पटना, (आलोक कुमार). आज 11 सितंबर है.भूदान आंदोलन के प्रणेता संत विनोबा भावे की 130वीं जयंती.कभी जिनके नाम पर पूरा देश सामाजिक क्रांति का सपना देखता था, आज उन्हीं की जयंती सरकारी उदासीनता और संस्थागत अभाव के बीच लगभग औपचारिकता भर रह गई है. कल तक गैर-सरकारी संस्थाएं विनोबा जी की जयंती को जन उत्सव का रूप देती थीं. पर आज, विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) की कठोर शर्तों और धनाभाव के चलते वे संस्थाएँ पंगु होकर रह गई हैं. 2014 के बाद केंद्र सरकार ने इस कानून को सख्ती से लागू किया, जिससे NGOs की गतिविधियां लगभग ठप हो गई. विदेशी अनुदान पर पाबंदियों ने सामाजिक सरोकार के क्षेत्र को सिकोड़कर रख दिया. बावजूद इसके, बिहार स्टेट गांधी स्मारक निधि ने पटना में विनोबा जयंती का आयोजन कर परंपरा को जीवित रखने का प्रयास किया.प्रभाकर कुमार की अध्यक्षता में हुए इस कार्यक्रम में माखन लाल दास, डॉ. मोख्तारूल हक़, अरुण प्रसाद, शिबबालक प्रसाद, उमेश मंडल सहित अनेक खादी-ग्रामोद्योग व स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने भाग लिया. सभा में खादी उद्योग और भूदान किसानों की समस्याओं पर गहन विमर्श हुआ. वक्ताओं ने सरकार से लंबित रिबेट राशि का तत्काल भुगतान, खादी पुनरुद्धार योजना के अक्षरशः: पालन और ऋण माफी की मांग की.साथ ही भूदान यज्ञ समिति के पुनर्गठन पर बल दिया ताकि भूदान किसानों की उपेक्षा दूर हो सके. यह जयंती केवल एक स्मरण नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक दायित्व की याद दिलाती है.सवाल यह है—क्या हम विनोबा भावे की विरासत को महज औपचारिक आयोजनों तक सीमित कर देंगे, या फिर सामाजिक न्याय और ग्राम-आधारित आत्मनिर्भरता के उनके स्वप्न को पुनर्जीवित करने का साहस दिखाएं?
गुरुवार, 11 सितंबर 2025
पटना : विनोबा भावे की जयंती और आज का यथार्थ
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