बनारस ने बहुत कुछ देखा है, सत्ता के उत्थान-पतन, आंदोलनों की आँच, गलियों में उठती असहमति की आवाज़ें और गंगा की धारा के साथ बहती पीढ़ियों की स्मृतियाँ। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनके जाने से शहर का तापमान बदल जाता है। गोपेश पाण्डेय ऐसे ही विरले पत्रकार थे, जिनका नाम सुनते ही काशी की पत्रकारिता, उसकी गरिमा, उसकी लड़ाई और उसकी आत्मा एक साथ सामने आ जाती है। यह श्रद्धांजलि किसी व्यक्ति के निधन की औपचारिक सूचना नहीं है, यह उस पत्रकारिता-यात्रा का सफरनामा है, जिसे गोपेश पाण्डेय ने जिया, निभाया और अंत तक लड़कर जिया। उनका जाना केवल एक वरिष्ठ पत्रकार का निधन नहीं है। यह बनारस की उस पत्रकारिता का मौन हो जाना है, जो संस्थान से ऊपर सच और सत्ता से ऊपर समाज को रखती थी। वह पत्रकारिता, जो कुर्सियों की नहीं, रीढ़ की पहचान से जानी जाती थी. मतलब साफ है कलम का विवेक, संघर्ष की विरासत और स्मृतियों में जीवित गोपेश पाण्डेय एक व्यक्ति नहीं, काशी की पत्रकारिता का पूरा अध्याय है. वे स्मृतियों, संस्कारों और संघर्षों के रूप में पीढ़ियों तक जीवित रहेंगे. वह उस पत्रकारिता-यात्रा का दस्तावेज़ है जिसमें संघर्ष भी है, संवेदना भी है, सत्ता से टकराव भी है और साथ काम करने वालों की आँखों में बसी अनगिनत स्मृतियाँ भी
गलतियों पर डाँट नहीं, ढाल बनकर खड़े रहना
गोपेश पाण्डेय के साथ काम करने वालों के लिए वे संपादक, वरिष्ठ या अध्यक्ष भर नहीं थे। वे ऐसे बड़े भाई थे, जो साथियों की गलतियों पर उँगली उठाने के बजाय खुद ढाल बनकर सामने खड़े हो जाते थे। कभी यह एहसास नहीं होने देते थे कि हमारी भूलों की कीमत उन्हें चुकानी पड़ी है। और जब कभी तारीफ का अवसर आता, तो वे चुपचाप पीछे हट जाते, यह कहते हुए कि “इसमें साथियों का योगदान ज्यादा है।” आज जो भी बनारस की पत्रकारिता में थोड़ा बहुत आत्मविश्वास, तेवर और ठहराव दिखता है, उसमें कहीं न कहीं गोपेश पाण्डेय की छाया है। वे जूनियर पत्रकारों की कॉपी सुधारते, गलती पर डांटते भी थे, लेकिन कभी अपमान नहीं करते थे। उनकी मदद गुप्त होती थी, और संघर्ष सार्वजनिक। वे चाहते थे कि पत्रकार भूखा रह सकता है, लेकिन बिक नहीं सकता।
दफ्तर से आगे की पत्रकारिता
उनकी पत्रकारिता दफ्तर की दीवारों तक सीमित नहीं थी। कई बार फैसले चाय की दुकानों पर होते थे, डेढ़-डेढ़ घंटे की बहस, असहमति, ठहाके और फिर किसी निष्कर्ष पर पहुँचनां वे मानते थे कि पत्रकारिता डेस्क से नहीं, ज़मीन से समझी जाती है। कई युवा पत्रकारों को उन्होंने इसलिए रोका कि वे “किसी और दफ्तर” में न चले जाएँ। कारण सिर्फ़ इतना था, “यहाँ हम परिवार की तरह काम करते हैं।”
विरासत में मिली निर्भीकता
लोग कहते हैं, गोपेश पाण्डेय को यह साहस विरासत में मिला था। लेकिन सच यह है कि विरासत सिर्फ़ साहस नहीं, ज़िम्मेदारी भी होती है, और उन्होंने उसे पूरी ईमानदारी से निभाया। उन्होंने अपने वरिष्ठों से जो मूल्य पाए, उन्हें सिर्फ़ संभाला नहीं, बल्कि अगली पीढ़ी तक पहुँचाया। यही कारण है कि आज भी बनारस में कुछ पत्रकार ऐसे मिल जाते हैं, जो संस्थान का नाम लिए बिना सिर्फ़ अपना नाम बताते हैं, और सामने वाला समझ जाता है कि बात किस स्तर की है।
सत्ता से संवाद, लेकिन समझौता नहीं
गोपेश पाण्डेय के जीवन की अनेक घटनाएँ आज भी बनारस की पत्रकारिता की लोककथाओं में शामिल हैं, जिलाधिकारी के खिलाफ आंदोलन, मंत्री द्वारा लाई गई मिठाई को लौटा देना, आधी रात को थाने में खड़े रहना और कहना, “हम बैठेंगे नहीं, खड़े रहेंगे।” वे जानते थे कि सत्ता से संवाद ज़रूरी है, लेकिन संवाद और समझौते के बीच एक महीन रेखा होती है, और वे उस रेखा को कभी लाँघते नहीं थे।
