मुंबई की नमी भरी हवा में 24 नवंबर की सुबह जब यह खबर तैरकर सामने आई कि धर्मेंद्र अब हमारे बीच नहीं रहे, तो सिर्फ एक अभिनेता का नहीं, एक युग का दीपक बुझने का अहसास हुआ। उनकी मुस्कान में जो सहजता थी, वह अब परदे पर नहीं लौटेगी। उनकी नज़रों में जो विनम्र चमक थी, वह अब किसी नई कहानी की शुरुआत नहीं करेगी। धर्मेंद्र का जाना ठीक वैसे ही है जैसे कोई पीपल का पेड़ गिर जाएं, जिसकी छाया में कई पीढ़ियां बैठकर अपना बचपन, जवानी और बुढ़ापा जी चुकी हों। वह पेड़ भले गिर जाए, लेकिन उसकी जड़ें जमाने की मिट्टी में अनंत होती हैं। धर्मेंद्र भी ऐसे ही थे, जड़ से जुड़े, मिट्टी की महक लिए, परदे का ऐसा सूरमा जो जितना चमका, उतना ही विनम्र भी रहा, हर युग में कुछ लोग ऐसे पैदा होते हैं जो समय के दायरे से बाहर खड़े दिखाई देते हैं, ार्मेंद्र उनमें से एक थे। अगर उन्हें धर्मेंद्र नहीं, ‘धरती-मोहेन्द्र’ कहे तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. वे एक ऐसे अभिनेता रहे, जिन्होंने शरीर की ताकत से ज्यादा दिलों की मजबूती से अभिनय किया। उन्होंने सिनेमा को मनोरंजन से ज्यादा भावनाओं का उत्सव बनाया। उन्होंने भारत को केवल फिल्में नहीं दीं, बल्कि एक संस्कृति दी, सादगी, प्रेम और सत्य की संस्कृति। उनके जाने के बाद भी, कई दशक तक हर भारतीय दिल में एक वीरू जिंदा रहेगा, एक सज्जन हीरो मुस्कुराता रहेगा, और एक देवदास-सा भावुक दिल धड़कता रहेगा। धर्मेंद्र का सफर समाप्त हुआ, लेकिन उनका युग शुरू हो गया। क्योंकि वे सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे, वे भारतीय आत्मा का सबसे सुंदर रूप थे
पिता की भूमिका और राजनीतिक जीवन
1980 के बाद धर्मेंद्र ने धीरे-धीरे चरित्र-भूमिकाएं अपनाना शुरू किया। उन्होंने बड़ी-बड़ी एक्शन फिल्मों के साथ-साथ व्यावसायिक और अधिक परिपक्व भूमिकाओं में भी अपना योगदान दिया। उनकी जीवन-साथी हेमा मालिनी के साथ उनकी ऑन-स्क्रीन जोड़ी बहुत लोकप्रिय रही। दोनों ने कई फिल्मों में साथ काम किया और बाद में शादी भी की। राजनीति में भी धर्मेंद्र सक्रिय रहे। 2004 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा और सांसद बने। उन्होंने 2004-2009 तक सांसद के रूप में सेवा की।परिवार, विवाह और विरासत
धर्मेंद्र की व्यक्तिगत जिंदगी उतनी ही रंगीन थी जितना उनका करियर। उनका पहला विवाह प्रकाश कौर से हुआ, जिनके साथ उन्होंने चार बच्चे- सनी देओल, बॉबी देओल, और दो बेटियाँ अजीता और विजेता हैं। 1980 में उन्होंने हेमा मालिनी से शादी की, जबकि वह पहले से ही विवाहित थे। उनके और हेमा मालिनी के दो बच्चे हैं, ईशा देओल और आहाना देओल। यह एक जटिल पारिवारिक व्यवस्था थी, जिसे मीडिया और जनता ने लंबे समय तक दिलचस्पी से देखा। उनकी जीवनशैली में सादगी बहुत महत्त्वपूर्ण थी। उनके पास मुंबई के बाहर एक बहुत बड़ा (लगभग 100 एकड़) फार्महाउस है, जहाँ वे अक्सर समय बिताते थे और प्रकृति के करीब रहना पसंद करते थे। उन्होंने फिल्मों के ग्लैमर से अलग अपनी एक शांत और आत्मिक दुनिया बनाई थी।
