“मैंने आने वाले एक हजार वर्षों के भारत के लिए नींव रख दी है”, यह कोई साधारण वाक्य नहीं, बल्कि एक ऐसी घोषणा है जो किसी युगपुरुष की दूरदृष्टि, राष्ट्रचेतना और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की विराट परिकल्पना को प्रकट करती है। यह केवल आधुनिक भारत के विकास-प्रयासों की सूची नहीं, बल्कि उस आत्मविश्वास का प्रवाह है जिसने देश की आत्मा को पुनर्जीवित किया, जनमन में सनातन गौरव की अनुभूति जगाई और राष्ट्र को उसकी सभ्यतागत धारा से फिर जोड़ दिया। जब वे कहते हैं, “अब आप उसे मजबूत कर सकते हों, तो धर्मध्वजा की छाया में साथ आएं” तो यह न कोई राजनीतिक नारा है और न किसी दल का आग्रह; यह राष्ट्रीय पुनरुत्थान का आमंत्रण है, उस भारत के निर्माण का आवाहन है जो आने वाले सहस्र वर्षों तक विश्व को दिशा देगा। धर्मध्वजा का आरोहण हमें स्मरण कराता है कि राम अंत में नहीं, आरंभ हैं। राम इतिहास नहीं, भविष्य हैं। और राम मंदिर का यह क्षण, भारत के नवोदय का शुभसंकेत है। यही भाव, यही अनुभूति, यही ध्वजा, भारत को 2047 के विकसित राष्ट्र के स्वप्न की ओर संकल्प की तरह मार्ग दिखाती रहेगी
धर्मध्वजा का अर्थ : राजनीति नहीं, राष्ट्रनीति
जब कहा जाता है, “अब आप उसे मजबूत कर सकते हों तो धर्मध्वजा की छाया में साथ आएं”, तो यह वाक्य राजनीति की धरती से बहुत परे है। धर्मध्वजा, किसी दल का झंडा नहीं। यह प्रतिनिधित्व है, सहनशीलता का, धर्म का जो किसी एक पंथ तक सीमित नहीं, समरसता, निष्ठा, मर्यादा और न्याय के शाश्वत सिद्धांतों का, वसुधैव कुटुंबकम् की विराट भारतीय दृष्टि का। धर्मध्वजा का अर्थ है, भारत के वे आदर्श जो राम में निहित हैं। राम केवल भगवान नहीं, वे मर्यादा के प्रतीक, धर्म के आधार, न्याय के संवाहक, राजनीति में नैतिकता के मानक और शासन के आदर्श भी हैं। धर्मध्वजा की छाया वास्तव में भारत के उन मूल्यों की छाया है, जो राजनीति को भी दिशा देते हैं, समाज को भी, और राष्ट्र को भी। इस छाया के नीचे खड़े होकर ही आधुनिक भारत को सहस्राब्दियों तक स्थायी बनाने का संकल्प पूर्ण हो सकता है।रामध्वज : आस्था से राष्ट्रनिर्माण तक
राममंदिर की पूर्णता केवल एक धार्मिक घटना नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक युग-परिवर्तन है। 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिली, लेकिन 22 जनवरी 2024 को भारत ने अपनी आत्मा पुनः प्राप्त की। यह रामध्वज, भारत की अस्मिता की स्थापना है, पराजय के प्रतीक को पराक्रम में बदलने का क्षण है, और एक ऐसे राष्ट्र का उदय है जो अपनी जड़ों पर गर्व करता है। रामध्वज के फहराने का अर्थ है, भारत अब इतिहास की भ्रांतियों का बोझ नहीं ढोएगा। भारत अब क्षमा की आड़ में अपनी पराजयों को महिमामंडित नहीं करेगा। भारत अब अपनी सभ्यता को पिछड़ा नहीं मानेगा। भारत अब आत्मगौरव से भरा हुआ आगे बढ़ेगा। राम मंदिर केवल मंदिर नहीं, यह भारतीय सभ्यता का जीवित स्मारक है। एक ऐसा स्मारक जो बताता है, सदियों की संघर्ष-गाथा अंततः सत्य, धर्म और न्याय की विजय से पूरी होती है।राम मंदिर की पूर्णता, वीरता, न्याय और धैर्य का चरम क्षण
