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सोमवार, 10 नवंबर 2025

आलेख : जातीय समीकरण बनाम विकास मॉडल की सीधी लड़ाई में छोटे दल बनेंगे किंगमेकर

बिहार चुनाव में इस बार सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं है। यह एक सामाजिक पुनर्संरचना का क्षण है। एक ओर जातीय पहचान, इतिहास और परंपराएं खड़ी हैं, दूसरी ओर विकास, रोजगार, आर्थिक समानता और भविष्य की अपेक्षाएं। इस संघर्ष के बीच छोटे दल अब सिर्फ मंच के किनारे खड़े चेहरे नहीं हैं, वे खेल के असली निर्णायक खिलाड़ी हैं। बिहार की जनता इस बार किस दिशा में झुकेगी, यह तय करेगा कि बिहार अतीत की राजनीति को दोहराएगा या नयी राजनीतिक संस्कृति का द्वार खोलेगा। मतलब साफ है इस बार बिहार चुनाव केवल गठबंधन या नेतृत्व चुनने का चुनाव नहीं, यह विकास बनाम अवसर, स्थिरता बनाम परिवर्तन, और भविष्य बनाम अतीत का चुनाव है। मतदाता अब “कौन?” नहीं पूछता, वह अब पूछ रहा है “क्यों?” और यही प्रश्न 14 नवम्बर को बिहार के राजनीतिक भविष्य को दिशा देगा


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फिरहाल, बिहार की राजनीति एक बार फिर उबल रही है। चुनावी सरगर्मी गांव से लेकर शहर तक फैल चुकी है। केंद्र की राजनीति से लेकर स्थानीय मुद्दों तक, हर बहस का केंद्र इस बार सिर्फ एक सवाल है, बिहार किस दिशा में जाएगा? क्या मतदाता जातीय पहचान के आधार पर अपने प्रतिनिधि चुनेंगे, या विकास, रोजगार, शिक्षा और सुशासन जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देंगे? और इस निर्णय में निर्णायक भूमिका छोटे दलों की होगी, जो इस बार महज सहयोगी नहीं, बल्कि किंगमेकर के रूप में उभरते दिखाई दे रहे हैं। बिहार का राजनीतिक इतिहास बताता है कि यहां सत्ता सिर्फ नीतियों से नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों और जातीय पहचान के आधार पर तय होती रही है। मंडल राजनीति के दौर से लेकर आज तक : यादव बनाम कुर्मी, सवर्ण बनाम पिछड़ा, महादलित बनाम दलित, और अब ईबीसी (अति पिछड़ा वर्ग) बनाम ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) का संतुलन ही सरकारों का भविष्य तय करता रहा है। लेकिन एनबीटी (नया बिहार सोच) की नई पीढ़ी, खासकर महिलाएं, युवा और प्रथम बार वोटर, अब सिर्फ जाति के आधार पर राजनीति स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हैं। वे पूछ रहे हैं, “डिग्री ली, नौकरी कहाँ है?“ “सड़क बनी, पर उद्योग क्यों नहीं आया?“ “शिक्षा सुधरी, पर शिक्षकों की भर्ती क्यों अटकी?“ यही परिवर्तन इस चुनाव को सिर्फ जातीय मुकाबला नहीं रहने देता, बल्कि इसे विकास मॉडल बनाम जातीय समीकरण की सीधी लड़ाई बना देता है।