गोलीकांड, बवाल और सच की ज़िद
लंका क्षेत्र की घटना, गोली चलना, एक आदमी का मारा जाना, ऐसे कई मौके आए जब डर स्वाभाविक था। लेकिन गोपेश पाण्डेय उन पत्रकारों में नहीं थे जो डर को खबर से बड़ा मानते हों। रात के एक बजे तक थाने में खड़े रहना, प्रशासन से सवाल पूछना, और फिर अगली सुबह वही सवाल अख़बार में छपना, यह केवल साहस नहीं, पत्रकारिता की साधना थी। मतलब साफ है वे धरने पर बैठे, गिरफ्तारी दी, सड़कों पर उतरे, लेकिन कभी सत्ता के दरबार में सिर झुकाकर नहीं खड़े हुए। मानवीय पत्रकार उनकी सबसे बड़ी पूंजी उनकी संवेदनशीलता थी।
नाम ही पहचान था
उन्होंने कभी यह नहीं कहा, “मैं फलाँ अख़बार से बोल रहा हूँ।” वे बस कहते थे, “गोपेश पाण्डेय बोल रहा हूँ।” इतना ही काफी होता था। आज के दौर में, जब पहचान संस्थानों से तय होती है, गोपेश पाण्डेय उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे जहाँ संस्थान व्यक्ति से छोटा होता था।
1998 की दुर्घटना : मृत्यु से लौट आया पत्रकार
18 फरवरी 1998, काशी की पत्रकारिता के इतिहास की सबसे विचलित करने वाली तारीखों में से एक है। संभल की चुनावी रैली कवर कर लौटते समय सीतापुर के पास भीषण सड़क हादसा हुआ। तीन पत्रकारों की मौके पर मौत हुई। गोपेश पाण्डेय को मृत मानकर मोर्चरी में रख दिया गया। साथियों ने बताया, “जब मोर्चरी में स्ट्रेचर पर पड़े गोपेश जी के शरीर में हल्की हरकत दिखी, तो लगा जैसे मौत खुद पीछे हट गई हो।” सिर में गंभीर चोट, टूटी पसलियाँ, पैर में फ्रैक्चर, हफ्तों अस्पताल में रहे। लेकिन लौटे तो पहले से अधिक दृढ़ होकर। सीनियर पत्रकार हेमंत शर्मा ने कहते हैं, “उस हादसे के बाद गोपेश जी बदले नहीं, और अधिक निर्भीक हो गए। जैसे उन्हें दूसरा जीवन केवल पत्रकारिता के लिए मिला हो।” उनके साथ हुए कुछ वाकयों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, 1996 में ‘आज’ अखबार द्वारा उन्हें लखनऊ भेजा जाना खास है. यह उनके जीवन का एक बड़ा मोड़ था। दुर्घटना के दौरान मोर्चरी में पड़ी उनकी देह ने सांस ली, तो वह क्षण केवल चमत्कार नहीं था, वह इस बात का संकेत था कि पत्रकारिता को अभी उनसे बहुत काम लेना था। टूटे शरीर के साथ, लेकिन अडिग आत्मा और और तेज कलम लेकर।
एक व्यक्ति नहीं, एक युग का अंत
गोपेश पाण्डेय का जाना, केवल एक वरिष्ठ पत्रकार का जाना नहीं है। यह उस दौर का जाना है, जब खबरें लिखने से पहले कलम कांपती थी और छपने के बाद सत्ता कांपती थी। आज सूचना का दौर है, लेकिन संवेदना का अकाल है। ऐसे समय में गोपेश पाण्डेय और अधिक याद आते हैं।
धर्म, संस्कार और कलम
वे आडंबर वाले धार्मिक नहीं थे, लेकिन आस्था उनके जीवन का हिस्सा थी। दफ्तर आने से पहले हनुमान जी का दर्शन, यह उनकी दिनचर्या थी। उनके लिए धर्म का अर्थ था, अन्याय के सामने खड़ा होना। वे कहते थे, “खबर लिखते समय अगर कलम काँप नहीं रही, तो समझो कहीं न कहीं समझौता हो रहा है।” उनकी पत्रकारिता न तो सत्ता-प्रायोजित थी, न ही सुविधा-संचालित। वे खबर को समाज की जरूरत मानते थे, न कि अपनी पहचान का साधन।
पेंशन, सम्मान और पत्रकार की चिंता
अपने अंतिम वर्षों में भी वे सिर्फ़ अपने बारे में नहीं सोचते थे। वे अक्सर कहते थे, “पत्रकार रिटायर होता है, तो उसके पास सम्मानजनक जीवन का आधार क्या है?” वेतन आयोग, पेंशन, मान्यता, इन मुद्दों पर उनकी चिंता व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक थी।
काशी बदल रही है, पत्रकारिता भी
