वाराणसी : "बनारस में न होते तो नामवर नामवर न होते।" : काशीनाथ सिंह - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

वाराणसी : "बनारस में न होते तो नामवर नामवर न होते।" : काशीनाथ सिंह

Namwar-singh-in-banaras
वाराणसी (रजनीश के झा)। 26 फरवरी। नामवर बनारस में न होते तो नामवर नामवर न होते। उन्हें नामवर बनारस ने बनाया; उन्हें दिल्ली ने नामवर नहीं बनाया। हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार काशीनाथ सिंह ने "नामवर सिंह : आलोचना और वैचारिकता" विषयक त्रि-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि  नामवर सिंह की कक्षाओं के बारे में जाने बिना उन्हें पूरी तरह नहीं जाना जा सकता। क्लास में जगह न होने की वजह से विद्यार्थी खिड़की और दरवाजों के पास खड़े होकर सुना करते थे। इनकी कक्षाओं में अन्य विषयों के विद्यार्थी भी यह देखने आते थे कि क्या पढ़ा रहे हैं जो इतनी भीड़ है। नामवर सिंह की शिक्षा और अध्यापन की शुरुआत यहीं हिन्दी विभाग से हुई थी। ऐसे में इस विभाग द्वारा यह आयोजन उनको याद करने का महत्वपूर्ण उपक्रम है। फुलवा मरिगा रह गई बास— मेरे लिए नामवर वह फूल हैं जो अब नहीं हैं लेकिन उनकी सुगंध अभी भी जीवन में है। प्रो काशीनाथ सिंह ने प्रेमचंद सभागार, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में उक्त विचार व्यक्त किए। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा प्रो० नामवर सिंह की जन्मशती पर आयोजित  संगोष्ठी का शुभारंभ उद्घाटन-सत्र में महामना मालवीय जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण के साथ किया गया। इसके बाद विश्वविद्यालय की परंपरा के अनुसार कुलगीत गायन किया गया। इसके उपरांत मंचस्थ अतिथियों को अंगवस्त्र, पुष्पगुच्छ एवं पुस्तकें भेंटकर उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया गया। संगोष्ठी का उद्घाटन वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ कवि अरुण कमल ने कहा कि नामवर जी की पूरी आलोचना साहित्य की श्रेष्ठता को पहचानने का प्रयास है। उनके अनुसार श्रेष्ठ कवि वक्तव्य देने के बजाय क्षण की सृष्टि करता है। भाव सबलता और बहुलता किसी कविता को श्रेष्ठ बनाते हैं। ढेर सारे द्वंद्वों का समाहार रचना को श्रेष्ठता प्रदान करता है। जो शब्द मुद्रित हैं वही अंतिम सत्य हैं।" संगोष्ठी का बीज वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ कथाकार एवं तद्भव के संपादक अखिलेश ने कहा कि "हिन्दी की लगभग हर बहस में नामवर सिंह उपस्थित रहे। उन्होंने हमारी भाषा को अपने मेधा और साहस के बल पर उत्तरोत्तर समृद्ध किया। उन्होंने अपने नये-नये पाठ्यक्रमों के जरिये हमारी भाषा को जो सम्मान दिलाया वह महत्त्वपूर्ण है। नामवर जी ने व्याख्यान को एक कला और संरचना की तरह रचा था। इन्होंने वक्तृता को एक विधा के रूप में स्थापित किया। इनको सुनने के लिए हिन्दी साहित्य के इतर के लोग भी उत्सुक रहा करते थे। नामवर जी का व्यक्तित्व संश्लिष्ट टेक्स्ट की तरह बहुआयामी था। वे संस्कृति और साहित्य में बहुलता का सम्मान करते थे। नामवर सिंह ने अपभ्रंश, कहानी, उपन्यास, छायावाद आदि की नयी व्याख्या करके पुनर्स्थापित किया। वे पुराने रचनाकारों के बजाय नयी रचनात्मकता की सोहबत में रहना पसंद करते थे। वे निश्चितवाद के हमेशा विरुद्ध रहते थे।"