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महागठबंधन बनाम एनडीए की जंग में दो मॉडल, दो नैरेटिव साफ झलक रहा है. महागठबंधन का नैरेटिव यानी तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाला महागठबंधन इस चुनाव में नौकरी, बेरोज़गारी और आर्थिक विषमता को मुख्य मुद्दे के रूप में उठा रहा है। उनकी रैली का प्रमुख नारा रहा है, “रोजगार हमारा अधिकार है” महागठबंधन का मुख्य वोट आधार : यादव, मुस्लिम, कुरमी-कोइरी के कुछ हिस्से और गरीब व शहरी श्रमिक वर्ग. उनका दावा है कि विकास सिर्फ भाषणों का विषय बन गया है। सरकारी नौकरियों में देरी, शिक्षकों की बहाली, स्वास्थ्य ढांचे की स्थिति, इन मुद्दों पर वे जनता की नब्ज दबा रहे हैं। एनडीए का नैरेटिव यानी दूसरी ओर, एनडीए प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता और बदले हुए बिहार की छवि पर जोर दे रहा है। उनकी पिच है, “हमने सड़क दी, बिजली दी, पुलों का जाल बिछाया, बदला हुआ बिहार सिर्फ नारों से नहीं, धरातल पर है।” एनडीए का आधार : अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी), सवण, महिलाएं, लाभार्थी वर्ग (जिन्हें सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ मिला है) यानी महिला वोट बैंक और लाभार्थी मॉडल इस चुनाव में एनडीए की असली ताकत हैं। जातीय जनगणना ने राजनीति की जमीन बदल दी है, बिहार सरकार द्वारा जारी जातीय जनगणना के आंकड़ों ने जातीय समीकरणों को नया रंग दे दिया : ओबीसी $ ईबीसी मिलाकर लगभग 63 फीसदी, दलित लगभग 19 फीसदी, सवर्ण लगभग 15 फीसदी, इस जनगणना ने महागठबंधन को राजनीति का नैतिक आधार दिया कि बहुसंख्यक की हिस्सेदारी तय होनी चाहिए। वहीं एनडीए ने इसे विकास में सबकी भागीदारी के रूप में पेश किया। दोनों की रणनीति बिल्कुल साफ है, लेकिन निर्णायक मोर्चा वहीं पर फंसा है जहाँ छोटे दल खड़े हैं।


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छोटे दल : चुनाव की असली चाबी बनकर उभर रहे है. वैसे भी बिहार के चुनावों में छोटे दल हमेशा से भूमिका निभाते रहे हैं, लेकिन इस बार उनकी भूमिका सिर्फ सहयोगी की नहीं, सरकार बनाने वाले निर्णायक घटक की है। महत्वपूर्ण छोटे दल और उनका प्रभाव ज्यादा है. वीआईपी (मुकेश सहनी) निषाद / मल्लाह         मिथिलांचल $ कोसी बोटों की संख्या निर्णायक, आरएलएसपी (उपेंद्र कुशवाहा)             कुशवाहा, कोइरी, मगध $ शाहाबाद, ओबीसी विभाजन कर सकता है. एचएएम (जीतनराम मांझी) महादलित मगध $ गया, गठबंधन तय करेगा दलित वोटर, आज़ाद संगठन व स्थानीय जनाधार वाले क्षेत्रीय गुट विभिन्न सीमांचल, भोजपुर, मगध, सीट लेवल पर भारी असर है. ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है क्यों बनेंगे छोटे दल किंगमेकर? ईबीसी (अति पिछड़ा वर्ग) अब सबसे बड़ा वोटर समूह है, जो लगातार अपनी राजनीतिक पहचान तलाश रहा है। छोटे दल इन्हें प्रतिनिधित्व का वादा कर रहे हैं। अगर यह वोट महागठबंधन या एनडीए में एकमुश्त नहीं गया, तो चुनाव त्रिकोणीय हो जाएगा, और ऐसे में 30 से 40 सीटें सीधे छोटे दलों के प्रभाव में चली जाएँगी। महिलाओं का वोट यानी चुप्पी में छिपी शक्ति. वैसे भी बिहार के चुनावी इतिहास में महिलाओं का वोट बैंक अब सबसे परिपक्व और निर्णायक हो चुका है। नगालैंड और मध्यप्रदेश की तरह बिहार में भी महिला मतदान पुरुषों से अधिक हो रहा है। इसकी बड़ी वजह नल-जल योजना, उज्ज्वला योजना, जनधन और सीधे खाते में आर्थिक मदद, शौचालय निर्माण, स्कूलों में लड़कियों को साइकिल और पोशाक योजना, इन योजनाओं का सीधा लाभ महिलाओं तक पहुंचा है। महिला वोट एनडीए के पक्ष में मजबूती से खड़ा माना जा रहा है। लेकिन बेरोज़गारी और महंगाई ने इस चुनाव में निर्णय को थोड़ा उलझा भी दिया है। यहीं पर छोटे दल और स्थानीय मुद्दों की भूमिका बढ़ जाती है।


