वाराणसी : ठुमरी का सूरज गंगा में विलीन : काशी की कंठध्वनि थम गई - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025

वाराणसी : ठुमरी का सूरज गंगा में विलीन : काशी की कंठध्वनि थम गई

  • पंडित छन्नूलाल मिश्र को संगीत जगत की भावभीनी श्रद्धांजलि
  • सोशल मीडिया पर लोग सांझा कर रहे है उनके साथ बीताएं पलों ण्वं अनुभवों को

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वाराणसी (सुरेश गांधी). भारतीय शास्त्रीय संगीत के आकाश में आज एक ऐसा तारा अस्त हो गया, जिसकी आभा से पूरा बनारस, पूरा भारत जगमगाता रहा।  जिसकी चमक दशकों तक गंगा-जमुनी तहजीब और बनारसियत की पहचान रही। पद्मविभूषण पंडित छन्नूलाल मिश्र अब इस दुनिया में नहीं हैं। गुरुवार तड़के 4ः15 बजे मिर्जापुर में उन्होंने अपनी बेटी के घर अंतिम सांस ली। 89 वर्ष की आयु में यह महान गायक जब अनंत में लीन हुए, तो मानो “राग, रस और रागिनी का साधक” सदा के लिए मौन हो गया। आज जब उनकी चिता की अग्नि धधकेगी, गंगा की लहरें मानो उनकी ठुमरी गुनगुनाएंगी। सचमुच, बनारस की कंठध्वनि थम गई है, पर उनके स्वर शाश्वत हैं, वे हवाओं में बहते रहेंगे, पीढ़ियों तक राग-रस और भक्ति का संदेश सुनाते रहेंगे। भारतीय संगीत परंपरा का इतिहास जब लिखा जाएगा तो उसमें एक नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज रहेगा, पंडित छन्नूलाल मिश्र। वे केवल गायक नहीं थे, बल्कि बनारस की जीवित परंपरा, लोकसंस्कृति के संवाहक और शास्त्रीयता को जनभाषा में ढालने वाले साधक थे। आज उनका स्वर थम गया, पर उनकी गूंज पीढ़ियों तक गूंजती रहेगी।


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भारत की आत्मा जब गाती है तो उसकी धुन में गंगा की लहरें, काशी की गलियां और लोकजीवन की करुणा मिल जाती है। आज वही स्वर, वही रस, वही गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक मौन हो गया। पंडित जी केवल शास्त्रीय संगीत के साधक नहीं थे, वे बनारस की धड़कन थे। उनकी ठुमरी, दादरा, कजरी और भजन में वह माटी की सोंधी गंध आती थी, जिसे सुनकर लगता था कि बनारस स्वयं गा रहा हो। “खेले मसाने में होली दिगम्बर” जैसी उनकी अमर रचनाएं जीवन और मृत्यु की दार्शनिकता को लोकधुन में ढालकर साधारण जन-जन तक पहुँचा देती थीं। यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी, संस्कार और रस को सहजता से जनमानस के भीतर उतार देना। उनका जाना भारतीय संगीत धारा के लिए अपूरणीय क्षति है। आज बनारस की गलियां सूनी होंगी, गंगा का प्रवाह मानो थम-सा गया होगा और संगीत का आसमान एक तारा खो चुका है। लेकिन यह सच है कि स्वर कभी मरते नहींकृवे हवाओं में तैरते रहते हैं, पीढ़ियों को प्रेरित करते रहते हैं। आज जब उनकी पार्थिव देह मणिकर्णिका घाट पर पंचतत्व में विलीन होगी, तो काशी की गंगा उनके गाए भजन, ठुमरी और कजरी को अपनी लहरों में हमेशा के लिए समेट लेगी। भारत ने अपना एक अमूल्य रत्न खोया है।


जन्म से साधना तक का सफर

3 अगस्त 1936 को आजमगढ़ के हरिहरपुर गांव में जन्मे छन्नूलाल मिश्र ने संगीत की शिक्षा बिहार के मुजफ्फरपुर से आरंभ की। फिर काशी ने उन्हें मांजा और बनारस की माटी ने उनके स्वर को अमरता दी। गुरुओं के मार्गदर्शन से उन्होंने ख्याल और पूरब अंग की ठुमरी में वह गहराई पाई, जो बाद में उनकी पहचान बन गई। उनके सुरों में वह बनारसीपन था, जो शास्त्रीय संगीत को भी सहज और आत्मीय बना देता था।


संगीत की विविधता

उनकी गायकी केवल शास्त्रीय मंच की नहीं थी, बल्कि लोकजीवन की भी थी। ठुमरी, दादरा, चैती, कजरी और भजन, सब उनके सुरों में एकाकार हो उठते थे। “खेले मसाने में होली दिगम्बर” और “श्याम मोरा नहीं आए” जैसी प्रस्तुतियां आज भी श्रोताओं की आत्मा में गूंजती हैं। उनकी गायकी में शास्त्रीयता के साथ-साथ लोक की आत्मा भी झलकती थी। उनके गायन में न केवल संगीत की गहराई थी, बल्कि जीवन-दर्शन और आध्यात्मिक आनंद का अनुभव भी मिलता था। ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन पर वे शीर्ष ग्रेड कलाकार रहे।


