भारत की धरती सहस्राब्दियों पुरानी सभ्यता की गवाही देती है, जहां ऋषि-मुनियों की वाणी ने वेद रचे, जहां कृष्ण ने धर्म का घोष किया और जहां हर पहाड़, हर नदी, हर घाट में इतिहास के पदचिह्न बसते हैं। पर इसी गौरवशाली भूमि की स्मृति पर कुछ ऐसे नाम भी दर्ज हैं, जो इस देश के नहीं, इसके घावों के प्रतीक हैं। बाबर, औरंगज़ेब, तुगलक, खिलजी... ये वे नाम हैं जो भारतीय संस्कृति के रक्षक नहीं, बल्कि आक्रांताओं के पर्याय हैं। वे नाम जिन्हें हमने न केवल इतिहास की किताबों में पढ़ा, बल्कि अपनी गलियों, शहरों और मस्जिदों की दीवारों पर भी ढोया, मानो पराजय की स्मृति को ही विरासत मान लिया हो. ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है क्या नाम बदलने से इतिहास मिट जाएगा? नहीं, लेकिन आत्मग्लानि अवश्य मिट जाएगी. इतिहास किताबों में रहेगा। साक्ष्यों और अभिलेखों में रहेगा। विश्वविद्यालयों में शोध होता रहेगा। परंतु सार्वजनिक नामों का उद्देश्य इतिहास सिखाना नहीं, इतिहास की पीड़ा को ढोना भी नहीं, बल्कि समाज को प्रेरणा देना है। और प्रेरणा वहीं से आती है जहां सम्मान हो, जहां आत्मसम्मान हो। भारत अब जाग रहा है, नामों की लड़ाई आत्मसम्मान की लड़ाई है. सदियों तक जो भारत मौन रहा, अब मुखर है। जिस भारत ने पराजय की स्मृतियां ढोईं, अब उन्हें उतार रहा है। जिस भारत ने आक्रांताओं के नाम सहन किए, अब पूछ रहा है, क्यों? और यही प्रश्न हमें उस दिशा में ले जा रहा है जहां, शहर अपने प्राचीन नाम पा रहे हैं, घाट अपने वास्तविक स्वरूप में लौट रहे हैं, मंदिर अपनी सत्यनिष्ठा पुनः पा रहे हैं, और समाज अपने आत्मसम्मान का रास्ता पहचान रहा है। यह इतिहास का मिटना नहीं, यह इतिहास का पुनर्जीवन है
बाबर : हमलावर, न वंशज न रक्षक
इतिहास के पन्नों को थोड़ा उलटें। बाबर एक क्षणिक आक्रांता था। मध्य एशिया की पहाड़ियों से आया था। उसे भारत की मिट्टी से कोई आत्मीयता नहीं थी। उसने भारत को न अपना घर माना, न अपनी संस्कृति। उसका शासन काल केवल चार वर्ष चला। परंतु इसी अल्पकाल में उसने जो किया, उसकी छाया सदियों तक रही, मंदिरों के ध्वंस, कर संरचना में भेदभाव, स्थानीय परंपराओं का दमन, और सत्ता को बल-प्रदर्शन से स्थापित करने की नीति, क्या ऐसे व्यक्ति का नाम किसी धार्मिक स्थल, मस्जिद पर होना तर्कसंगत है? मस्जिद तो अल्लाह का घर है, ईश्वर का घर। परंतु जब उसका नाम किसी हमलावर से जोड़ दिया जाएं, तो वह श्रद्धा नहीं, राजनीतिक प्रभुत्व की याद बन जाता है।
मंदिरों को गिराकर बनाई गई इमारतें, धार्मिक स्थल नहीं, सत्ता का प्रतीक
बाबर या उसके सेनापति मीरबाकी ने जब मंदिर गिराकर मस्जिद बनाई, तो उनका उद्देश्य धार्मिक पूजन नहीं था; वह था सत्ता का संदेश देना, “देखो, इस क्षेत्र का देवता अब हमारा आदेश मानेगा।” मंदिर तोड़ना केवल वास्तुकला तोड़ना नहीं था। भारत की संस्कृति में मंदिर, शिक्षा का केंद्र, कला का केंद्र, न्याय का केंद्र, और सामाजिक जीवन का आधार थे। उन्हें तोड़ना भारतीय समाज की जड़ों पर प्रहार था। तो क्या हम उन स्मारकों को आज भी “धार्मिक विरासत” कहें? यह इतिहास की गलत व्याख्या है।
नाम बदलने का विरोध, क्या वाकई इतिहास बचाना है?
जब नाम बदलने की चर्चा होती है, कई लोग कहते हैं, “इतिहास मत मिटाओ।” परंतु सत्य यह है कि नाम नहीं बदलने का आग्रह इतिहास बचाने का नहीं, बल्कि विजेताओं द्वारा छोड़ी गई मानसिक कैद को ढोने का आग्रह है। इतिहास किताबों में रहेगा, शोधपत्रों में रहेगा, विश्वविद्यालयों की लाइब्रेरी में रहेगा। क्या कोई राष्ट्र अपने आक्रांताओं का गुणगान करता है? दुनिया में कोई उदाहरण नहीं। दुनिया के उदाहरण, कहीं भी आक्रांताओं की महिमा नहीं की जाती. फ्रांस ने नेपोलियन के क्रूर सेनापतियों के नाम मिटाए। अमेरिका में दासता समर्थक नायकों की मूर्तियां हटाई गईं। यूरोप ने हिटलर काल से जुड़े हर नाम, हर निशान को समाप्त किया। रूस में स्टालिन की दमनकारी स्मृतियों को बदल दिया गया। जापान में किसी विदेशी आक्रांता का एक भी नाम सार्वजनिक संरचना पर नहीं मिलता। तो फिर भारत ही क्यों अपने हत्यारों, लुटेरों और विध्वंसकों के नाम ढोए. यह प्रश्न जितना सांस्कृतिक है, उतना ही मानसिक मुक्ति का प्रश्न भी है।
आत्मग्लानि, वह एहसास जो नामों में छिपा जख्म बन गया
जब कोई हिन्दू, कोई भारतीय, अपनी गली या अपने शहर का नाम किसी आक्रमणकारी के नाम पर सुनता है, तो मन अनायास ही सिकुड़ जाता है। यह पीड़ा केवल धर्म की नहीं, यह राष्ट्रीय अस्मिता की है। यह केवल यह नहीं कहती कि बाबर आया था, यह कहती है, भारत कभी पराजित हुआ था। यह स्मरण शिक्षा नहीं है। यह स्मरण मानसिक गुलामी है।
भारतीय पुनर्जागरण, नामों की वापसी आत्मसम्मान की वापसी है
पिछले दशक में भारत में एक सशक्त सांस्कृतिक पुनर्जागरण शुरू हुआ है। यह राजनीति नहीं, सभ्यतागत जागरण है। इलाहाबाद फिर से प्रयागराज हुआ। फैजाबाद अपनी पहचान अयोध्या के रूप में लौटा। मुग़लसराय पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर बना। इन परिवर्तनों ने संदेश दिया, भारत अब अपनी आत्मा को पुनः खोज रहा है। आज हर राज्य, हर नगर में यह मांग उठना स्वाभाविक है
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी


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