राम मंदिर बनने में न केवल 500 वर्ष लगे, बल्कि एक पूरा मानसिक संघर्ष भी लड़ा गया। यह संघर्ष केवल न्यायालयों में नहीं, बल्कि जनमन में भी चला, स्वाभिमान की लड़ाई, इतिहास की पुनर्स्थापना, और सांस्कृतिक आत्मसम्मान के पुनर्जागरण की लड़ाई। राम मंदिर की पुनर्स्थापना ने देश को यह स्मरण कराया कि जो राष्ट्र अपनी आत्मा से कट जाता है, वह दुर्बल हो जाता है. और जो अपने इतिहास को पुनः स्थिर कर लेता है, वह पुनः महान बन जाता है। रामलला के सिंहासन पर विराजने से भारत की चेतना में नई ऊर्जा आई, एक ऐसी ऊर्जा जो केवल विजय नहीं, बल्कि नींव का प्रतीक है। अब दीवारें, शिखर और वैभव गढ़ने का समय जनता का है, यही संदेश है धर्मध्वजा की छाया में आने का।
सांस्कृतिक पुनर्जागरण, एक व्यापक परिवर्तन
भारत में यह पुनर्जागरण केवल राम मंदिर तक सीमित नहीं। यह व्यापक है, गंगा से गंगा विलास तक, काशी से कश्मीर तक, अयोध्या से अंडमान तक, और भारतीय ज्ञान से वैश्विक कूटनीति तक। यह भारत, अपनी संस्कृति पर गर्व करता है, अपनी परंपराओं को बोझ नहीं मानता, आधुनिकता को अपनाते हुए अपनी पहचान बनाए रखता है। इस नए भारत में, टेक्नोलॉजी और वेद, एआई और अध्यात्म, चंद्रयान और चित्तशुद्धि, साथ-साथ आगे बढ़ते हैं। यह वही भारत है जिसकी नींव रखी जा चुकी है, अब उसे मजबूत करना है।
सियासत और राम, दो अलग धाराएं, दो अलग उद्देश्य
सियासत ने लंबे दशक राम को मुद्दा बनाया। लेकिन आज पहली बार राम मुद्दा नहीं, मूल्य बने हैं। राजनीति बदल सकती है, नेतृत्व बदल सकता है, लेकिन जो परिवर्तन समाज और चेतना में उतर जाए, वह स्थायी होता है। राम मंदिर का निर्माण चुनाव का विषय नहीं, एक सभ्यतागत समाधान है। एक ऐसा समाधान जो आने वाले सौ नहीं, हजार वर्षों की सोच के केंद्र में है। आज जब राम जन्मभूमि के मुख्य शिखर पर विशाल केसरिया ध्वज फहराया गया, तो यह केवल धार्मिक ध्वज नहीं, बल्कि यह संदेश है कि भारत अपनी आत्मा की ओर लौट आया है। धर्मध्वजा की छाया में आने का आह्वान उन विद्यार्थियों के लिए है, उन कर्मयोगियों के लिए है, किसानों, उद्यमियों, वैज्ञानिकों, साधकों, कलाकारों और हर उस भारतीय के लिए है जो भविष्य का भारत बनाना चाहता है। यह आह्वान कहता है, अब केवल सरकार नहीं बनाएगी, अब राष्ट्र जनता बनाएगी। धर्मध्वजा की छाया में आने का अर्थ है, मूल्यों की रक्षा, कर्तव्य का निर्वाह, राष्ट्र के प्रति निष्ठा, संस्कृति के प्रति सम्मान, और भविष्य के प्रति जिम्मेदारी। यह आह्वान है, दर्शक नहीं, निर्माता बनने का।
आने वाले वर्षों का कैसा होगा भारत?
