सीहोर। शनिवार को शहर के सैकड़ाखेडी स्थित संकल्प नशा मुक्ति केन्द्र में माघ पूर्णिमा के पर्व, भक्त शिरोमणि भक्त मां शबरी की जयंती और संत रविदास की जयंती के अवसर पर दो दिवसीय कार्यशाला और गोष्ठी के आयोजन का शुभारंभ किया गया। इस मौके पर परमार समाज के वरिष्ठ पदाधिकारी शिव परमार मुरली ने कहा कि संतों के बताए मार्ग पर चलकर हम अपने जीवन में बुराईयों से मुक्त हो सकते है। भगवान और भक्त के आपसी समर्पण का प्रतीक है मां शबरी और संत रविदास। इस मौके पर श्री परमार ने जानकारी देते हुए कहा कि श्रीराम के प्रति श्रद्धा और भक्ति के कारण शबरी को मोक्ष प्राप्ति हुई थी। ऐसा माना जाता है कि भगवान राम ने इनके झूठे बेर खाए थे। इसलिए भगवान और भक्त के आपसी समर्पण के प्रतीक पर्व के रूप में शबरी जयंती मनाई जाती है। माता शबरी का वास्तविक नाम श्रमणा था और वह भील समुदाय की शबरी जाति से संबंध रखती थीं। उनके पिता भीलों के राजा थे। शबरी जब विवाह के योग्य हुई तो उसके पिता ने भील कुमार से उसका विवाह तय किया। उस समय विवाह में जानवरों की बलि देने का नियम था। लेकिन शबरी ने जानवरों को बचाने के लिए विवाह नहीं किया। वहीं कार्यशाला के दौरान केन्द्र के प्रभारी नटवर कुशवाहा ने कहा कि संत रविदास कृष्णभक्त मीराबाई के गुरु थे और उनके द्वारा दी गई शिक्षा से ही मीरा ने कृष्ण भक्ति का मार्ग अपनाया था। संत रविदास की भक्ति भावना और प्रतीभा को देखकर स्वामी रानानंद ने उन्हें अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया था। संत रविदास जी ने कई दोहे और भजन की रचना की थी, जिनमें उन्होंने ईश्वर का गुणगान किया था। साथ ही यह भी बताया था कि व्यक्ति को किन कर्मों से ईश्वर के चरणों में स्थान मिलता है। कार्यशाला के दौरान श्रद्धा भक्ति सेवा समिति की ओर से विष्णु परमार रोलुखेड़ी, जीनगर मारवाड़ी समाज की ओर से नरेन्द्र डाबी, जिला उपभोक्त परिषद की ओर से पप्पू सेन आदि शामिल थे। रविवार को दो दिवसीय कार्यशाला का समापन किया जाएगा।
शनिवार, 24 फ़रवरी 2024
सीहोर : भगवान और भक्त के आपसी समर्पण का प्रतीक मां शबरी-शिव परमार
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