंदिर तीनों लोकों के भगवानों को समर्पित है। मंदिर के गर्भ गृह में भगवान शिव की एक विशाल प्रतिमा विराजमान है। जिसका व्यास लगभग 8 फीट है। भगवान शिव की प्रतिमा को जमीन से 8 इंच ऊपर एक मंच पर बनाया गया है। इस मंदिर को चार भागों (गर्भ गृह, यज्ञ शाला, भोग मंडप और नाट्य शाला) में बांटा गया है। मंदिर के गर्भ गृह में भगवान शिव और विष्णु दोनों की पूजा की जाती है। मंदिर के गर्भ में स्थिर शिवलिंग को प्रतिदिन पानी और दूध से नहलाया जाता है। पूजा करते समय भगवान शिव को बेल की पत्तियां भी चढ़ाई जाती हैं। भगवान शिव के भक्त भोलेनाथ को खुश करने के लिए भांग भी चढ़ाते है। मंदिर का खुलने का समय प्रतिदिन सुबह 6ः00 बजे से रात 9ः00 बजे तक है। यह मंदिर दिन कुछ समय के लिए दोपहर 12ः30 बजे से 3ः30 बजे तक बंद रहता है। इस अवधि में मंदिर में प्रवेश वर्जित है।


मंदिर में होता है विशेष उत्सव

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महाशिवरात्रि, चंदनयात्रा व रथयात्रा मिंदर का पवित्र पर्व है और धूमधाम से मनाया जाता है। शिवरात्रि के दिन इस मंदिर में भारी मात्रा में श्रद्धालु पहुंचते है। उस दिन सभी लोग भगवान शिव के दर्शन करते हैं और उनका जलाभिषेक करते हैं। चंदन यात्रा 21 दिवसीय उत्सव है जो अक्षय तृतीया के शुभ दिन से शुरू होता है। इस त्योहार के दौरान, देवताओं की मूर्तियों को बिंदु सरोवर में ले जाया जाता है और चपा नामक सुंदर रूप से सजाई गई संकीर्ण नावों में पानी में एक जुलूस निकाला जाता है। फिर मूर्तियों को चंदन (चंदन का पेस्ट) और पानी से पवित्र किया जाता है। भगवान लिंगराज की वार्षिक कार महोत्सव या रथ यात्रा को अशोकाष्टमी कहा जाता है। यह हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र माह (मार्च अप्रैल) के आठवें दिन बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है। उत्सव के दौरान, भगवान लिंगराज की मूर्ति व उनकी बहन रुक्मणी की मूर्तियों को एक सुसज्जित रथ में रामेश्वर मंदिर (जिसे मौसी मां मंदिर भी कहा जाता है) में ले जाया जाता है। बिंदु सरोवर में अनुष्ठान स्नान के बाद, देवता की मूर्ति को चार दिनों के बाद लिंगराज मंदिर में वापस लाया जाता है। इस उत्सव में शामिल होने और अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए भक्त बड़ी संख्या में एकत्रित होते हैं। चंदन यात्रा 22 दिवसीय उत्सव है जो अक्षय तृतीया के शुभ दिन से शुरू होता है। इस त्योहार के दौरान, देवताओं की मूर्तियों को बिंदु सरोवर में ले जाया जाता है और चपा नामक सुंदर रूप से सजाई गई संकीर्ण नावों में पानी में एक जुलूस निकाला जाता है। फिर मूर्तियों को चंदन (चंदन का पेस्ट) और पानी से पवित्र किया जाता है।


