कांगे्रस ने अपनी स्थिति स्वयं ही कमजोर की है। क्षेत्रीय दलों के सामने समर्पण करने के बाद भी कांग्रेस अपने को बहुत बड़ा दल मानती है और वैसा ही व्यवहार भी करती है। जबकि राजद ने कांग्रेस को ज्यादा भाव नहीं दिया। राष्ट्रीय जनता दल की हार के पीछे एक बड़ा कारण यह भी माना जा रहा है कि बिहार में फिर से यादव राज की संभावना से मतदाता नाराज हुआ, इसके जानने के बाद भी तेजस्वी ने सहयोगी दलों की आवाज को अनसुना करते हुए विधानसभा के चुनाव में राजद की ओर से 52 प्रत्याशियों को मैदान में उतार दिया। इससे अन्य मतदाता इनकी ओर उतना नहीं आ सका, जितनी उम्मीद की जा रही थी। इसको भाजपा के राजनीतिक हथियार के रूप में उपयोग किया, जो भाजपा के लिए लाभदायक साबित हुआ। बिहार के मतदाताओं ने प्रदेश की जो राजनीतिक तस्वीर बनाई है, वह चुनाव बाद किए गए सर्वेक्षण को सही साबित कर रहे हैं। इस सर्वेक्षण को राजद के नेता तेजस्वी पूरी तरह से नकार चुके थे, लेकिन अब परिणाम के बाद तेजस्वी को यही लग रहा होगा कि सर्वेक्षण सही थे। इसके बाद राजद की अब सबसे बड़ी दुविधा यह भी है कि उनके परिवार में चल रही विरासत की लड़ाई में राजद की कमान कौन संभालेगा। क्योंकि तेजस्वी और तेजप्रताप में एक दूसरे को कमजोर करने की राजनीति का खेल चल रहा है। तेजप्रताप भले ही राजनीतिक उत्थान नहीं कर पाए, लेकिन उन्होंने तेजस्वी के बढ़ते कदमों पर बहुत बड़ा ब्रेक लगा दिया है। इसे कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि तेजप्रताप को खड़ा करने के लिए अंदर की राजनीति ही काम कर रही है। राजद में जो नेता तेजस्वी को नापसंद करते थे वे स्वाभाविक रूप से तेजप्रताप के पाले में खड़े हो गए। इसमें खास तथ्य यह भी है कि कई लोग खुलकर साथ थे तो कई राजनेता अंदर ही अंदर तेजस्वी की जड़ को काट रहे थे।
राष्ट्रीय जनता दल की सबसे बड़ी कमजोरी यह भी मानी जा सकती है कि लोकतांत्रिक चुनाव में क्या केवल लालू प्रसाद यादव का परिवार ही राजद का उत्तराधिकारी हो सकता है। क्योंकि लालू यादव के दोनों ही पुत्र अपने आपको खानदानी विरासत का उत्तराधिकारी मानने का दावा कर रहे हैं। हम यह जानते ही होंगे कि दो की लड़ाई में हमेशा तीसरे का ही फायदा होता है। इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि राजद नेताओं की आपसी लड़ाई का लाभ भी दूसरे राजनीतिक दलों को ही हुआ होगा। विपक्ष के सामने सबसे कठिन स्थिति यही थी कि जब प्रदेश में उनकी सरकार रही, तब के बिहार और वर्तमान बिहार की स्थिति में बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ है। मतदाताओं ने इन दोनों स्थितियों का भी अध्ययन किया ही होगा। अब बिहार जंगलराज के टैग से बाहर निकल चुका है, इसलिए बिहार का मतदाता बिहार के लिए फिर से जंगलराज का टैग लगाने की मानसिकता में नहीं था। विपक्ष के पास इतना बोलने का सामर्थ्य भी नहीं था कि यह अपने शासन की उपलब्धियों को बताने का साहस कर पाता। दूसरा कांग्रेस सहित विपक्ष के दलों की ओर से वोट चोरी का मामला उठाकर हवा को अपनी ओर मोड़ने का प्रयास किया, लेकिन उसके प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सके। जो प्रमाण दिए गए, वह फुस्स हो गए। मतगणना के बाद स्वाभाविक रूप से बिहार की राजनीति में फिर से भूचाल आना तय है। आपस में ही आरोप लगाने की राजनीति शुरू होगी। हार का ठीकरा फोड़ने की कवायद भी होगी। इसके अलावा यह भी हो सकता है कि इसका ठीकरा हर बार की तरह ईवीएम पर फोड़ा जाए। इसके अलावा विपक्ष के पास वोट चोरी का मुद्दा तो पहले से ही तैयार है। विपक्ष के राजनीतिक दलों को सोचना चाहिए कि जब घर में पराजित करने वाले पैदा हो जाएं, तब दूसरों को दोष देना उचित नहीं। अपनी स्वयं की स्थिति का आकलन करना ही चाहिए। कांग्रेस और राजद के पास अब आत्ममंथन के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचता।
सुरेश हिन्दुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार
लश्कर ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
मोबाइल : 9770015780

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