सम्मान और पुरस्कार
धर्मेंद्र को उनकी फिल्मी यात्रा के लिए अनेक सम्मान मिले : फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड, 1997 में उन्हें यह पुरस्कार मिला। पद्म भूषण : भारत सरकार ने 2012 में उन्हें यह नागरिक सम्मान दिया, जो उनकी सिनेमा में दीर्घकालीन और महत्वपूर्ण भूमिका का प्रमाण है। उनकी फिल्मों का जन-प्रियता, उनकी बहुमुखी प्रतिभा और स्क्रीन-प्रेजेंस उन्हें भारतीय सिनेमा का अविस्मरणीय हिस्सा बनाती है।
भारत के गांवों के लड़के थे धर्मेंद्र
बहुतों के लिए धर्मेंद्र सिर्फ फिल्म स्टार थे। कईयों के लिए वे हेमा मालिनी के जीवनसाथी, या सनी-बॉबी जैसे सुपरस्टार बेटों के पिता। लेकिन भारत के गाँव-कस्बों के लिए वे अपना लड़का थे, जो पर्दे पर भी उतना ही सच्चा लगता था, जितना खेत की मेड़ों पर चलते किसान का बेटा। पंजाब की मिट्टी में जन्मा यह युवा मुंबई पहुँचा तो उसके पास न दौलत थी, न पहचान, सिर्फ सपना था और उसमें इतना ताप कि तमाम संघर्ष पिघल जाएँ। धर्मेंद्र जब पहली बार स्क्रीन पर आए, तो चेहरे पर ऐसी सादगी और आँखों में ऐसी सचाई थी कि लोग समझ ही नहीं पाए, ये अभिनेता है या किसी खेत की पगडंडी से उठकर आया कोई सच्चा इंसान। धर्मेंद्र की लोकप्रियता सिर्फ रोमांस, मर्दानगी या एक्शन का नतीजा नहीं थी। वह इसलिए भी लोगों के दिल में बसे क्योंकि उन्होंने हर आम आदमी को खुद को उनमें देखने का मौका दिया। वे सिनेमा के ऐसे नायक थे, जो गुस्से में भी सज्जन लगते थे और प्रेम में भी मर्यादा नहीं छोड़ते थे, जिनकी मुस्कान में शरारत थी, पर संजीदगी भी और जिनकी आँखें संवाद से ज्यादा कहानी कह देती थीं. जब धर्मेंद्र स्क्रीन पर रोते, दर्शक का दिल नम हो जाता। जब वे हँसते, पूरे हॉल में ठहाके गूंजते। और जब लड़ते, तो लगता कि यह लड़ाई हर उस अन्याय के खिलाफ है जिसे आम आदमी रोज झेलता है। वह हीरो नहीं थे, वह भावनाओं के वैध प्रतिनिधि थे।वह 10 फिल्में जिनमें धर्मेंद्र अमर हो गए
धर्मेंद्र के करियर में लगभग 300 फिल्में हैं, लेकिन कुछ फिल्में ऐसी हैं जो उनकी प्रतिभा, उनकी आत्मा और उनकी विरासत का सार बन गईं।
1. शोले : वीरू की अमर मुस्कान : “बसंती, इन कुत्तों के सामने मत नाचना....” वीरू सिर्फ किरदार नहीं, वह भारतीय युवाओं के सपनों का चेहरा बन गया। मस्ती, दोस्ती, बहादुरी और रोमांस, एक ही चरित्र में इतने रंग शायद ही किसी अभिनेता ने उत्री सहजता से भरे हों।
2. फूल और पत्थर : वह पत्थर जो भीतर फूल था, यह फिल्म धर्मेंद्र की पहले सुपरहिट साबित हुई। वह कठोर भी लगे, और भीतर से नरम भी। उनकी आँखों की ंबजपदह ने लाखों दिलों को छुआ।
3. मेरा गाँव मेरा देश : मिट्टी का सच्चा सिपाही, ग्रामीण पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म ने धर्मेंद्र को देहात का असली नायक बना दिया। यह फिल्म आज भी गांवों में टीवी पर सबसे ज्यादा देखी जाती है।
