वाराणसी : ब्रज के रंग में रंगी काशी : रंगभरी एकादशी पर आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक संगम का अलौकिक उत्सव - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

वाराणसी : ब्रज के रंग में रंगी काशी : रंगभरी एकादशी पर आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक संगम का अलौकिक उत्सव

 

  • मथुरा से आएंगे रसिया कलाकार, पहली बार काशी विश्वनाथ धाम में ‘रास’ और ‘फूलों की होली’; सुरक्षा के व्यापक प्रबंध

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वाराणसी (सुरेश गांधी)। काशी की आध्यात्मिक धड़कनों में इस बार रंगभरी एकादशी का महापर्व एक नए सांस्कृतिक आयाम के साथ गूंजेगा। श्रीकाशी विश्वनाथ धाम व श्रीकृष्ण जन्मस्थली मथुरा के मध्य आरंभ हुआ सांस्कृतिक आदान-प्रदान इस वर्ष आस्था और परंपरा के अद्भुत संगम का साक्षी बनने जा रहा है। मंदिर प्रशासन द्वारा जारी जानकारी के अनुसार काशी से भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप के लिए खिलौने, चॉकलेट, पारंपरिक मिठाइयाँ, वस्त्र और फल श्रद्धाभाव से मथुरा प्रेषित किए गए, जिन्हें श्रीकृष्ण जन्मस्थान न्यास ने 24 फरवरी को विधिवत स्वीकार किया। इस पहल को काशी और ब्रज की सनातन सांस्कृतिक परंपराओं के मधुर संवाद के रूप में देखा जा रहा है।


भक्ति, राग और रंग का ब्रज से काशी तक विस्तार

मथुरा मंदिर के अनुसार 26 फरवरी को ‘रसियारों’ की एक विशेष टोली भेंट सामग्री के साथ काशी के लिए प्रस्थान करेगी। 27 फरवरी को रंगभरी एकादशी के पावन अवसर पर ‘शिवार्चनम मंच’ से ब्रज की परंपरागत रास-लीला और फूलों की होली का भव्य आयोजन किया जाएगा। काशी में पहली बार ब्रज शैली की इस सांस्कृतिक प्रस्तुति को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखा जा रहा है। यह आयोजन केवल उत्सव नहीं, बल्कि दो महान धार्मिक परंपराओंकृब्रज और काशीकृके भावनात्मक सेतु का प्रतीक माना जा रहा है।


शिव-पार्वती मिलन की उल्लासमयी परंपरा

काशी में रंगभरी एकादशी को भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। महाशिवरात्रि के उपरांत यह धाम का दूसरा सबसे बड़ा पर्व माना जाता है, जब बाबा विश्वनाथ को अबीर-गुलाल अर्पित कर नगर में उत्सव की अलौकिक छटा बिखरती है। इस दिन काशी की गलियां भक्ति, संगीत और रंगों से सराबोर हो उठती हैं।


परंपरा के साथ सुरक्षा का सख्त संयोजन

महापर्व को सुव्यवस्थित और सुरक्षित बनाने के लिए प्रशासन ने व्यापक तैयारियां की हैं। पुलिस विभाग के साथ-साथ ब्त्च्थ् और छक्त्थ् के अधिकारियों के साथ संयुक्त बैठक कर सुरक्षा व्यवस्था को अंतिम रूप दिया गया है। पालकी परंपरा की मर्यादा को ध्यान में रखते हुए केवल 64 चिन्हित व्यक्तियों को ही प्रवेश की अनुमति होगी। मंदिर परिसर के भीतर मोबाइल फोन पूर्णतः प्रतिबंधित रहेंगे। नियमों के उल्लंघन पर तत्काल कार्रवाई की जाएगी।


श्रद्धालुओं के लिए विशेष व्यवस्थाएँ

मंदिर प्रशासन द्वारा श्रद्धालुओं के लिए ठंडई, जलपान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की विशेष व्यवस्था की जा रही है। साथ ही संकरी गलियों से गुजरने वाली पारंपरिक पालकी यात्रा के दौरान अनुशासन बनाए रखने की अपील की गई है, ताकि उत्सव की गरिमा अक्षुण्ण रहे। मंदिर न्यास ने काशीवासियों और देशभर से आने वाले श्रद्धालुओं से आग्रह किया है कि वे इस पावन अवसर पर सहभागी बनकर ब्रज और काशी की सांस्कृतिक एकात्मता के इस अद्वितीय उत्सव के साक्षी बनें। आस्था के रंग, परंपरा की सुगंध और भक्ति की मधुरता से सुसज्जित यह रंगभरी एकादशी काशी को एक बार फिर आध्यात्मिक उल्लास के दिव्य प्रकाश से आलोकित करने जा रही है।

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