बिहार में बेरोज़गारी सबसे बड़ा मुद्दा है। हर परिवार में एक या दो बच्चे नौकरी की उम्मीद लिए कोचिंग कर रहे हैं, कभी पटना, कभी प्रयागराज, कभी दिल्ली में। शिक्षकों की लंबी लंबित बहालियां, पुलिस भर्ती की देरी, उद्योग और निवेश की कमी, और एक अवसर आधारित अर्थव्यवस्था का अभाव, युवाओं का धैर्य टूट रहा है। यही कारण है कि इस बार का चुनाव घोषणाओं की नहीं, भरोसे की परीक्षा है। तेजस्वी यादव युवाओं में नौकरी वाले वादे के कारण लोकप्रिय हैं। वहीं एनडीए युवाओं को कौशल प्रशिक्षण और स्टार्टअप नीति का भविष्य दिखा रहा है। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है, क्या सच में छोटे दल किंगमेकर बनेंगे? क्योंकि बड़ा वोट बैंक बिखरा हुआ है, कोई भी गठबंधन एकतरफा बढ़त में नहीं दिखता, सीटें कई जगह 50 हजार से भी कम अंतर में तय होंगी, और 30 से 40 सीटों पर छोटे दलों की जमीनी पैठ निर्णायक होगी. मतलब साफ है, सरकार गठबंधन से बनेगी, लेकिन गठबंधन को दिशा छोटे दल देंगे। यानी बिहार की राजनीति एक बार फिर बहुमत नहीं, मैनेजमेंट के दौर में प्रवेश कर रही है। या यूं कहे बिहार की रणभूमि : जाति, जमीनी मुद्दे और बदलती राजनीतिक धुरी बन चुकी है. बदलता बिहार : नारा नहीं, नयी राजनीति की तलाश में मतदाता है. यानी जाति गणित से आगे बढ़कर मुद्दों पर आधारित हो चला है बिहार का चुनाव? युवा और महिलाएं बनीं किंगमेकर : नई शक्ति संरचना का उदय होने वाला है. बिहार चुनाव इस बार इस बार केवल सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं है। यह उस सामाजिक-राजनीतिक संरचना का भी परीक्षण है, जहां मतदाता अब केवल नारों से प्रभावित नहीं होता, बल्कि अपने अनुभव, स्थानीय मुद्दों, रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा और नेतृत्व की विश्वसनीयता को केंद्र में रखकर मतदान करता है।


