- धुंधकारी अपने दुराचार और पापाचार के कारण प्रेत योनि में भटका : कथा वाचक पंडित शिवम मिश्रा

सीहोर। पितृपक्ष के दौरान धुंधकारी और गोकर्ण की कथा सुनाने का महत्व यह है कि यह कथा कर्मों के परिणामों और भागवत कथा के महत्व को बताती है। धुंधकारी अपने दुराचार और पापाचार के कारण प्रेत योनि में भटका, लेकिन उसके भाई गोकर्ण ने श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन कर, श्रवण और मनन के माध्यम से उसे मुक्ति दिलाई। यह कथा बताती है कि धर्म और अधर्म के फल क्या होते हैं और कैसे भक्ति और सत्संग से पापी भी मोक्ष पा सकते हैं, भले ही उन्होंने कितना भी पाप किया हो। मरने के बाद मुक्ति होगी या नहीं होगी, यह मैं नहीं जानता क्योंकि श्रीमद् भागवत की कथा में बताया गया है कि धुंधकारी जब मरा, तो धुंधकारी का भाई गोकर्ण ने गया में जाकर अनेक बार उसका श्राद्ध किया, फिर भी उसको मुक्ति नहीं मिली। यह बात शहर के संकल्प वृद्धाश्रम में पितृपक्ष के अवसर पर जारी 16 दिवसीय धर्मसभा में कथा वाचक पंडित शिवम मिश्रा ने कहे। उन्होंने कहाकि आपके जीवन में सत्य और सत्संग आ जाता है तो आप मायाजाल से मुक्त हो जाते है। इस मौके पर कथा वाचक पंडित श्री मिश्रा का श्रद्धा भक्ति सेवा समिति के चीफ कांउसलर जितेन्द्र तिवारी, संस्कार मंच के मनोज दीक्षित मामा, धर्मेन्द्र माहेश्वरी, आनंद व्यास, आकाश राय, धर्मेश शर्मा आदि ने स्वागत किया। पंडित श्री मिश्रा ने कहाकि अच्छी और बुरी सबसे में होती है। भगवान श्रीराम की तरह मर्यादित जीवन जीने में सालों लग जाते है, लेकिन रावण बनने में हमें कुछ पल लगते है, इसलिए हमारे विचारों को सात्विक बनाने का प्रयास करना चाहिए। धुंधकारी जब जीवित था, तो उसके कर्म ही प्रेतों वाले थे. वह वासनाओं में डूबा हुआ, कामनाओं में डूबा हुआ, पिता को लात मारने वाला और मां को आत्महत्या पर मजबूर कर देने वाला था, पंच तन मात्राएं शब्द, रूप, रस, गंध इत्यादि में वेश्याओं की भांति पड़े रहने वाला था. इस वजह से कोई अनुष्ठान और कर्मकांड उसको मुक्ति नहीं दिला सका।
अपने आप को व्यस्त रखो व्यसन से मुक्त रखो
प्रवचन सभा के दौरान समिति के मुख्य सलाहकार जितेन्द्र तिवारी ने कहाकि आश्रम के संचालक राहुल सिंह और उनकी टीम सदैव सेवा का संकल्प लेकर चलते है, आज उनके कारण अनेक जरूरतमंदों को सहयोग मिल रहा है। इस तरह के सेवा के कार्य में अपने आपको व्यस्त रखने से नकारात्मकता नहीं आती है। हमें सबसे पहले हमें ऐसे प्रयास करने चाहिए जिससे कि तनाव उत्पन्न ही न हो। इसके लिए अपनी जीवनशैली को बदलना होगा। छोटी-छोटी बातों से तनावग्रस्त होने के बजाय हमें किसी भी परिस्थिति का मुकाबला करने के लिए तैयार रहना चाहिए। ऐसे में बिल्कुल भी घबराना नहीं चाहिए। यदि कोई समस्या उठ खड़ी हो गई है तो धैर्य नहीं खोना चाहिए, बल्कि अपने विवेक को काम में लेना चाहिए। जीवन में तनाव उत्पन्न ही न हो, इसके लिए दूसरा उपाय है कि व्यक्ति खुद को हमेशा किसी न किसी काम में व्यस्त रखे। बहुत पुरानी कहावत भी है, खाली दिमाग शैतान का घर होता है।
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