ऑक्सफोर्ड लॉ फ़ैकल्टी की प्रोफेसर लवण्या राजामणि, जो इस अध्ययन की लेखकों में शामिल हैं, कहती हैं कि कुछ देश अनिश्चित भविष्य की तकनीकों पर जुआ खेल रहे हैं। उनके मुताबिक, यह तरीका गंभीर, व्यापक और अपूरणीय जलवायु नुकसान की ओर ले जा सकता है। अध्ययन ज़ोर देता है कि निकट अवधि में एमिशन में तेज़ कटौती सिर्फ़ नैतिक ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि एक क़ानूनी आवश्यकता भी है। रिपोर्ट 2025 में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस की जलवायु परिवर्तन पर दी गई सलाहकारी राय का हवाला देती है। इसमें ‘हानि रोकथाम’ और ‘ड्यू डिलिजेंस’ के सिद्धांत को मज़बूती से परिभाषित किया गया था। इन सिद्धांतों के तहत देशों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी जलवायु रणनीतियाँ दूसरों को गंभीर नुकसान न पहुंचाएं और जोखिमों को लेकर सतर्क रवैया अपनाया जाए। अध्ययन बताता है कि अंतरराष्ट्रीय क़ानून पहले से ही कुछ साफ़ ‘गार्डरेल्स’ तय करता है। मसलन, देशों को सबसे पहले एमिशन घटाने को प्राथमिकता देनी होगी। किसी भी कार्बन रिमूवल रणनीति का तकनीकी और सामाजिक रूप से संभव होना ज़रूरी है। इसके साथ ही यह भी देखा जाएगा कि इन उपायों से किसी तरह के नकारात्मक प्रभाव तो नहीं पड़ रहे और क्या देश विदेशों में किए जा रहे कार्बन रिमूवल पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भर तो नहीं हैं।
प्रक्रियात्मक स्तर पर भी पारदर्शिता अहम बताई गई है। देशों को यह साफ़ बताना होगा कि वे किस तरह के कार्बन रिमूवल पर भरोसा कर रहे हैं, भविष्य के अनुमानों के पीछे क्या मान्यताएं हैं, और उत्सर्जन व रिमूवल को अलग अलग कैसे गिना जा रहा है। स्टडी के सह लेखक डॉ. रूपर्ट स्टुअर्ट स्मिथ का कहना है कि आज लिए जा रहे फैसले भविष्य की पीढ़ियों पर जलवायु जोखिम न थोपें, इसके लिए क़ानूनी सीमाएं बेहद ज़रूरी हैं। उनके मुताबिक, कार्बन हटाने की योजनाएं उत्सर्जन में तुरंत और गहरी कटौती की जगह नहीं ले सकतीं। यह शोध जर्नल Climate Policy में प्रकाशित हुआ है और इसमें ऑक्सफोर्ड के साथ इम्पीरियल कॉलेज लंदन, जर्मनी और ऑस्ट्रिया के शोध संस्थानों के वैज्ञानिक शामिल हैं। रिपोर्ट का संदेश सीधा है। कार्बन हटाने की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन अगर आज की कार्रवाई टालकर भविष्य की उम्मीदों पर सब कुछ छोड़ दिया गया, तो न तो जलवायु सुरक्षित रहेगी और न ही देश क़ानूनी ज़िम्मेदारियों से बच पाएंगे।

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