इस बार चुनाव का स्वरूप पारंपरिक से कहीं अधिक बदला हुआ है, एक ओर एनडीए (मुख्यतया जेडीयू-बीजेपी), दूसरी ओर महागठबंधन (आरजेडी, कांग्रेस एवं सहयोगी), और तीसरी ओर उभरती ताकत जन सुराज (प्रशांत किशोर), इन तीनों के बीच प्रतियोगिता ने चुनाव को असामान्य रूप से जटिल, रोचक और अस्थिर बना दिया है। पहला चरण संपन्न हो चुका है, जिसमें ऐतिहासिक रूप से उच्च मतदान दर्ज हुआ। यह संकेत है कि जनता इस बार चुप बैठी नहीं है, बल्कि सक्रिय रूप से राजनीतिक परिवर्तन या पुनर्स्थापन, दोनों में से किसी एक दिशा में स्पष्ट मत देना चाहती है। दूसरा चरण और 14 नवम्बर की मतगणना उस जनभावना को मूर्त रूप देगी, जो अभी तक केवल माहौल, चर्चा और जनमानस की कल्पना में दिखाई दे रही है। राजनीतिक जानकारों का कहना है, इस बार मतदाता भय या धर्म नहीं, भविष्य को मतदान कर रहा है। अकेला नारा पर्याप्त नहीं होगा, विश्वसनीयता तय करेगी, कौन जीतेगा। बिहार का युवा अब भीड़ नहीं, सवाल है। यही बात इस चुनाव की संरचना बदल रही है। हालांकि एनडीए के साथ मोदी की लोकप्रियता, संगठन की मजबूती, विभाजित विपक्ष का असर है, परन्तु उसके सामने नितीश कुमार के खिलाफ लंबी इंकम्बेंसी, युवाओं की रोजगार अपेक्षाएं, महागठबंधन की मजबूत ग्रामीण पैठ जैसी चुनौतियां भी है. जहां तक महागठबंधन का सवाल है तो उसके लिए युवाओं के रोजगार मुद्दे की विश्वसनीय प्रस्तुति, सीट-स्तरीय जातीय संतुलन प्रबंधन व कांग्रेस और अन्य सहयोगी दल ठोस भूमिका ही कुछ नया कर सकती है. जन सुराज कई ऐसी सीटों पर पारंपरिक वोट बैंक को बांट रहा है, जहां जीत/हार 1000-3000 वोट पर तय होती है। अर्थात पलड़ा कहीं भी झुक सकता है।


पुराने गठबंधन और नए सवाल

पिछले दो दशकों से बिहार की राजनीति नितीश कुमार को केंद्र में रखकर चलती रही है। मुख्यमंत्री के रूप में उनकी पहचान प्रशासनिक सुधार, पंचायत सशक्तिकरण, सड़क निर्माण और कानून-व्यवस्था बेहतर करने वाले नेता के रूप में रही। परन्तु बार-बार गठबंधन बदलने की उनकी रणनीति ने मतदाता मनोविज्ञान में भ्रम और अविश्वास भी पैदा किया। आज बड़ा प्रश्न यह है, क्या नितीश कुमार की राजनीतिक स्वीकार्यता अभी भी उतनी प्रभावी है? या क्या मोदी फैक्टर बिहार में उतना निर्णायक बनेगा जितना केन्द्र की राजनीति में? दूसरी तरफ आरजेडी, जो लंबे समय तक अपने जातीय आधार पर टिके रहने के कारण सत्ता समीकरण से दरकिनार रही, इस बार युवाओं के रोजगार, सरकारी भर्ती और सामाजिक न्याय जैसे महासरोकारों को मुद्दे के रूप में उठाकर मैदान में है। तेजस्वी यादव की छवि युवाओं में प्रभाव पैदा कर रही है, खासकर उन जिलों में जहाँ बेरोजगारी और पलायन सवाल बन चुका है। तीसरा कारक प्रशांत किशोर की जन सुराज है। उनका प्रभाव राज्यव्यापी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय, सीमित किन्तु निर्णायक सीटों पर है, जहाँ उन्हें “विकल्प” के रूप में देखा जा रहा है। ये सीटें सीधे-सीधे दोनों बड़े गठबंधनों के पारंपरिक वोट बैंक को काटने का असर दिखा सकती हैं।


मुख्य मुद्दे जिन पर चुनाव टिका है

1. रोजगार और युवाओं का भविष्य : बिहार की लगभग आधी आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। ऐसे में रोजगार और सरकारी भर्ती सबसे बड़ा मुद्दा है। नौकरियों के बड़े वादे किए जा रहे हैं, पर जनता अब वादों के बजाय कार्यान्वयन की विश्वसनीयता पर विश्वास करती है। यही वह बिंदु है जहाँ तेजस्वी यादव का रोजगार वादा और मोदी-योगी मॉडल की विकास छवि दोनों के बीच सीधा मनोवैज्ञानिक मुकाबला हो रहा है।


2. कानून-व्यवस्था और सुरक्षा : शहरी क्षेत्रों और कुछ अर्ध-ग्रामीण जिलों में सुरक्षा मुद्दा बड़ा है। एनडीए “सुरक्षा और विकास“ पर जोर लगा रही है, जबकि विपक्ष इसे “भ्रष्टाचार और पुलिस व्यवस्था की कमजोरी“ से जोड़ रहा है।


