- अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को ‘प्रोटेक्टेड स्पेस’ से निकालकर राष्ट्र निर्माण का केंद्र बनाने का आह्वान
देवबंद/सहारनपुर (रजनीश के झा)। जब शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित न रहकर चरित्र निर्माण, ज़िम्मेदारी और राष्ट्रबोध का आधार बन जाती है, तब तालीम इतिहास रचती है। ऐसा ही प्रेरक और विचारोत्तेजक वातावरण इस्लामिया डिग्री कॉलेज, देवबंद में देखने को मिला, जहाँ नेशनल कमीशन फॉर माइनॉरिटी एजुकेशनल इंस्टिट्यूशंस (NCMEI), भारत सरकार एवं इस्लामिया डिग्री कॉलेज के संयुक्त तत्वावधान में “राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक विविधता और राष्ट्र निर्माण में अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका : विकसित भारत @2047” विषय पर एक गरिमामय राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन की अध्यक्षता डॉ. इंद्रेश कुमार, मार्गदर्शक, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने की। मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. (डॉ.) शाहिद अख़्तर, कार्यवाहक अध्यक्ष, NCMEI उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथियों में प्रो. विमला यादव, माननीय कुलपति, एमएसयू सहारनपुर, तथा कर्नल ताहिर मुस्तफ़ा, रजिस्ट्रार, जामिया हमदर्द (नई दिल्ली) शामिल रहे।
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कार्यक्रम के आरंभ में राज सिंह तरार, अंडर सेक्रेटरी, NCMEI ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि आयोग का उद्देश्य अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को सशक्त करना और संविधान के अनुच्छेद-30 के अंतर्गत प्रदत्त अधिकारों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना है। उन्होंने जानकारी दी कि अब तक देशभर में 14,000 से अधिक संस्थानों को अल्पसंख्यक दर्जा प्रदान किया जा चुका है, जिनमें सहारनपुर ज़िले के 104 संस्थान शामिल हैं। सुमित राजेश महाजन ने अपने संबोधन में कहा कि विकसित भारत @2047 का सपना तभी साकार होगा, जब शिक्षा को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था और स्किल डेवलपमेंट से जोड़ा जाएगा। उन्होंने भारत की युवा आबादी को देश की सबसे बड़ी ताक़त बताया। सम्मेलन को वैचारिक ऊँचाई देते हुए डॉ. इंद्रेश कुमार ने अपने प्रभावशाली वक्तव्य में कहा, “दुनिया के कई हिस्सों में आज नफ़रत और टकराव है, लेकिन भारत की पहचान लड़ाई से नहीं, मिलकर रहने की संस्कृति से बनी है। हमें अगली पीढ़ी को ग़ुस्सा नहीं, साथ जीने की तालीम देनी है। अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के पास अपनी संस्कृति, भाषा और विविधता को गर्व के साथ आगे बढ़ाने का ऐतिहासिक अवसर है—क्योंकि विविधता हमारी कमजोरी नहीं, हमारी सबसे बड़ी ताक़त है। अल्पसंख्यक होना कोई अपराध या हीनता नहीं है। आप विदेशी नहीं हैं—आप हिंदुस्तानी थे, हिंदुस्तानी हैं और हिंदुस्तानी ही रहेंगे। जब हम खुद को सबसे पहले देशवासी मानेंगे, तभी एक सशक्त, समरस और विकसित भारत का सपना साकार होगा।” कर्नल ताहिर मुस्तफ़ा, रजिस्ट्रार, जामिया हमदर्द ने कहा कि अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को केवल ‘प्रोटेक्टेड स्पेस’ मानने की सोच से बाहर निकालकर उन्हें अकादमिक एक्सीलेंस और राष्ट्रीय विकास का केंद्र बनाया जाना चाहिए। प्रो. विमला यादव ने विविधता को भारत की सबसे बड़ी शक्ति बताते हुए समावेशी शिक्षा और नई शिक्षा नीति 2020 की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।
प्रो. (डॉ.) शाहिद अख़्तर, कार्यवाहक अध्यक्ष, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान आयोग (NCMEI) ने कहा “आज का यह कार्यक्रम राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान आयोग और इस्लामिया डिग्री कॉलेज के संयुक्त प्रयास से आयोजित किया गया है। इसका उद्देश्य केवल अधिकारों की चर्चा करना नहीं, बल्कि अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों की जिम्मेदारियों को भी स्पष्ट करना है। NCMEI अधिनियम के अंतर्गत देश में छह अल्पसंख्यक समुदाय—मुस्लिम, ईसाई, सिख, पारसी, बौद्ध और जैन—को अधिसूचित किया गया है। संविधान ने इन्हें अपने शैक्षिक संस्थान स्थापित करने और संचालित करने का मौलिक अधिकार दिया है। यह कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि विविधता की रक्षा का संवैधानिक प्रावधान है। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप एक पारदर्शी और सुस्पष्ट प्रक्रिया विकसित की है, ताकि अल्पसंख्यक दर्जा समयबद्ध और न्यायसंगत तरीके से सुनिश्चित हो सके। चूंकि अल्पसंख्यक संस्थानों में आरक्षण लागू नहीं होता, इसलिए उन्हें अपने समुदाय के लिए सीटें निर्धारित करने का अधिकार दिया गया है। लेकिन अधिकारों के साथ दायित्व भी जुड़े होते हैं। अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों की भूमिका केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है—वे राष्ट्र निर्माण, सामाजिक एकता और डिजिटल व एआई के दौर में सक्षम नागरिक तैयार करने की अहम कड़ी हैं। हमारा विश्वास है कि शिक्षा के माध्यम से एकता, संस्कृति, भाषा और विविधता को न केवल संरक्षित किया जा सकता है, बल्कि उसे राष्ट्र की सबसे बड़ी ताक़त बनाया जा सकता है।” कार्यक्रम का समापन इस विश्वास और संकल्प के साथ हुआ कि यह सम्मेलन केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि तालीम के ज़रिये तामीर-ए-हिंद की दिशा में एक दूरगामी और सशक्त पहल है।
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