स्वागत वक्तव्य देते हुए हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो० वशिष्ठ अनूप ने कहा कि नामवर सिंह ने भारतीय ज्ञान और आलोचना परंपरा में बहुत सार्थक हस्तक्षेप किया है। इन्होंने आलोचना की बहुत सारी परिभाषाएँ बदल दी हैं। संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तावित करते हुए प्रो० मनोज कुमार सिंह ने कहा कि वे सिर्फ़ साहित्य के आलोचक नहीं थे, बल्कि उनके लिए आलोचना जीवन की आलोचना थी। जीवन जीने के लिए जो भी बाधा उत्पन्न हो रही थी नामवर जी ने उन सभी की सविवेक आलोचना प्रस्तुत की। सरहपा से लेकर समकालीन हिन्दी रचनाकारों तक पर उन्होंने लिखा। उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि प्रसिद्ध समाजविज्ञानी प्रो० आनंद कुमार ने कहा कि नामवर सिंह ने अपनी धोती कुर्ता, तनी हुई गर्दन और गंभीर विवेक से दिल्ली शहर में मशाल की तरह रौशनी की। दिल्ली शहर की कोई भी गोष्ठी नामवर जी के बिना संभव नहीं होती थी। वे सभा-सेमिनारों में दंगल की तरह चुनौती दिया करते थे। उनकी रचनाओं में सर्वकालिक बुद्धिजीवी और समर्पित शिक्षक का तेज़ दिखाई पड़ता है।"  हिन्दी की प्रवासी साहित्यकार डॉ० दिव्या माथुर ने अपने अतिथि वक्तव्य में कहा कि नामवर जी जितना अच्छा लिखते थे उतना अच्छा ही बोलते भी थे। नामवर सिंह ने 'दूसरी परंपरा की खोज' और 'वाद-विवाद-संवाद' किताब में प्रवासी साहित्य के लेखकों को काफ़ी सराहा है। नामवर सिंह पर पाश्चात्य विचारकों ल्योतार, मिशेल फूको और टेरी ईगल्टन आदि का प्रभाव है।" 


उद्घाटन सत्र का संचालन हिन्दी विभाग के आचार्य प्रो० नीरज खरे ने और धन्यवाद ज्ञापन हिन्दी विभाग के ही आचार्य प्रो० प्रभाकर सिंह ने किया। कार्यक्रम में प्रो० बलिराज पाण्डेय, प्रो० अवधेश प्रधान, प्रो० सदानंद शाही, प्रो० राजकुमार, प्रो० शशिकला त्रिपाठी, प्रो० विनय कुमार सिंह, प्रो० श्रद्धा सिंह, प्रो० कृष्णमोहन पाण्डेय, प्रो० श्रीप्रकाश शुक्ल, प्रो० प्रभाकर सिंह, प्रो० कृष्णमोहन सिंह, प्रो० बसंत त्रिपाठी, डॉ० रामाज्ञा राय, पल्लव, डॉ० किंगसन सिंह पटेल, अनीता गोपेश, डॉ० सूर्यनारायण, डॉ० मोतीलाल, शिव कुमार पराग, उज्ज्वल भट्टाचार्य, डॉ० राहुल चतुर्वेदी, विवेक निराला, डॉ० महेन्द्र प्रसाद कुशवाहा, डॉ० विवेक सिंह, डॉ० प्रभात कुमार मिश्र, डॉ० मुशर्रफ़ अली, डॉ० रविशंकर सोनकर, डॉ० विंध्याचल यादव, डॉ० सुशील सुमन, डॉ० मानसी रस्तोगी, डॉ० राज कुमार मीणा, डॉ० प्रीति त्रिपाठी, विहाग वैभव, डॉ० आशा यादव आदि बनारस एवं देश के गणमान्य विद्वानों के साथ ही भारी संख्या में शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की उपस्थिति रही। 

कोई टिप्पणी नहीं: