इन हालातों में प्यू रिसर्च द्वारा हाल ही किये गये सर्वे में जो परिणाम सामने आये हैं वह किसी विष्व नेता के लिए शर्मनाक से कम नहीं होने चाहिए। 81 प्रतिशत भरोसे लायक नेता पर 40 प्रतिशत अमेरिकीयों का भरोसा और इनमें से भी 25 प्रतिशत का थोड़ा भरोसा तो फिर देखा जाए तो केवल 15 प्रतिशत अमेरिकी ही ट्रंप पर पूरी तरह से भरोसा जता रहे हैं। 59 प्रतिशत अमेरिकीयों को तो ट्रंप पर अब बिलकुल भी भरोसा नहीं रहा है। देखा जाए तो दुनिया के देश तो ट्रंप की बेजा हरकतों से परेशान है ही वहीं अमेरिकावासियों को भी अमेरिका का भविष्य कोई अच्छा संकेत देता नहीं लग रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप के एक के बाद लिए गए फैसलों ने उन्हें दुनिया का सबसे बड़ा खलनायक बना दिया है। ट्रंप की हर धमकी हवा हवाई बनकर रह गई है। इसके साथ ही ट्रंप द्वारा कही जाने वाली बात कब तक रहेगी इस पर भी दुनिया के लोगों को संदेह होने लगा है। एक तरह से देखा जाए तो ट्रंप किसी मसखरें की छवि मेें दुनिया के देशों के सामने आ रहे हैं। टैरिफ वार सामने हैं। टैरिफ के नाम पर देशों को धमकाना ज्यादा नहीं चल सकता, यह अमेरिका को समझना होगा। भारत पर 40 प्रतिशत टैरिफ लगाने से उलटा मोदी को मजबूत बनाने का काम ही अमेरिकी राष्ट्रपति ने किया है। इससे पहले जिस तरह से कनाडा को अपना 51 वां राज्य कहना दादागिरी का बड़ा नमूना है। भारत पाकिस्तान के बीच ऑपरेशन सिन्दुर के दौरान सीजफायर करने के दावें की पोल खुल चुकी है। देखा जाए तो ट्रंप तानाशाही रवैया अपनाते हुए दुनिया के देषों को ड़राने धमकाने में लगे हुए हैं। हांलाकि चाहे टैरिफ नीति हो या उपनिवेशवादी सोच देर सबेर इसका खामियाजा अमेरिका को ही भुगतना पड़ेगा और गत बैठक के दौरान व्हाईट हाउस में ट्रम्प और जेलेंस्की के बीच तीखी बहस और नोकझोंक से दुनिया के देषों में साहस का संचार हुआ है। व्हाईट हाउस की घटना का तात्कालिक परिणाम ही यह सामने आ गया है कि यूरोप के देश एक स्वर में यूक्रेन के साथ खड़े होने लगे है तो दूसरी और अपना नया नेता चुनने पर विचार करने लगे हैं। हांलाकि जेलेंस्की ने देश हित को पहली वरियता दी है और अमेरिका से अब भी खनिज संपदा के अधिकार देने पर सहमति समझौता करने को लगभग तैयार है। पर अमेरिका दबाव बनाकर और डरा धमकाकर समझौता करना चाहता है यही कारण है कि समझौते क प्रारुप पर चर्चा करने आये जेलेंस्की को ही रुस यूक्रेन युद्ध का जिम्मेदार बताते हुए तीखी नोंकझोंक तक हालात पहुंच गए और जेलेंस्की की हिम्मत की इसलिए सराहना करनी होगी कि अमेरिका के आगे नाक रगड़ने की जगह वार्ता छोड़कर यूरोपीय देशों की यात्रा पर आ गये।
भविष्य में क्या होता है यह तो अलग बात हैं पर चाहे रुस यूक्रेन युद्ध हो, चाहे इजरायल हमास या फिर भारत पाक ट्रंप किसी बहरुपिये की तरह से एक्सपोज हो गए हैं। इससे रुस और पुतिन का विश्व राजनीति में उभार का अवसर मिला है वही दुनिया के देशों की कोरोना व अन्य नीतियों के कारण चीन के प्रति बनी सोच में भी बदलाव आने लगा है। इसके साथ ही दुनिया के देशों में आज भारत की छवि भी बदलाव आया है और भारत को सशक्त और दुनिया का नेतृत्व करने में सक्षम देश के रुप में देखा जाने लगा है। टैरिफ वार के नाम पर भारत को धमकाना और पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष के साथ लंच करने से अमेरिका और ट्रंप दोनों की साख नकारात्मक रुप से प्रभावित हुई है। ट्रंप के निर्णय के यही हालात रहे तो अमेरिका हाशियें में आ जाएं तो कोई अनपेक्षित बात नहीं होगी। ऐसे में ट्रंप के सलाहकारों को यह समझाना होगा कि ड़राने धमकाने का या दादागिरी का समय नहीं रहा है छोटा से छोटा देश अपनी अस्मिता के लिए लंबा संघर्ष करने में पीछे हटने वाला या झुकने वाला नहीं हैं। रुस यूक्रेन युद्ध इसका जीता जागता उदाहरण है। ट्रंप को अपनी हैसियत बनाये रखनी है तो उसे अपनी कार्यशैली में बदलाव लाना होगा नहीं तो वह अपने देश मेें ही बदनामी के शीर्ष पर पहुंच जाएगा। ट्रंप को अपने पराये की पहचान करनी होगी। एलन मस्क ने आज साथ छोड़ दिया है बल्कि ट्रंप के खिलाफ झंडा उठा लिया है, भारत और मोदी ने तबज्जु देना बंद कर दिया है ऐसे में वो दिन दूर नहीं जब दुनिया के देश अमेरिका को आंख दिखाना शुरु कर देंगे। कहीं ऐसा ना हो कि छब्बे जी बनने के चक्कर में दुबे जी भी ना रहे ट्रंप महाशय।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
स्तंभकार

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