सीजेआई ने कहा, ‘‘मेरी पहली प्राथमिकता लंबित मामलों के लिये एक निश्चित समय-सीमा और एकीकृत राष्ट्रीय न्यायिक नीति-आधारित शीघ्र निस्तारण की होगी। मैं सभी बकाया मामलों को समाप्त करने की बात नहीं कर रहा हूं। ऐसा कभी नहीं होगा। ऐसा नहीं होना चाहिए, क्योंकि मुकदमेबाजी एक सतत प्रक्रिया है। लोगों को न्यायिक प्रणाली पर भरोसा और विश्वास है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘मामले तो दायर किए जाएंगे, लेकिन जो पुराने मामले हमारे सामने हैं, उनसे निपटने की जरूरत है और इसके लिए मध्यस्थता को शक्तिशाली परिवर्तनकारी उपाय के रूप में तलाशने की जरूरत है।’’ प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि आने वाले दिनों में उच्चतम न्यायालय में कुछ सुधार होंगे, जिनमें कुछ मुकदमों को प्राथमिकता देना भी शामिल है। उन्होंने कहा, ‘‘मैं एक बहुत ही स्पष्ट और कड़ा संदेश देना चाहता हूं कि उच्चतम न्यायालय आम आदमी के लिए है और किसी भी सामान्य वादी को शीर्ष अदालत में पर्याप्त स्थान और समय मिलेगा। इसके लिए, मैं सूचीबद्ध किए जाने वाले मामलों की प्राथमिकता तय कर रहा हूं।’’ न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने साथ ही कहा कि वह यह काम अकेले नहीं कर सकते और उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों ने इस संबंध में अपना पूरा सहयोग दिया है। सीजेआई ने माना कि न्यायिक प्रणाली को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा और उन्होंने ‘डिजिटल अरेस्ट’ और साइबर अपराधों का हवाला दिया। उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए, नयी चुनौतियां आती रहेंगी। सबसे पहले, हमें अपनी न्यायपालिका को अद्यतन करने की आवश्यकता है। हमें अपने न्यायिक अधिकारियों को नयी चुनौतियों और उनसे निपटने के तरीकों के बारे में तैयार करना होगा।’’
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने मानव संसाधन के इष्टतम उपयोग और निष्पक्ष मूल्यांकन के बारे कहा कि संस्थान में योग्यता को मान्यता मिलनी चाहिए। उन्होंने न्यायपालिका में विविधता के बारे में पूछे जाने पर कहा कि जिस तरह से समाज विकसित हुआ है और जिस तरह से देश आगे बढ़ा है, उसमें भारतीय न्यायिक प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन आया है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि सामुदायिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए अब विभिन्न क्षेत्रों से न्यायाधीशों को लाने के ठोस प्रयास किये जा रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘‘इस प्रक्रिया में, हमने हमेशा इस बात का ध्यान रखा है कि हाशिए पर पड़े समुदायों की पृष्ठभूमि वाले लोगों, महिलाओं को पर्याप्त और उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। उस समावेशिता, उस विविधता ने वास्तव में उच्चतम न्यायालय में एक बहुत समृद्ध संस्कृति लाई है।’’ सीजेआई ने न्यायिक स्वतंत्रता पर कहा, ‘‘ जब हम न्यायपालिका की स्वतंत्रता की बात करते हैं तो हमें मूल सिद्धांत को ध्यान में रखना चाहिए, जो शक्तियों के पृथक्करण का संवैधानिक दर्शन है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका... संविधान ने उनकी संबंधित भूमिकाओं को इतनी खूबसूरती से परिभाषित किया है कि यह सुनिश्चित किया गया है कि इनमें से कोई एक दूसरे के क्षेत्र का अतिक्रमण न करे। लेकिन साथ ही, यह हमारे संविधान की सुंदरता है कि एक-दूसरे के साथ एक अद्वितीय अनुकूलता, एक अद्वितीय पूरक संबंध है, जो हमारा संवैधानिक दर्शन कहता है।’’ न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि संविधान में अंतर-निर्भरता को भी अच्छी तरह से परिभाषित किया गया है। उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए, यह एक ऐसी मशीनरी है, जहां तीनों अंग एक साथ काम करते हैं, एक दूसरे के पूरक होते हैं, तथा अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखते हैं।’’
सीजेआई ने इस बात पर भी जोर दिया कि मध्यस्थता एक बहुत प्रभावी साधन साबित हो रही है, क्योंकि यह वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्रों की तुलना में लागत प्रभावी है, तथा दोनों पक्षों के लिए लाभदायक है। उन्होंने न्याय तक सुलभता के संबंध में कहा, ‘‘जब हम न्याय तक पहुंच की बात करते हैं, तो चुनौतियों में से एक यह है कि यह कैसे सुनिश्चित किया जाए कि समाज के कमजोर वर्गों या हाशिए पर रहने वाले लोगों को अदालत में गुणवत्तापूर्ण कानूनी सहायता मिले।’’ न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘अब, जब मैं न्याय तक पहुंच की बात करता हूं, तो मेरी पहली प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि मुकदमेबाजी की लागत कैसे कम की जाए और मामलों के निर्णय के लिए उचित समय-सीमा कैसे निर्धारित की जाए।’’ उन्होंने कहा कि लागत-प्रभावशीलता के लिए न्यायपालिका ने मुफ्त कानूनी सहायता के मंच का विस्तार किया है, विशेष रूप से कमजोर वर्गों या गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों के लिए। सीजेआई ने गुणवत्तापूर्ण कानूनी सहायता उपलब्ध कराने के लिए पूरे देश में चलाए जा रहे एक बड़े कार्यक्रम के बारे में भी बात की और कहा कि जरूरतमंद लोगों को गुणवत्तापूर्ण कानूनी सहायता सुनिश्चित करने के लिए सक्षम वकीलों को शामिल किया जा रहा है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि जहां तक समयसीमा और पूर्वानुमेयता का सवाल है, ‘‘जिला न्यायपालिका को संवेदनशील बनाने की जरूरत है।’’ न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि वह बहुत आशावादी व्यक्ति हैं और उन्हें पूरा विश्वास है कि भारतीय लोकतंत्र और न्याय प्रदान करने की प्रणाली दोनों का भविष्य बहुत उज्ज्वल है। उन्होंने कहा, ‘‘कारण बिल्कुल स्पष्ट हैं। पहला, भारतीय लोग संवैधानिक सिद्धांतों के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध हैं। दूसरा, भारतीय कानून के शासन के प्रति प्रतिबद्ध हैं। और तीसरा, भारतीय लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध हैं।’’

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