बिन्दु सागर सरोवर

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पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव ने माता पार्वती से भुवनेश्वर शहर की चर्चा की। तब माता पार्वती ने निश्चय किया कि वह भुवनेश्वर शहर को खोज कर ही लौटेंगी। गाय का रूप धारण कर माता पार्वती भुवनेश्वर शहर की खोज में निकल पड़ी। जब माता शहर की खोजबीन कर रही थी तब दो राक्षस जिनका नाम लिट्टी एवं वसा था, माता पार्वती के पीछे पड़ गए और उनसे शादी का प्रस्ताव रखने लगे। हालांकि माता पार्वती ने उन्हें मना कर दिया, बावजूद इसके वह उनका पीछा करते रहे। अंत में माता पार्वती ने उन दोनों राक्षसों का वध कर दिया। लड़ाई के बाद जब माता पार्वती को प्यास लगी तो भगवान शिव अवतरित हुए और भगवान शिव ने कुआं बना कर सभी पवित्र नदियों का आह्वान किया। यहां पर उन्होंने बिन्दुसागर सरोवर का निर्माण किया और भुवनेश्वर शहर की खोज हुई। कहा जाता है कि भगवान शिव और माता पार्वती लंबे समय तक इस शहर में निवास करते रहे। बिंदुसार सरोवर के निकट ही लिंगराज का विशालकाय मंदिर है। इस मंदिर में पूजन करने के पहले बिंदु सरोवर में स्नान करना पड़ता है, उसके बाद अनंत वासुदेव के दर्शन करते हैं। भगवान श्री गणेश की पूजन के बाद, गोपालनी देवी और फिर भगवान शिव जी के वाहन नंदी के पूजा करने के बाद, लिंगराज के दर्शन के मुख्य स्थल पर प्रदेश किया जाता है। गर्भ ग्रह के अलावा जगमोहन तथा भोग मंडप में सुंदर सिंह मूर्तियों के साथ देवी देवताओं की कलात्मक प्रतिमाएं बनी हुई है।


भव्य है मंदिर का बनावट

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यह मंदिर भारत के शिव संप्रदाय का आस्था का केंद्र बिंदु है। शिव परिवार का अद्भुत और वास्तु कला से संपन्न मंदिर अतुलनीय है। यह मन्दिर उत्तरी भारत के मन्दिरों में रचना सौंदर्य तथा शोभा और अलंकरण की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। लिंगराज का विशाल मन्दिर अपनी अनुपम स्थापत्यकला के लिए भी प्रसिद्ध है। मन्दिर में प्रत्येक शिला पर कारीगरी और मूर्तिकला का चमत्कार है। इस मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1090 से 1104 में बना था। छठवीं शताब्दी का यह प्रमुख मंदिर है। इस मंदिर का शिखर भारतीय मंदिरों के शिखरों के विकास क्रम में प्रारंभिक अवस्था का शिखर कहा जाता है। यह नीचे से तो सीधा और समकोण है, ऊपर पहुंचकर वक्र हो जाता है। शीर्ष पर वर्तुल दिखाई देता है। इस मंदिर की सुंदर नक्काशी देखते ही बनती हैं। मंदिर के हर एक पत्थर पर अलंकरण उत्कीर्ण है। मंदिर में जगह-जगह मानव आकृति और पशु पक्षियों के सुंदर मूर्ति चित्र बने हुए हैं। मंदिर के चारों ओर स्थूल व लम्बी  पुष्प मालाएं फूलों के मोटे गजरे पहने हुए दिखाई देती हैं। इस मंदिर का प्रांगण 150 मीटर वर्गाकार है। जबकि कलश ऊंचाई 40 मीटर है। इस मंदिर में तीन और छोटे मंदिर स्थित है, भगवान गणेश, स्वामी कार्तिकेय और माता गौरी के तीन छोटे मंदिर में मुख्य मंदिर के विमान में संलग्न है। गौरी मंदिर में पार्वती जी की काले पत्थर की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के चतुर्दिक गज सिंहो की उकेरी हुई मूर्तियां दिखाई देती है। यह उड़ीसा के भुवनेश्वर का वास्तुशिल्प का अद्भुत नमूना है। इस मंदिर की दीवारों पर खजुराहों के मंदिरों जैसी मूर्तियां उकेरी गई हैं। पार्वती मंदिर जो इस मंदिर परिसर के उत्तरी दिशा में स्थित है, अपनी सुंदर नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है।




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सुरेश गांधी

वरिष्ठ पत्रकार

वाराणसी

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