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गुरुवार, 29 जनवरी 2026

विचार : यूजीसी का नया नियम बना सत्ता के गले की फाँस

  • सियासत गर्म, सवर्णों में उबाल, क्या है निदान?

Dr-chetan-anand
भारत में शिक्षा केवल ज्ञान का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना, सत्ता-संतुलन और भविष्य-निर्माण का औज़ार भी रही है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा हाल ही में लागू अथवा प्रस्तावित नए नियमों ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि शिक्षा नीति का हर बदलाव केवल अकादमिक नहीं होता, वह गहरे सामाजिक और राजनीतिक परिणाम भी लेकर आता है। यूजीसी के नए नियमों को लेकर देशभर में जिस तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं, उनसे स्पष्ट है कि यह विषय अब शैक्षिक परिसरों से निकलकर राजनीतिक गलियारों और सामाजिक विमर्श के केंद्र में आ चुका है।


नया नियम : सुधार या असंतुलन?

यूजीसी द्वारा लाए गए नए प्रावधान, चाहे वे शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े हों, योग्यता मानकों में परिवर्तन हो या प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर, सरकार की मंशा के अनुसार “गुणवत्ता सुधार” के नाम पर प्रस्तुत किए गए हैं। किंतु आलोचकों का मानना है कि ये नियम समान अवसर की भावना को कमजोर करते हैं और पहले से मौजूद सामाजिक असंतुलन को और गहरा कर सकते हैं। एक वरिष्ठ शिक्षाविद् का कथन है “जब शिक्षा नीति समाज की वास्तविक विविधता को ध्यान में रखे बिना बनाई जाती है, तब वह सुधार नहीं, प्रतिरोध को जन्म देती है।”


सत्ता के गले की फाँस क्यों?

राजनीतिक दृष्टि से यह नया नियम सरकार के लिए दोधारी तलवार बन गया है। एक ओर सत्ता प्रतिष्ठान इसे ‘मेरिट’ और ‘गुणवत्ता’ का प्रश्न बताकर बचाव कर रहा है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष और शिक्षाविद्ों का एक बड़ा वर्ग इसे सामाजिक न्याय के विरुद्ध कदम मान रहा है। शिक्षा हमेशा से मतदाता चेतना को प्रभावित करने वाला विषय रही है। विश्वविद्यालयों में असंतोष, शिक्षकों का विरोध और छात्रों की लामबंदी किसी भी सरकार के लिए खतरे की घंटी होती है। यही कारण है कि यूजीसी का यह निर्णय सत्ता के लिए “गले की फाँस” बनता दिख रहा है। न तो इसे पूरी तरह वापस लिया जा सकता है और न ही बिना संवाद के आगे बढ़ाया जा सकता है।


सियासत क्यों हुई गर्म?

राजनीति वहाँ प्रवेश करती है जहाँ नीति जनभावनाओं को छूती है। यूजीसी के नए नियमों ने ठीक यही किया है। विपक्ष इसे “शिक्षा का केंद्रीकरण” और “संवैधानिक मूल्यों से विचलन” बता रहा है, जबकि सत्ता पक्ष इसे “पुरानी व्यवस्था की जड़ता तोड़ने का साहसिक कदम” कह रहा है। एक राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार “जब शिक्षा नीति वोट बैंक से टकराती है, तब वह नीति नहीं रहती, वह सियासत बन जाती है।” यही कारण है कि संसद से लेकर सड़क तक और सोशल मीडिया से लेकर अकादमिक मंचों तक, यह मुद्दा तीखे बहस का विषय बन चुका है।


सवर्णों में उबाल : वास्तविकता या राजनीतिक आख्यान?

इस पूरे विवाद में एक प्रमुख कोण ‘सवर्ण असंतोष’ का है। एक वर्ग का मानना है कि नए नियमों से योग्यता आधारित अवसरों पर आघात हुआ है, जबकि दूसरा वर्ग इसे सदियों से चले आ रहे विशेषाधिकारों में आ रही दरार के रूप में देखता है। एक समाजशास्त्री का मत है-“सवर्ण असंतोष को केवल प्रतिक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक संक्रमण की पीड़ा के रूप में देखना चाहिए।” यह उबाल केवल किसी एक समुदाय का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का भी है जो बदलते सामाजिक ढाँचे के साथ स्वयं को समायोजित करने में कठिनाई महसूस कर रही है।


शिक्षा बनाम सामाजिक न्याय : टकराव या संतुलन?

वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि यूजीसी का नया नियम सही है या गलत, बल्कि यह है कि क्या वह संतुलित है? क्या वह गुणवत्ता और सामाजिक न्याय दोनों को साथ लेकर चलता है? संविधान शिक्षा को केवल योग्यता का विषय नहीं, बल्कि समान अवसर का माध्यम भी मानता है। जब नीति इन दोनों के बीच संतुलन नहीं बना पाती, तब असंतोष स्वाभाविक है। एक संवैधानिक विद्वान के शब्दों में “मेरिट और सामाजिक न्याय विरोधी नहीं हैं; समस्या तब होती है जब नीति उन्हें विरोधी बना देती है।”


निदान क्या है?

इस पूरे विवाद का समाधान न तो केवल विरोध में है, न ही केवल समर्थन में। निदान संवाद, पारदर्शिता और समावेशी पुनर्विचार में निहित है।

व्यापक संवाद : यूजीसी को शिक्षकों, छात्रों, सामाजिक समूहों और राज्यों के साथ खुला संवाद करना चाहिए।

चरणबद्ध लागूकरण- : नियमों को एक साथ थोपने के बजाय चरणों में लागू किया जाए।

समीक्षा तंत्र : स्वतंत्र विद्वानों की समिति द्वारा नियमों की सामाजिक प्रभाव समीक्षा हो।

संवैधानिक संतुलन : गुणवत्ता सुधार के साथ-साथ सामाजिक न्याय के संवैधानिक मूल्यों की रक्षा सुनिश्चित हो। एक शिक्षा नीति विशेषज्ञ के अनुसार “नीति वही टिकाऊ होती है, जिसमें सुधार का साहस और सुधार की गुंजाइश दोनों मौजूद हों।” 


यूजीसी का नया नियम केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि भारत की शिक्षा, समाज और राजनीति के चौराहे पर खड़ा प्रश्न है। यदि इसे केवल सत्ता के अहं या विरोध की राजनीति से देखा गया, तो यह टकराव बढ़ाएगा। किंतु यदि इसे आत्ममंथन और सुधार के अवसर के रूप में लिया गया, तो यही विवाद भविष्य की अधिक न्यायपूर्ण और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था की नींव बन सकता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को युद्धभूमि नहीं, संवाद का मंच बनाया जाए। यही इस संकट का वास्तविक निदान है।






डॉ. चेतन आनंद

(लेखक वरिष्ठ कवि और पत्रकार है।)

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