3. जातीय संतुलन : बिहार में जाति केवल पहचान नहीं, राजनीतिक गणित है। लेकिन इस चुनाव में जाति-आधारित वोटिंग का स्वरूप बदल रहा है, युवाओं में जाति के बजाय नौकरी और जीवन-गुणवत्ता की आवाज पहले से अधिक स्पष्ट है।


4. स्थानीय नेतृत्व बनाम राष्ट्रीय नेतृत्व : कई जिलों में निर्णय उम्मीदवार की छवि पर होगा, न कि पार्टी के नारे पर। पहले चरण में लगभग 65 फीसदी के करीब मतदान दर्ज हुआ। इतना बड़ा मतदान हमेशा जनमानस की सक्रियता का संकेत होता है। यह दर्ज मतदान राजनीतिक-मानसशास्त्र की दृष्टि से दो दिशाओं में पढ़ा जा सकता है : 1. परिवर्तन की लहर : यदि लोग बदलाव चाहते हैं, वे भारी संख्या में मतदान के लिए निकलते हैं। 2. सत्ता स्थिरता : कभी-कभी सत्ताधारी पक्ष के मजबूत संगठन भी अधिक मतदाताओं को प्रेरित कर देते हैं। वास्तविक प्रभाव क्षेत्रवार अलग-अलग है, इसलिए हमें ज़रूरी है कि मुख्य 15 निर्णायक सीटों को समझें।


बिहार की 15 सीटें निर्णायक होंगे

1 मनेर (पटना) शहरी $ ग्रामीण मिश्रण आरजेडी मजबूत यादव$ओबीसी निर्णय, 2 बहादुरपुर (दरभंगा) मिथिला क्षेत्र की प्रतिष्ठा जेडयू बनाम आरजेडी स्थानीय रिश्ते, 3 मुज़फ्फरपुर क्लस्टर उच्च मतदा गठबंधन टकराव संगठन  युवामन, 4 समस्तीपुर शहरी-कृषि समाज बीजेपी बनाम आरजेडी जातीय संतुलन, 5 चम्पारण सीमा, रणनीतिक इलाका एनडीए बनाम विपक्ष ग्रामीण-स्थानीय मुद्दे, 6 वैशाली कम अंतर की सीट महागठबंधन बनाम एनडीए स्थानीय नेतृत्व, 7 बेगूसराय राजनीतिक रूप से चंचल जिला त्रिकोणीय असर किसान-युवा, 8 पटना नगर सीटें शहरी मध्यम वर्ग बीजेपी की मजबूती रोजगार, इंफ्रा, 9 गोपालगंज, जातीय समीकरण एनडीए झुकाव संगठन शक्ति, 10 सिवान ऐतिहासिक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, बहुदलीय मुकाबला नेतृत्व-स्थानीय प्रभाव, 11 रोहतास/भभुआ दक्षिण बिहार बैलेंस एनडीए फायदा विकास-नीति, 12 कटिहार-पूरनिया क्षेत्रीय और अल्पसंख्यक फोकस आरजेडी/तीसरा मोर्चा मुस्लिम$युवा हिस्सा, 13 भागलपुर आर्थिक-सामाजिक संवेदना महागठबंधन सक्रिय सांप्रदायिक संतुलन, 14 नालंदा/गया शिक्षा-आध्यात्मिक क्षेत्र जेडयू मजबूत चुनौती स्थानीय नेता प्रभाव, 15 दरभंगा ग्रामीण ब्राह्मण-मिथिला संतुलन बीजेपी बनाम गठबंधन भावनात्मक-क्षेत्रीयता. इन सीटों पर होने वाली हलचल पूरे चुनाव के परिणाम का पलटाव-बिंदु बन सकती है।







Suresh-gandhi

सुरेश गांधी

वरिष्ठ पत्रकार 

वाराणसी


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