जिस नींव की बात की जा रही है, वह केवल आज का नहीं, आने वाले सहस्र वर्षों का भारत है। यह भारत होगा, आध्यात्मिक रूप से उन्नत, तकनीकी रूप से अग्रणी, आर्थिक रूप से शक्तिशाली, सांस्कृतिक रूप से जगद्गुरु, न्याय, मर्यादा और समता का आदर्श, धर्म और विज्ञान का संगम, वैश्विक समरसता का नेता। यह भारत, राम के आदर्शों पर खड़ा होगा, अष्टाध्यायी की भाषा के सौंदर्य पर चलेगा, बुद्ध के करुणा-मार्ग पर बढ़ेगा, गुरु परंपरा से शक्ति लेगा, विवेकानंद के स्वाभिमान से भरेगा और आधुनिक विज्ञान से दुनिया को नए मार्ग दिखाएगा।
भारत का भविष्य, पीढ़ियां गढ़ेंगी, राजनीति नहीं
भविष्य की वर्षगांठें सरकारें नहीं मनातीं, पीढ़ियां मनाती हैं। जो नींव रख दी गई है, अब उसे स्थायी बनाने का उत्तरदायित्व जनता पर है। धर्मध्वजा की छाया में आने का अर्थ है, भारत के लिए समर्पित होना, ईमानदार श्रम करना, अपनी पहचान पर गर्व करना, और आने वाली पीढ़ियों के लिए पथ बनाना। जब जनता यह समझ लेती है, तो राष्ट्र अजेय हो जाता है।
राम भारत की आत्मा, भारत का आधार
राम, भारत की चेतना हैं। भारत की आत्मा हैं। प्रण हैं। मार्ग हैं। गौरव हैं। नैतिकता हैं। चिंतन हैं। और भविष्य भी हैं। रामध्वज केवल भगवा नहीं, यह भारतीयता का ध्वज है। एक ऐसा ध्वज जो 21वीं सदी के भारत में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना त्रेतायुग में था। राम वह शक्ति हैं जो भारत को जोड़ती है, उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम, अतीत से भविष्य। मतलब साफ है राम मंदिर की पूर्णता के बाद जब धर्मध्वजा शिखर पर फहराई जाती है, तो यह केवल मंदिर का वैभव नहीं, बल्कि एक नए भारत की परिकल्पना को आकाश में लिखने जैसा है। “मैंने आने वाले एक हजार वर्षों के भारत के लिए नींव रख दी है”, यह वाक्य इतिहास का नहीं, भविष्य का उद्घोष है। और जब कहा जाता है, “यदि उसे मजबूत कर सकते हों, तो धर्मध्वजा की छाया में साथ आएं,” तो यह आह्वान प्रत्येक भारतीय के लिए है, हमारी चेतना के लिए, हमारे कर्तव्य के लिए, हमारे गौरव के लिए और हमारे भविष्य के लिए। रामध्वज अब केवल मंदिरों पर नहीं, भारत की आत्मा पर फहरा रहा है। अब दीवारें और शिखर हम सबको मिलकर खड़े करने हैं, तभी यह भारत आने वाले हजार वर्षों तक जगद्गुरु बनकर खड़ा रहेगा।
राम : भारत की सांसों में बसता एक शाश्वत आलोक
