न्यायमूर्ति मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा ने फिल्म को जनता के लिए रिलीज करने की अनुमति देने से सीबीएफसी के इनकार को चुनौती देने वाली याचिका 10 सितंबर को खारिज कर दी। न्यायाधीश ने कहा कि अनुमति देने से इनकार करने वाली जांच समिति की रिपोर्ट से पता चला है कि फिल्म की विषय-वस्तु ‘‘अत्यधिक/अनावश्यक रूप से हिंसक, वीभत्स और बिना किसी सुधारात्मक कारक के भयावह चित्रण वाली है और इसलिए यह सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए उपयुक्त नहीं है।’’ आदेश में कहा गया है कि फिल्म के मुख्य पात्र बिना किसी भय के कानून को अपने हाथ में लेते हैं। अदालत ने कहा कि जब ‘‘ऐसे खतरनाक विचारों को हत्या के ग्राफिक दृश्यों के साथ जोड़ा जाता है’’, तो विषय वस्तु वाली फिल्म सार्वजनिक शांति को गंभीर रूप से बिगाड़ सकती है और दूसरों को हिंसक कार्य करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है, जिससे समाज की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। ऐसा कहा गया कि फिल्म में न केवल मनुष्यों और जानवरों के बारे में हिंसक सामग्री है, बल्कि इसमें ‘‘समुदायों के लिए अपमानजनक संदर्भ, धर्मों के बारे में अपमानजनक टिप्पणियां और जाति-आधारित और सांप्रदायिक बयान’’ भी शामिल हैं। अदालत ने कहा कि इस तरह के चित्रण कानून के तहत निषिद्ध हैं, जो सांप्रदायिक वैमनस्य को बढ़ावा देने या धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली किसी भी फिल्म को प्रतिबंधित करता है।
नई दिल्ली (रजनीश के झा)। उच्च न्यायालय ने हिंदी फिल्म ‘‘मासूम कातिल’’ को रिलीज करने की अनुमति देने से इनकार करते हुए कहा है कि विविधतापूर्ण, धर्मनिरपेक्ष समाज में ऐसी फिल्म को प्रमाणपत्र नहीं दिया जा सकता जो धर्मों का उपहास करती हो, घृणा फैलाती हो या सामाजिक सद्भाव को खतरा पहुंचाती हो। अदालत ने कहा कि फिल्म में ऐसा दिखाया गया है कि कानून को अपने हाथ में लेना सराहनीय काम है, जिसकी अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि इससे ‘‘कानूनी व्यवस्था में लोगों का भरोसा समाप्त हो सकता है और ऐसा कहा जा सकता है कि कानून का पालन करने के बजाय हिंसा का इस्तेमाल करना स्वीकार्य है।’’

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