दुनिया एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ी है, जहा ताकत के सामने कानून और मानवता सवालों के घेरे में हैं। तेल-समृद्ध लेकिन राजनीतिक रूप से अस्थिर वेनेज़ुएला आज केवल एक लैटिन अमेरिकी देश नहीं, बल्कि वैश्विक अंतरात्मा की परीक्षा बन चुका है। अमेरिका द्वारा वेनेज़ुएला में की गई सैन्य कार्रवाई और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भूचाल ला दिया है। यह घटना केवल सत्ता परिवर्तन या अपराध नियंत्रण की कार्रवाई नहीं मानी जा सकती, बल्कि यह संप्रभुता, मानवाधिकार और वैश्विक नैतिकता के मूल सिद्धांतों को चुनौती देती है। सवाल यह नहीं है कि वेनेज़ुएला में लोकतंत्र कितना मजबूत है या वहां की सत्ता कितनी जवाबदेह रही है। बड़ा सवाल तो यह है कि क्या किसी भी देश को यह अधिकार है कि वह दूसरे संप्रभु राष्ट्र की सीमाओं में घुसकर उसके राष्ट्रपति को गिरफ्तार करे? क्या मानवाधिकारों की रक्षा के नाम पर की गई यह कार्रवाई वास्तव में मानवता के पक्ष में है, या फिर यह ताकतवर देशों की वही पुरानी नीति है, जहां कानून कमजोर के लिए और बलशाली के लिए छूट बन जाता है? वेनेज़ुएला का संकट आज एक आईना बन चुका है, जिसमें दुनिया अपनी प्राथमिकताएं देख सकती है। क्या हम ऐसी वैश्विक व्यवस्था चाहते हैं जहाँ ताकत ही न्याय बन जाए? या कानून और मानवता सर्वोपरि हों? मानवाधिकारों की रक्षा अनिवार्य है, लेकिन उसके नाम पर संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून का क्षरण भविष्य के लिए खतरनाक संकेत है। वेनेज़ुएला का प्रश्न आज केवल एक देश का नहीं, बल्कि पूरी मानव सभ्यता के विवेक का प्रश्न बन चुका है। और इस प्रश्न का उत्तर चुप्पी में नहीं, जिम्मेदार वैश्विक संवाद में छिपा है
अंतरराष्ट्रीय कानून और यूएन चार्टर के मुताबिक, किसी देश के अंदर सैन्य कार्रवाई तब तक अवैध मानी जाती है जब तक कि आधिकारिक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की मंज़ूरी न हो, या वह कार्रवाई खुद-रक्षा के दायरे में न आती हो। अमेरिका के इस कदम को कई देशों ने सर्वोच्च संप्रभुता का उल्लंघन कहा है. मतलब साफहै जब किसी देश के नागरिक, बच्चे, महिलाएँ और आम लोग युद्ध, विस्थापन, और भय के बीच फँस जाते हैं, तब मानवता का सम्मान और अधिकारों की रक्षा का प्रश्न उभरता है। अगर विदेशी हस्तक्षेप से नागरिकों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है, तो यह मानवाधिकारों के खिलाफ माना जाता है। वहीं अमेरिका का दावा है कि वेनेज़ुएला में नशीले पदार्थों का राज्य-स्तरीय संरक्षण मानवाधिकारों के खिलाफ है, और कार्रवाई इस समस्या से निपटने का उपाय है। जब देश संकट में होता है, तब जनता का विश्वास और सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता होती है. इसे लेकर लैटिन अमेरिका में विरोध प्रदर्शन और समर्थन दोनों दिखे। भारत में वामपंथी दलों ने अमेरिकी कदम को “अंतरराष्ट्रीय अपराध” कहा। पूर्व में विपक्ष और मानवाधिकार समूहों ने सरकारी दमन और चुनावी स्वतंत्रता पर सवाल उठाए हैं। यह देखा जाना बाकी है कि क्या अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप देश के लोगों की चाहत के अनुरूप है या नहीं।
फिरहाल, यह संकट केवल वेनेज़ुएला का नहीं रह गया, यह वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और दक्षिण-दक्षिण सहयोग को प्रभावित कर रहा है. तेल की वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव, अमेरिका-रूस-चीन के बीच रणनीतिक टकराव, लातीनी अमेरिका में स्थिरता के प्रश्न, संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और प्रभाव, ये सभी मुद्दे इस विवाद को एक विश्व राजनीति का प्रमुख मोड़ बनाते हैं। एक तरफ वह दृष्टिकोण जो कहता है कि मानवता और लोकतंत्र के लिए बाहरी हस्तक्षेप न्यायसंगत है, और दूसरी तरफ वह आवाज़ जो कहती है कि सर्वप्रथम सार्वभौमिकता, संप्रभुता और अन्तरराष्ट्रीय कानून का सम्मान अनिवार्य है। वेनेज़ुएला का प्रश्न अब सिर्फ राजनीतिक संघर्ष नहीं रहा, यह मानवता और अधिकारों के मूल प्रश्न में बदल चुका है। इसका हल डायलॉग, न्याय, और वह मार्ग होना चाहिए जो वास्तविक लोगों की इच्छा, उनकी सुरक्षा और मानवीय गरिमा का सम्मान करे। अगर विश्व वास्तव में मानवाधिकारों का सम्मान चाहता है, तो यह आवाज़ केवल उठनी चाहिए, घोषित की जानी चाहिए। लेकिन यह तभी संभव है जब ’सब देश मिलकर शांतिपूर्ण समाधान, मानवीय सहायता और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का समर्थन करें।’ दुनिया के इतिहास में कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जो किसी एक देश की सीमाओं में घटित होकर भी पूरे वैश्विक तंत्र को झकझोर देती हैं। वेनेज़ुएला में घटित हालिया घटनाक्रम भी कुछ ऐसा ही है। अमेरिका द्वारा वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार किए जाने और सैन्य कार्रवाई की खबरों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अब शक्ति के इशारों पर चलेगी या कानून और मानवता के सिद्धांतों पर? यह संकट केवल लैटिन अमेरिका का आंतरिक मामला नहीं है। यह संप्रभुता, मानवाधिकार, लोकतंत्र और वैश्विक नैतिकता से जुड़ा प्रश्न है। अगर आज वेनेज़ुएला के साथ ऐसा हुआ है, तो कल किसी और देश की बारी भी हो सकती है। यही वजह है कि इस घटनाक्रम पर दुनिया भर में चिंता, विरोध और समर्थन, तीनों स्वर एक साथ सुनाई दे रहे हैं।
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी



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