सम्मान और उपलब्धियां

उनकी साधना को देश ने अनेक सम्मान दिए, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (2000), पद्मभूषण (2010), पद्मविभूषण (2020), साथ ही सुर सिंगार संसद का शिरोमणि सम्मान, नौशाद पुरस्कार, यश भारती और संगीत शिरोमणि पुरस्कार भी उनके खाते में जुड़े। वे उत्तर-केंद्रीय सांस्कृतिक केंद्र, संस्कृति मंत्रालय के सदस्य भी रहे।


मोदी से आत्मीय रिश्ता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनका गहरा नाता रहा। 2014 में उन्होंने मोदी के वाराणसी नामांकन में प्रस्तावक की भूमिका निभाई और शपथग्रहण समारोह में “बधइया” गीत गाकर उस ऐतिहासिक क्षण को लोकधारा की मिठास से भर दिया। यह प्रसंग इस बात का प्रमाण है कि वे केवल गायक नहीं, बल्कि संस्कृति और राजनीति के बीच सेतु भी थे।


संघर्ष और अंतिम समय

बीते महीनों से वे अस्वस्थ थे। बीएचयू में इलाज के दौरान उन्हें हार्ट अटैक और चेस्ट इंफेक्शन की समस्या हुई। स्वास्थ्य में सुधार होने पर अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद 27 सितंबर को वे बेटी के घर मिर्जापुर गए। वहीं आज सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली। बेटी नम्रता ने बताया कि हीमोग्लोबिन लेवल और त्वचा संबंधी दिक्कतें बनी रहीं। मिर्जापुर में मां विंध्यवासिनी मेडिकल कॉलेज और रामकृष्ण सेवा मिशन चिकित्सालय में उपचार हुआ, पर स्थिति सुधरी नहीं। गुरुवार सुबह उनका जीवन-दीपक शांत हो गया।


अंतिम यात्रा

पंडित जी का पार्थिव शरीर गुरुवार को वाराणसी लाया जाएगा। दिनभर अंतिम दर्शन होंगे और शाम सात बजे मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार किया जाएगा। हजारों संगीत प्रेमियों और शिष्यों की उपस्थिति से गंगा किनारे काशी की हवा उनके सुरों में डूबी होगी।


स्वर कभी नहीं मरते

पंडित जी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि संगीत केवल कला नहीं, बल्कि साधना है। वे चले गए, पर उनकी गायकी, उनके भजन, उनकी ठुमरी और उनकी अमर रचनाएं सदियों तक पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेंगी। आज जब गंगा किनारे उनकी चिता जलेगी, तो काशी की हवाओं में उनका स्वर तैरता रहेगा। सचमुच, स्वर कभी मरते नहीं, वे शाश्वत होते हैं। आज जब उनकी देह पंचतत्व में विलीन होगी, गंगा उनकी गाई ठुमरी और भजन को अपनी लहरों में हमेशा के लिए समेट लेगी। भारतीय संस्कृति ने अपना एक सच्चा प्रहरी खो दिया है। पंडित छन्नूलाल मिश्र को कोटि-कोटि श्रद्धांजलि। 


सुरों का साधक, बनारस की आत्मा, मेरी स्मृतियों में सदा जीवित रहेंगे पंडित छन्नूलाल मिश्र” : सुरेश गांधी

आज भारतीय शास्त्रीय संगीत की वह अनमोल धरोहर मौन हो गई, जिसने न जाने कितनी पीढ़ियों को अपने स्वर से जीवन का अर्थ समझाया। पद्मविभूषण पंडित छन्नूलाल मिश्र जी का जाना केवल बनारस या संगीत जगत की क्षति नहीं है, यह हम सबकी आत्मा को छू लेने वाला शोक है। मेरे लिए पंडित जी सिर्फ़ एक महान गायक नहीं थे, बल्कि आत्मीय लगाव और प्रेरणा के स्रोत भी थे। कई बार उनसे बातचीत, इंटरव्यू और निजी क्षण बिताने का सौभाग्य मिला। उनकी सरलता, अपनापन और सहजता हर मुलाक़ात में झलकती थी।अस्वस्थ होने पर जब मैं मिर्जापुर उनके आवास गया था, तो वहां उनके कई शिष्यों और परिजनों से भेंट हुई। उस समय भी उनकी आँखों में संगीत के प्रति वही जज़्बा और जीवन के प्रति वही सहज मुस्कान थी। यह अपनापन ही उन्हें महान कलाकार से बढ़कर एक संतुलित व्यक्तित्व बनाता था। यह तस्वीर, जो मेरी स्मृतियों में अब हमेशा के लिए धरोहर बन गई है, उनके उसी आत्मीय स्वरूप की गवाही देती है। उनके पास बैठकर लगता था मानो संगीत की गंगा प्रवाहित हो रही हो। पंडित जी कहते थे, “संगीत आत्मा को जोड़ता है, यह हमें भगवान से मिलाता है।” सचमुच, उनकी ठुमरी, चैती और भजन केवल राग नहीं थे, वे साधना थे, जीवन के गूढ़ सत्य थे। आज उनके स्वर थम गए हैं, पर उनकी गूंज अनंतकाल तक रहेगी। बनारस की गलियों में, मणिकर्णिका की धारा में, और हर उस दिल में जो शास्त्रीय संगीत से प्रेम करता है। पंडित जी, आपका जाना व्यक्तिगत शून्य भी छोड़ गया है। लेकिन आपके स्वर, आपका अपनापन और आपकी स्मृतियाँ हमें सदैव प्रेरणा देती रहेंगी।

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