भारत की आत्मा, आस्था और आदर्श का अमिट प्रतीक है. भारत की सभ्यता जिस अविरल धारा की तरह अनादि काल से बहती चली आ रही है, उसके स्रोत में यदि कोई एक नाम सबसे उज्ज्वल, सबसे सुग्राह्य, सबसे प्रेरक और सबसे पवित्र दिखाई देता है, तो वह है, श्रीराम। राम केवल किसी धर्म के देव नहीं, किसी काव्य के नायक नहीं, किसी युग के इतिहास नहीं, वे भारत का सर्वस्व हैं। भारत का विचार, भारत की वाणी, भारत की चेतना, भारत की मर्यादा और भारत की आत्मा, सब कुछ। भारत की मिट्टी के कण - कण में, जन - मन के भाव - भाव में, भाषा - संस्कृति के अक्षर - अक्षर में, ऋषि - परंपरा के संकल्प - सत्य में, हर भाव, हर श्वास, हर प्रार्थना में एक ही स्वर उभरता है “जय श्रीराम”। यह सिर्फ एक उद्गार नहीं, यह भारत का आत्म-प्रकाश है। जब भारत की परिचय-रेखा खींची जाती है, तो उसमें पर्वत, नदियां, जंगल, धरती, इतिहास और ऋषि - परंपरा जितने महत्त्वपूर्ण हैं, उतनी ही गहराई से इसमें राम का नाम भी प्रतिध्वनित होता है। भारत के लिए राम आस्था के केन्द्र भर नहीं, बल्कि वह आत्मिक आधार हैं, जिस पर इस देश की सामूहिक चेतना खड़ी है। घर - घर के द्वार पर राम का नाम, जन - मन के आचरण में राम की नीति, और भारतीय जीवन के हर संकल्पात्मक उत्थान में राम का आदर्श, यह सब मिलकर एक अखंड राष्ट्र-स्वर रचते हैं। भारत के लिए राम का स्मरण देवत्व की वंदना से अधिक चरित्र की स्थापना है। राम इस राष्ट्र के भीतर उस दीपस्तंभ की तरह जलते हैं, जो अंधकार में भी दिशा दिखाता है, धैर्य की, धर्म की, सत्य की और मर्यादा की।
राम विचार हैं, विधान हैं, चेतना हैं और चिंतन भी
भारत का दर्शन, उसकी उपासना, उसकी संस्कृति, उसकी नीति - नेति, उसके ऋषि, उसके महापुरुष, सबकी जड़ों में राम का भाव समाया है। राम का जीवन स्वयं भारतीय चिंतन का एक पूर्ण ग्रंथ है। उनमें नीति है, विनय है, बल है, बुद्धि है, समर्पण है, संघर्ष है और समाधान भी। भारत का धार्मिक विधान, सामाजिक संस्कार, नैतिक अवधारणाएँ, लोक परंपराएँ, सभी को राम ने मर्यादा की उस पवित्र लकीर से जोड़ा, जो आज भी भारतीय जीवन का मूलाधार है। जो राम को समझ लेता है, वह भारतीय चिंतन के शिखर को छू लेता है। राम की प्रतिष्ठा धार्मिक मर्यादा की सीमा नहीं, बल्कि सत्य के प्रति अडिग निष्ठा का प्रताप है। वे जितने सरल, उतने ही शौर्यवान; जितने विनम्र, उतने ही पराक्रमी; जितने सहज, उतने ही प्रखर। राम नीति के पथ-प्रदर्शक हैं और नेति के निर्णायक भी, किसे करना है, किसे छोड़ना है, किसे अपनाना है, किससे दूर रहना है, इन सभी निर्णयों का उत्तम मार्ग यदि किसी ने दिखाया है, तो वह राम हैं। राम का प्रताप उनके धनुष में नहीं, बल्कि उनके धर्म में है। राम की शक्ति उनके शौर्य में नहीं, बल्कि उनकी सत्यनिष्ठा में है। राम की विजय उनके राज्याभिषेक में नहीं, बल्कि उनकी मर्यादा में है। राम मित्रता के ऐसे आदर्श हैं, जो समय के क्षरण में भी फीके नहीं पड़े। उनकी मित्रता में सत्ता की लालसा नहीं, केवल आत्मीयता की शुचिता है। वे निषादराज के कंधे पर रखे हाथ में भी उतने ही आत्मीय हैं, जितने सुग्रीव के राज्याभिषेक में। राम बताते हैं कि संबंध समानता पर नहीं, संवेदना पर टिकते हैं। यही कारण है कि राम समय की धारा में बदलते नहीं, वे भारतीय परंपरा की निरंतरता बनकर चलते हैं।
