रेअर अर्थ क्या हैं ?
रेअर अर्थ मेटल 17 धातु तत्वों का एक समूह है, जिसमें 15 लैंथेनाइड्स धातुओं के अलावा स्कैंडियम और यिट्रियम शामिल हैं। इनमें चुंबकीय, ल्यूमिनसेंट और इलेक्ट्रोकेमिकल के विशेष गुण होते हैं, जिनका उपयोग आधुनिक उच्च तकनीक उद्योग में किया जाता है। स्मार्टफोन, लैपटॉप और इलेक्ट्रिक वाहन बनाने के लिए चिप और बैटरी चाहिए, जिसके लिए अर्थ मैटेरियल्स की जरूरत होती है। मिसाइल, राडार और अत्याधुनिक हथियार बनाने के लिए दुर्लभ खनिज ही चाहिएं। इसके अलावा रिन्यूवल एनर्जी, विंड टर्बाइन और सोलर पैनल, सुपर कंडक्टर, हाइ प्लग्स, मैग्रेट, इलेक्ट्रिक पॉलिसिंग, ऑयल, रिफाइनरी में केटिलिस्ट, हाइब्रिड कलर कंपोनेंट एवं बैटरी, लैजर, एयरोस्पेस के लिए भी ये ‘अनिवार्य तत्व’ हैं। रेअर अर्थ मैग्नेट सामान्य आयरन मैग्नेट से 20 गुना अधिक ताकतवर होता है और कारों तथा कई अन्य उपकरणों में लगने वाली इलेक्ट्रिक मोटरों को बनाने के लिए ज़रूरी है।
भंडार दुनिया भर में लेकिन लीडर चीन
यूएस भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण डेटा पर आधारित एक नये ग्लोबल मैप के मुताबिक यों तो कई देशों में इन दुर्लभ तत्वों के भंडार हैं लेकिन सर्वाधिक चीन में 44 मिलियन मीट्रिक टन भंडार है। चीन के बाद अफ्रीका, खास तौर पर मोरक्को और दक्षिण अफ्रीका में प्रचुर मात्रा में जस्ता, लिथियम और कोबाल्ट के भंडार हैं, जो रिन्यूवल एनर्जी के लिए सबसे ज्यादा जरूरी हैं। वहीं दक्षिण अमेरिका के चिली और ब्राजील में इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए आवश्यक विशाल लिथियम भंडार हैं तो यूक्रेन में टाइटेनियम और लिथियम और ग्रीनलैंड में दुर्लभ अर्थ मेटल्स और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार हैं। दिक्कत यह है कि इन देशों में इसकी खुदाई और प्रोसेसिंग बहुत महंगी है। इससे भारी मात्रा में प्रदूषण भी निकलता है। इन सब में चीन के पास ही इनकी प्रोसेसिंग की क्षमता है। वर्तमान में दुलर्भ पृथ्वी धातुओं का 61 प्रतिशत भंडार चीन में है और पूरी दुनिया में 90 फीसदी वही निर्यात करता है। इन तत्वों को एक-दूसरे से अलग करना बेहद जटिल है। इस जटिल प्रक्रिया में भारी मात्रा में एसिड की जरूरत होती है। रेअर अर्थ की वैश्विक सप्लाई चेन में चीन का दबदबा है। आधुनिक इंडस्ट्री में इनका महत्व यों समझा जा सकता है कि चीन ने जब इस वर्ष अप्रैल में रेअर अर्थ मैग्नेट समेत छह तरह के बहुमूल्य धातुओं के निर्यात पर रोक लगाने का फैसला किया तो इससे वैश्विक कंपनियों में खलबली मच गई। चीन की निर्यात में कड़ाई से ऑटोमोबाइल उद्योग को विशेष रूप से झटका लगा है क्योंकि इलेक्ट्रिक वाहनों में इस्तेमाल होने वाले शक्तिशाली इंजन मैग्नेट नियोडिमियम से बनते हैं। भारत में भी टाटा मोटर्स, महिंद्रा एंड महिंद्रा, बजाज मोटर्स दबाव में आ गए। सुजूकी कंपनी को अपनी स्विफ्ट कार का निर्माण कुछ समय के लिए स्थगित करना पड़ा। ऐसा नहीं है कि भारत में ये दुर्लभ तत्व नहीं मिलते; भारत के पास तो विश्व में पांचवां सबसे बड़ा दुर्लभ खनिज भंडार है—करीब 6.9 मिलियन मीट्रिक टन। दुनिया में भारत की हिस्सेदारी छह फीसदी है। इनमें केरल में थोरियम सैंड के अलावा आंध्रप्रदेश, ओडिशा, राजस्थान में भी इसके भंडार हैं ; लेकिन दुनिया भर की आपूर्ति का भारत में महज एक प्रतिशत हिस्सा ही उत्पादित होता है। इन खनिजों की तलाश, खदान का काम अब तक मोटे तौर पर सरकार के जिम्मे रहा है। ब्यूरो आफ माइंस और परमाणु ऊर्जा विभाग ये काम करते रहे हैं। खनन और शोधन का काम ‘इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड’ के पास रहा है लेकिन यह विडंबना है कि भारत अभी ऐसी तकनीक, मैकेनिज़्म नहीं खड़ा कर पाया है जो इन खनिजों से मैग्नेट बनाकर खुद की ज़रूरतें पूरी कर सके। भारत में जितने भी दुर्लभ अर्थ मैग्नेट उपयोग में आते हैं, वे अधिकतर चीन से आयात किए जाते हैं। वर्ष 2023-24 में भारत ने 2270 टन और पिछले वित्तीय वर्ष में करीब 53,748 मीट्रिक टन मैग्नेट आयात किए। इनका करीब अस्सी फीसदी चीन से ही आयात हुआ।