4. चुपके चुपके : बुद्धि और मुस्कान का अनोखा संगम, हास्य-थ्रिल-कॉमेडी का ऐसा मीठा रूप सिर्फ धर्मेंद्र ही दे सकते थे। लोग आज भी इस फिल्म के संवादों को याद कर हँस पड़ते हैं।
5. बंदिनी : भावनाओं की मद्धम धार, उनकी संवेदनशीलता, उनकी विनम्रता, उनकी आँखों की कहानी, सब कुछ इस फिल्म में शिखर पर था।
6. अनुपमा : मौन का कलाकार, धर्मेंद्र यहाँ कम शब्दों में अधिक गहराई वाला अभिनय करते हैं। यह फिल्म उनकी आत्मा का विस्तार है।
7. यादों की बारात : रोमांस और स्टाइल का समुंदर, उनकी स्टाइल, उनकी एंट्री और उनका तेज, इस फिल्म को आइकॉनिक बनाते हैं।
8. जुगनू : जीवन की खिलखिलाहट, इस फिल्म में धर्मेंद्र का चमकता, चंचल और जोश से भरा चेहरा देखने को मिलता है।
9. धर्म वीर : परदे का शहीद-योद्धा, एक उपलब्धियों से भरी फिल्म जिसने धर्मेंद्र को बॉक्स ऑफिस का बादशाह बना दिया।
10. सीता और गीता : रोमांस की मासूम पनाह, हेमा, धर्मेंद्र की जोड़ी यहाँ खिलकर सामने आई।
धर्मेंद्र और प्रेम : फिल्मों से परे की एक दास्तान
धर्मेंद्र की जिंदगी प्रेम से बनी एक कथा भी है। हेमा मालिनी के साथ उनका रिश्ता जितना चर्चित रहा, उतना ही शालीन भी। वह फिल्मों की दुनिया के शायद आखिरी ‘निजी’ कलाकार थे, जो बात बहुत कम करते, पर प्रेम बहुत गहराई से निभाते। उनका मोहब्बत करने का अंदाज सिनेमा को भी नई ऊंचाई दे गया, दिल से बोलना, दिल से जीना, दिल से मुस्कुराना।
देहात का बेटा, शहर का सितारा
धर्मेंद्र की सबसे बड़ी पहचान यही रही कि वे सुपरस्टार होकर भी सितारे की तरह दूरी बनाकर नहीं रखते थे। गाँव के लोग आज भी कहते हैं, “धर्मेंद्र अपना ही लड़का लगता है।” उनकी बोली में देसीपन था, व्यवहार में विनम्रता थी, और पहनावे में सादगी। वे स्टार नहीं, अपनत्व की परंपरा थे।
धर्मेंद्र जैसा कोई नहीं
कहना गलत नहीं होगा कि आज की फिल्में धर्मेंद्र जैसे अदाकार को खोजती हैं, जो एक्शन में शेर हो, प्रेम में नदी, संवेदना में दीपक, और हास्य में चांदनी। नई पीढ़ी के सितारे उनसे प्रेरणा लेते हैं, लेकिन धर्मेंद्र जैसा संतुलन शायद ही कोई दोबारा पा सके।
आखिरी सफर, लेकिन अमरता की शुरुआत
धर्मेंद्र का देहावसान हो गया, पर उनका असर आज भी, टीवी के हर चैनल पर इंटरनेट के हर फ्रेम में और हर भारतीय के दिल में मौजूद है। वह शरीर से चले गए, लेकिन परदे पर अमर हैं। भारत के गाँवों में जब अगली बार कोई लड़का खेत में हल चलाते हुए गीत गुनगुनाएगा, तो कहीं न कहीं उसके सुरों में धर्मेंद्र की छाया होगी। किसी शहर में जब कोई युवक अपने दोस्त के कंधे पर हाथ रखकर कहेगा, “यार, दोस्ती हो तो जय - वीरु जैसी,” तो वीरू वहीं उपस्थित होगा। और जब कोई बुजुर्ग चुपके चुपके देखकर मुस्कुराएगा, तो वह मुस्कान धर्मेंद्र की अमर देन होगी।
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी




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