राम विजयोन्मुख शक्ति हैं और विश्व-विश्वास का विस्तार भी
राम की विजय किसी शत्रु पर नहीं, बल्कि अहंकार, अन्याय और अधर्म पर है। उनका विजयोन्मेष किसी तलवार का कौशल नहीं, बल्कि धर्म के संरक्षण का संकल्प है। राम एक ऐसे आदर्श हैं जिनमें बल भी है और करुणा भी; न्याय भी है और क्षमा भी; वाण भी है और वचन भी। उन्होंने दुनिया को यह बताया कि “विजय शक्ति से नहीं, सत्य से मिलती है।” राम जितने भारत के हैं, उतने ही विश्व के। उनका चरित्र विशुद्ध मानवता का संदेश है, विश्वास का, वचन का, वंदना का।
राम भारत का सर्वस्व, धड़कन और शाश्वत सत्य
राम भारतीय जीवन के भीतर लयबद्ध स्पंदन की तरह बसते हैं। नवजात शिशु के कानों में बोला जाने वाला पहला शब्द भी कई बार “राम” होता है, और मृत्यु के समय अंतिम स्मरण भी, “राम नाम सत्य है।” यह संयोग नहीं, यह संस्कृति की सांसों में बसा हुआ सत्य है। भारत के लोकगीत राम से शोभित हैं, रामायण की चौपाइयाँ भारत की आत्मा को मुखर करती हैं, गाँव 7- गाँव की कथाएँ राम की करुणा से भरी हैं, और भारत का प्रत्येक त्यौहार किसी न किसी रूप में राम की परंपरा से जुड़ा है। अयोध्या की पावन भूमि से लेकर हिमालय के निर्जन आश्रमों तक, दक्षिण सागर के तट से लेकर पूर्वोत्तर की पहाड़ियों तक, जहाँ भी कोई भारतीय बसता है, वहाँ राम स्वाभाविक रूप से बसते हैं। राम किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक युग का चरित्र हैं, नैतिकता के शिखर, आचरण की कसौटी, और मनुष्य के भीतर बसे देवत्व का प्रकाश। राम यह बताते हैं कि मनुष्य अपने जीवन को कितना ऊँचा उठा सकता है, यदि उसके भीतर सत्य हो, श्रद्धा हो, धैर्य हो, समर्पण हो, और मर्यादा हो। राम के बिना भारत का इतिहास अधूरा है, भारत की संस्कृति अधूरी है, भारत की आध्यात्मिक यात्रा अधूरी है। मतलब साफ है राम केवल पूजनीय नहीं, अनुभवनीय हैं। वे केवल आराध्य नहीं, आदर्श हैं। वे केवल कथा नहीं, जीवन का सत्य हैं। भारत राम में बसता है और राम भारत में। भारत की धड़कन राम हैं, भारत की प्रार्थना राम हैं, भारत की पहचान राम हैं। राम हमारे भीतर उस प्रकाश की तरह हैं जो अंधियारों को नहीं देखता, केवल उजाला रचता है। और जब तक भारत की मिट्टी में एक भी धड़कन जागृत है, राम अमर हैं। राम अनादि हैं। राम अनंत हैं। राम, भारत की आत्मा, भारत का आधार : एक शाश्वत सांस्कृतिक सत्य का महागान.