चीन के हथियार हैं दुर्लभ तत्व
चीन इन दुर्लभ तत्वों को हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है। कुछ समय पहले उसका जब जापान के साथ सीमा विवाद हुआ था तो उसने जापान को इनकी आपूर्ति रोक दी। इसी तरह अपनी दूसरी पारी में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपनी टैरिफ दरों में बेतहाशा वृद्धि कर दी तो बदले में चीन ने फिर इस हथियार का इस्तेमाल किया। मजबूर होकर अमेरिका को इस संबंध में जिनेवा समझौता रद्द कर नया लंदन समझौता करना पड़ा। इन दुर्लभ खनिजों की सप्लाई चेन चीन के हाथ में होने से कई देश ज़रूरत पड़ने पर बेबस हो जाते हैं।
आत्मनिर्भरता की ओर कदम
इस हालात को देखते हुए भारत ने अपने दुर्लभ खनिजों को रणनीतिक संपत्ति की तरह देखना शुरू कर दिया है। इसी रणनीति के चलते भारत ने पिछले 13 वर्षों से जापान के साथ चल रहे समझौते को निलंबित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। जिसके तहत ‘इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड’ द्वारा खनन किए गए दुर्लभ खनिज, विशेषकर नियोडिमियम जापान भेजे जाते थे, लेकिन अब भारत ने तय किया है कि वह अपने घरेलू उद्योगों की ज़रूरतों को प्राथमिकता देगा और चीन पर अपनी निर्भरता कम करेगा। इसी उद्देश्य के साथ ‘इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड’ ने सरकार से अब घरेलू स्तर पर प्रसंस्करण और रिफाइनिंग की क्षमता विकसित करने के लिए चार नए खदानों की मंजूरी मांगी है। इसी रणनीति के तहत ओडिशा में एक एक्सट्रैक्शन प्लांट और केरल में एक रिफाइनिंग यूनिट स्थापित की गई है। राजस्थान के जोधपुर संभाग के बालोतरा क्षेत्र की सिवाना और आसपास की पहाड़ियों में इन दुर्लभ खनिजों की मौजूदगी पर केंद्र सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग की आधिकारिक पुष्टि के बाद जोधपुर में ‘रेअर अर्थ एक्सीलेंस सेंटर’ बनाने का प्रस्ताव भी सरकार के पास है। बालोतरा में 1 लाख 11 हजार 845 टन दुर्लभ मृदा तत्व ऑक्साइड मिलने की संभावना है। भारत का लक्ष्य है कि 2026 तक वह 450 मीट्रिक टन नियोडिमियम का उत्पादन करे और 2030 तक इसे दोगुना कर दे। दरअसल ये खनिज निकालना ही काफी नहीं है,उससे मैग्नेट बनाना, फिर उन्हें औद्योगिक उपयोग के योग्य बनाना एक लंबी तकनीकी प्रक्रिया है। भारत को वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए यह अब अनिवार्य हो गया है कि दुर्लभ तत्वों की तकनीक में अपने धुर प्रतिद्वंद्वी देश पर निर्भरता को घटाते हुए आत्मनिर्भरता के प्रयास किए जाएं। सरकार अब इस दिशा में सक्रिय भी हुई है और जल्द ही दुर्लभ खनिजों के प्रसंस्करण तथा मैग्नेट निर्माण इकाइयों को स्थापित करने वाली कंपनियों को प्रोत्साहन देने की योजना तैयार कर रही है। यही वो पथ है जो भारत को आत्मनिर्भर बनाकर वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनाएगा।
हरीश शिवनानी
(वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार)
ईमेल : shivnaniharish@gmail.com
मोबाइल : 9829210036

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