एक जनवरी बलिदान दिवस पर विशेष : सफ़दर हाशमी के बलिदान को भूल गए लोग? - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 31 दिसंबर 2025

एक जनवरी बलिदान दिवस पर विशेष : सफ़दर हाशमी के बलिदान को भूल गए लोग?

Balidan-diwas
भारतीय लोकतंत्र, कला और जनसंघर्ष के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो समय के साथ धुंधले नहीं पड़ने चाहिएं, बल्कि और अधिक उज्ज्वल होने चाहिएं। सफ़दर हाशमी ऐसा ही एक नाम है। वे केवल एक रंगकर्मी या नाटककार नहीं थे, बल्कि जनता की आवाज़, शोषितों की पीड़ा और सत्ता से सवाल करने वाली चेतना थे। आज यह प्रश्न बार-बार उठता है, क्या हम सफ़दर हाशमी के बलिदान को भूलते जा रहे हैं? क्या उनकी शहादत केवल स्मृति दिवसों और औपचारिक श्रद्धांजलियों तक सिमट कर रह गई है?


नुक्कड़ से उठी आवाज़

सफ़दर हाशमी ने रंगमंच को अभिजात्य सभागारों से निकालकर सड़कों और गलियों तक पहुँचाया। वे मानते थे कि असली दर्शक वही है, जो जीवन की सबसे कठोर परिस्थितियों से जूझ रहा है, मज़दूर, किसान, छात्र और आम नागरिक। नुक्कड़ नाटक उनके लिए कला का नहीं, बल्कि लोकतंत्र का माध्यम था। उनके नाटक सत्ता के दंभ, पूँजी के शोषण और सामाजिक असमानता पर सीधा प्रहार करते थे। वे दर्शकों से संवाद करते थे, उपदेश नहीं देते थे।


जन नाट्य मंच और वैचारिक संघर्ष

सफ़दर हाशमी जन नाट्य मंच के प्रमुख स्तंभ थे। यह मंच केवल नाटक करने का संगठन नहीं था, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन था। ‘हल्ला बोल’, ‘मशीन’, ‘औरत’ जैसे नाटक आज भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि वे उन प्रश्नों को उठाते हैं, जिनसे समाज अक्सर मुँह मोड़ लेता है। हाशमी के लिए कला तटस्थ नहीं हो सकती थी; वह या तो शोषक के पक्ष में होती है या शोषित के।


1 जनवरी 1989ः अभिव्यक्ति पर हमला

1 जनवरी 1989 को ग़ाज़ियाबाद के साहिबाबाद क्षेत्र में जन नाट्य मंच द्वारा एक नुक्कड़ नाटक का मंचन किया जा रहा था। विषय था-मज़दूरों के अधिकार। तभी राजनीतिक हिंसा ने कला पर हमला कर दिया। सफ़दर हाशमी को बेरहमी से पीटा गया। अगले दिन 2 जनवरी को उन्होंने दम तोड़ दिया। यह केवल एक कलाकार की हत्या नहीं थी, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर किया गया सुनियोजित प्रहार था।


क्या समाज सचमुच शोकाकुल हुआ?

उस समय देशभर में आक्रोश फैला। कलाकारों, बुद्धिजीवियों और आम लोगों ने इस हत्या की निंदा की। लेकिन समय के साथ सवाल उठता है-क्या यह आक्रोश टिकाऊ था? क्या हमने इस घटना से सबक लिया? या फिर हम भीड़ की तरह कुछ दिनों का शोर मचाकर चुप हो गए?


विस्मृति के कारण

आज सफ़दर हाशमी की चर्चा सीमित दायरे में सिमटती दिखती है। इसके कई कारण हैं। पहला, तेज़ी से बदलता समय, सोशल मीडिया और तात्कालिक सूचनाओं के युग में गहन वैचारिक विमर्श के लिए धैर्य कम होता जा रहा है। दूसरा, सुविधाजनक चुप्पी, सत्ता को सवाल पूछने वाले कलाकार असहज करते हैं, इसलिए उन्हें भुला देना आसान होता है। तीसरा, औपचारिक स्मरण, हमने स्मृति को रस्म बना दिया है। माल्यार्पण, गोष्ठी और दो भाषण, बस यहीं तक सीमित। चौथा, शिक्षा से दूरी, हमारे पाठ्यक्रमों में सफ़दर हाशमी जैसे जनपक्षधर कलाकारों को वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे अधिकारी थे।


आज के दौर में सफ़दर हाशमी

आज जब असहमति को देशद्रोह समझ लिया जाता है, जब कलाकारों और लेखकों को डराया जाता है, तब सफ़दर हाशमी और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि सवाल पूछने की आज़ादी से जीवित रहता है। अगर कला सत्ता की प्रशंसा तक सीमित हो जाए, तो वह अपने मूल उद्देश्य से भटक जाती है।


क्या नई पीढ़ी जानती है?

यह चिंता का विषय है कि नई पीढ़ी का बड़ा हिस्सा सफ़दर हाशमी के नाम और काम से अपरिचित है। वे चे ग्वेरा या वैश्विक प्रतीकों को तो जानते हैं, लेकिन अपने ही देश के उस कलाकार को नहीं, जिसने लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए जान दे दी। यह केवल पीढ़ी की भूल नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक विफलता है।


सक्रिय स्मरण की ज़रूरत

सफ़दर हाशमी को याद करने का अर्थ केवल उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाना नहीं है। उनका असली स्मरण तब होगा, जब नुक्कड़ नाटक फिर से सड़कों पर लौटेंगे, कलाकार सत्ता से प्रश्न पूछने का साहस करेंगे, शिक्षा में कला और विचार को साथ-साथ महत्व मिलेगा और समाज असहमति को दुश्मनी नहीं, लोकतंत्र की ताक़त मानेगा।


साहित्य और रंगमंच की जिम्मेदारी

आज के साहित्यकार और रंगकर्मी पर यह नैतिक दायित्व है कि वे हाशमी की परंपरा को आगे बढ़ाएँ। यह ज़रूरी नहीं कि हर कलाकार वही भाषा या शैली अपनाए, लेकिन जनपक्षधर दृष्टि बनाए रखना अनिवार्य है। अगर कला केवल पुरस्कार, मंच और तालियों की भूखी हो जाए, तो सफ़दर हाशमी की शहादत व्यर्थ लगने लगेगी। तो क्या लोग सफ़दर हाशमी के बलिदान को भूल गए हैं? शायद पूरी तरह नहीं, लेकिन खतरा ज़रूर है। स्मृतियाँ तभी जीवित रहती हैं, जब उन्हें कर्म में बदला जाए। सफ़दर हाशमी का जीवन और मृत्यु हमें यह सिखाती है कि कला, विचार और साहस, तीनों एक साथ चलें, तभी लोकतंत्र मज़बूत होता है। यदि हम उनके सवालों को जीवित रखते हैं, तो वे हमारे बीच हैं। अगर नहीं तो इतिहास हमें माफ़ नहीं करेगा।





डॉ. चेतन आनंद

(कवि-पत्रकार)

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