राम केवल देव नहीं, भारत की धड़कन हैं
भारत की संस्कृति में कुछ नाम ऐसे हैं जो मात्र उच्चारण भर से मन में श्रद्धा, शक्ति, मर्यादा और विश्वास का प्रकाश जगा देते हैं। “राम” उनमें सर्वोच्च हैं। यह नाम केवल किसी देवता का नाम नहीं, बल्कि भारत की चेतना का सार है। वह भावना है जो करोड़ों लोगों के हृदय में धड़कती है, वह आदर्श है जो कठिन समय में मार्ग दिखाता है, और वह प्रकाश है जिसके बिना भारतीय सभ्यता के किसी पक्ष की कल्पना भी अधूरी है। राम भारत की आस्था हैं, भारत का आधार हैं। वे विचार हैं, विधान हैं, चेतना और चिंतन हैं। वे प्रतिष्ठा भी हैं और प्रताप भी; प्रभाव भी हैं और नीति - नेति का सनातन मार्ग भी। मित्रता की मर्यादा, कर्तव्य का धर्म, विजय का प्रकाश और लोककल्याण की भावना, सब राम में समाहित है। यही कारण है कि भारत का हर पथ, हर पर्व, हर संस्कृति और हर धड़कन राममयी दिखाई देती है। आज जब विश्व भारतीय मूल्यों की ओर लौट रहा है, तब राम का आदर्श और भी प्रासंगिक हो उठा है। यह लेख राम को देवत्व से आगे बढ़कर एक सांस्कृतिक, मानवीय, दार्शनिक और राष्ट्रीय मार्गदर्शक के रूप में समझने का प्रयास है।
राम : भारत की आस्था का शाश्वत स्रोत
भारतीय जनता की आस्था केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं। यह जीवन जीने का आधार है। इस देश में जन्म लेते ही बच्चों के कानों में पहली ध्वनि “राम-राम” की ही पड़ती है। किसी अनजाने से मिलते समय भी भारतवासी ‘राम-राम’ कहकर ही संवाद आरम्भ करता है, क्योंकि यह अभिवादन मात्र शब्द नहीं, बल्कि पवित्र संबंध का सेतु है। ग्राम-देहातों से लेकर नगरों और महानगरों तक, राम की छवि लोगों के भीतर ऐसी बसती है मानो वह स्वयं परिवार का हिस्सा हों। वे दुःख में आस्था का आसरा हैं, और उत्सव में उमंग के प्रतीक। इसी आस्था ने सहस्राब्दियों तक भारत को एकसूत्र में पिरोए रखा। राम का जीवन किसी राजकुमार की कहानी नहीं, बल्कि धर्म, नीति, त्याग और मर्यादा का जीवन-दर्शन है। राम का विचार केवल धर्म का विचार नहीं, अधर्म, अन्याय और क्रूरता के विरुद्ध खड़े होने का विचार है। उन्होंने सत्ता के लिए नहीं, बल्कि सत्य के लिए संघर्ष किया। आज के समय में जब दुनिया अस्थिरताओं से घिरी दिखाई देती है, तब राम का विचार मानवता का संतुलन बनकर सामने आता है। रामराज्य केवल एक राजनीतिक आदर्श नहीं, बल्कि यह मानवीय शासन का सर्वोत्तम स्वरूप है, जहाँ राजा की सफलता उसकी सुख-सुविधा से नहीं, बल्कि जनता के सुख से मापी जाती है। जहाँ शासन शक्ति का उपकरण नहीं, सेवा का माध्यम होता है। राम एक चेतना हैं, ऐसी चेतना जो व्यक्तियों को नहीं, समाज को बदलती है। वे समुदायों को जोड़ते हैं, सीमाओं को पार करते हैं, और मनुष्यता को सर्वोच्च स्थान देते हैं। राम का चिंतन मनुष्य को सिखाता है, जीवन की कठिन परिस्थितियाँ भी यदि मर्यादा के भीतर जिया जाए, तो वे ही महान गाथा बन जाती हैं। राम का चिंतन आदर्श है, किंतु वह आदर्श जीवन की वास्तविकताओं से संघर्ष करते हुए चमकता है। राम की प्रतिष्ठा केवल अयोध्या के राजकुमार