बनारस बदल गया है। स्वार्थ बढ़ा है, धैर्य घटा है, और सूचना की गति ने विवेक को पीछे छोड़ दिया है। लेकिन फिर भी उम्मीद बाकी है, क्योंकि गोपेश पाण्डेय जैसे लोग स्मृतियों में नहीं, परंपरा में जीवित रहते हैं। मतलब साफ है श्रद्धांजलि से अधिक एक संकल्प है, काशी की पत्रकारिता अपने मूल्यों को नहीं छोड़ेगी। कलम सत्ता की साथी नहीं, समाज की प्रहरी बनी रहेगी। गोपेश पाण्डेय भले न हों, लेकिन उनकी पत्रकारिता काशी की आत्मा में हमेशा जीवित रहेगी।
मृत्यु नहीं, उत्तराधिकार
गोपेश पाण्डेय की मृत्यु एक अंत नहीं है। यह एक उत्तराधिकार है, उन विचारों का, उन मूल्यों का, और उस निर्भीकता का, जिसकी आज पत्रकारिता को सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। आज अगर कोई युवा पत्रकार अन्याय के सामने खड़ा होता है, अगर कोई सत्ता से सवाल पूछने का साहस करता है, तो समझिए, गोपेश पाण्डेय अब भी लिख रहे हैं। कलम से नहीं, चेतना से।
पत्रकार नहीं, पत्रकारिता का संस्कार
गोपेश पाण्डेय के लिए पत्रकारिता नौकरी नहीं थी, न ही यह सिर्फ रोज़ की खबरें जुटाने का काम था। यह उनके लिए संस्कार, जिम्मेदारी और सामाजिक धर्म था। वे उन दिनों के पत्रकार थे, जब खबर लिखने से पहले अपने विवेक से पूछा जाता था, “क्या यह समाज के पक्ष में है?” और छपने के बाद भी पत्रकार चैन से नहीं सोता था। वे निष्पक्ष थे, लेकिन तटस्थ नहीं। अन्याय के सामने उनकी कलम हमेशा पक्षधर रही, पीड़ित के पक्ष में। संघर्षों से तपकर निकली कलम.
संस्था से टकराव, सिद्धांत से समझौता नहीं
55 वर्ष की उम्र में जब ‘आज’ अखबार ने उन्हें जबरन सेवानिवृत्त किया, तो उन्होंने चुपचाप घर बैठ जाना स्वीकार नहीं किया। उन्होंने लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी, यह लड़ाई सिर्फ गोपेश पाण्डेय की नहीं थी, यह पत्रकार की गरिमा और अधिकारों की लड़ाई थी। वे कहते थे, “पत्रकार अगर अपने ही अधिकारों पर चुप रहेगा, तो वह जनता के अधिकारों की क्या लड़ाई लड़ेगा?” एक करीबी सहयोगी बताते हैं, “गोपेश जी कहते थे, अगर आज हम नहीं लड़े, तो कल हर पत्रकार खामोशी से बाहर कर दिया जाएगा।” एक वरिष्ठ पत्रकार बताते है कि वे रात 12 बजे भी फोन उठा लेते थे। कहते थे, पत्रकार की परेशानी समय नहीं देखती। एक साथी ने कहा, वह दिन काशी की पत्रकारिता का सबसे गर्वपूर्ण दिन था। मानवता पहले, खबर बाद में, गोपेश पाण्डेय सिर्फ खबरों के नहीं, इंसानों के पत्रकार थे। कई लोग बताते हैं उन्होंने आर्थिक मदद की, नौकरी दिलवाई, इलाज कराया, लेकिन कभी नाम सामने नहीं आने दिया।
काशी पत्रकार संघ : एक परंपरा का नेतृत्व
गोपेश पाण्डेय काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष रहे, वह संगठन जो 1940 में स्थापित हुआ, और देश का सबसे पुराना पत्रकार संगठन माना जाता है। यह वही संघ है जिसके पहले अध्यक्ष पंडित कमलापति त्रिपाठी थे, और जिसने स्वतंत्रता संग्राम में भी अपनी भूमिका निभाई। संघ की स्वर्ण जयंती के अवसर पर गोपेश पाण्डेय के सहयोग से इस संगठन की ऐतिहासिक विरासत राष्ट्रीय स्तर पर सामने आई। वे संघ के अध्यक्ष नहीं, उसकी नैतिक रीढ़ थे। मेरा मानना है कि यह लेख श्रद्धांजलि से अधिक एक संकल्प है, कि पत्रकारिता का विवेक जिंदा रहेगा, कलम सत्ता की सजावट नहीं बनेगी, और काशी अपनी पत्रकारिता की आत्मा बचाए रखेगी. गोपेश पाण्डेय चले गए, लेकिन उनकी कलम की धार आज भी काशी की हवा में है।
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी


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