की प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि धर्म के राजाधिराज की प्रतिष्ठा है। उनका प्रताप बाणों में नहीं, बल्कि नैतिक बल में था। उनका प्रभाव किसी सत्ता का प्रभाव नहीं, बल्कि आदर्श का प्रभाव था। राम ने सत्ता के लिए नहीं, सत्य के लिए युद्ध किया। उन्होंने व्यक्तिगत इच्छाओं का त्याग कर लोकहित को चुना। उन्होंने वचन को जीवन से बड़ा माना। यही कारण है कि राम का प्रताप समय के साथ नहीं घिसा, बल्कि बढ़ता गया। आज भी दुनिया में जब नैतिक राजनेता की चर्चा होती है, तो राम का आदर्श पहली पंक्ति में खड़ा दिखाई देता है। राम के जीवन में मित्रता केवल संबंध नहीं, बल्कि धर्म है। निषादराज, सुग्रीव, हनुमान, विभीषणकृप्रत्येक संबंध राम के चरित्र को एक नया आयाम देता है। उन्होंने दिखाया कि मित्रता व्यक्ति की जाति, रूप, धन या पद से नहीं, बल्कि हृदय की पवित्रता और निष्ठा से जन्म लेती है। मित्रता केवल सुख का नहीं, संकट का साथ होती है। जो साथ धर्म का हो, वही सच्चा साथ होता है। राम की मित्रता भारतीय समाज में आदर्श बन गई, यही परंपरा आज भी पवित्र रिश्तों को मजबूती देती है।
राम : विजय का प्रकाश, अहंकार पर जीत की कथा
राम की विजय केवल रावण पर विजय नहीं, बल्कि अहंकार पर, अज्ञान पर, अतिशय बल पर, और सामर्थ्य-भ्रम पर विजय है। रावण का बध केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं था, वह हर उस प्रवृत्ति का अंत था जो शक्ति को ज्ञान से ऊपर रखती है। राम विजयोन्मुख इसलिए हैं क्योंकि उनकी विजय धर्म पर आधारित थी, अत्याचार, लालच और अधर्म के विरुद्ध न्याय के पक्ष में खड़ी थी। राम केवल भारत के नहीं, विश्व के नायक हैं। इंडोनेशिया, कम्बोडिया, थाईलैंड, नेपाल, श्रीलंका, जापानकृदर्जनों देशों में रामकथा आज भी जीवित है। क्योंकि राम का चरित्र ऐसा है जो सीमा नहीं देखता, जाति नहीं पूछता, भाषा नहीं पूछता, बल्कि केवल मानवता को प्राथमिकता देता है। राम ऐसा नाम है जिस पर दुनिया भरोसा करती है, और यही भरोसा भारतीय संस्कृति को वैश्विक बनाता है। राम भारत के लिए केवल देवता नहीं, बल्कि भाव, प्रतीक और पथप्रदर्शक हैं। भारत का हर त्योहार, हर गीत, हर परंपरा राम से सुगंधित है। राम अतीत में थे, वर्तमान में हैं और भविष्य में भी रहेंगे। क्योंकि राम किसी ग्रंथ के पृष्ठों में नहीं, बल्कि जन-जन के हृदय में निवास करते हैं। वे भारत का सर्वस्व हैं, भारत की धड़कन, भारत का विश्वास और भारत का शाश्वत सत्य। राम भारतीय सभ्यता की वह लौ हैं जो बुझती नहीं। वे वह शक्ति हैं जो थके हुए मन को आशा देती है, वह मर्यादा हैं जो रास्ता भटकने नहीं देती, वह आदर्श हैं जो समय की धुंध में भी उजाले की तरह चमकते हैं। राम को समझना भारत को समझना है। राम को अपनाना भारत की आत्मा को अपनाना है। और राम को मानना, सत्य, प्रेम, त्याग और मर्यादा के उस मार्ग को मानना है, जिससे यह देश महान बना, महान है और महान रहेगा।
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी





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