रिपोर्ट का केंद्रीय तर्क साफ है. जिसे मापा नहीं जा सकता, उसे घटाया भी नहीं जा सकता. इसीलिए दस्तावेज़ एक राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित फ्रेमवर्क की बात करता है, जो ISO 14083 और GLEC Framework जैसे वैश्विक मानकों से जुड़ा है, लेकिन भारत के डेटा, ईंधन मिश्रण और संचालन की वास्तविकताओं के मुताबिक ढाला गया है. स्मार्ट फ्रेट सेंटर इंडिया की टेक्निकल प्रमुख दीपाली ठाकुर इसे सीधे शब्दों में कहती हैं. मानकीकृत और भारत-विशेष एमिशन फैक्टर नीति को अनुमान से निकालकर सटीक हस्तक्षेप की दिशा में ले जाते हैं. TERI के अनुसार, फ्रेट एमिशन का हिसाब सिर्फ रिपोर्टिंग का अभ्यास नहीं है. यह भविष्य के क्लीन फ्रेट प्रोग्राम्स, डीकार्बनाइजेशन रणनीतियों और उभरते कार्बन मार्केट्स में भारत की भागीदारी की बुनियाद है.
रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि फ्रेट ट्रांसपोर्ट केवल CO₂ तक सीमित मुद्दा नहीं है. NOx, SOx, पार्टिकुलेट मैटर और ब्लैक कार्बन जैसे प्रदूषक, खासकर लॉजिस्टिक्स हब और कॉरिडोर के आसपास, शहरी हवा को सीधे प्रभावित करते हैं. यही कारण है कि CAQM जैसे संस्थानों के लिए दिल्ली-NCR जैसे हॉटस्पॉट इस बहस के केंद्र में हैं. यहां किए गए हस्तक्षेप देश के दूसरे औद्योगिक और लॉजिस्टिक्स क्लस्टर्स के लिए मॉडल बन सकते हैं. नीति के स्तर पर, वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय का संदेश भी स्पष्ट है. फ्रेट एमिशन लेखांकन को लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर, दक्षता और प्रतिस्पर्धा से अलग नहीं देखा जा सकता.
व्हाइटपेपर सिर्फ समस्याएं नहीं गिनाता.यह आगे का रास्ता भी सुझाता है.
डिजिटल MRV सिस्टम, इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए भारत-विशेष एमिशन फैक्टर, Transportation Emissions Measurement Tool का प्रदर्शन, और TERI का क्लीन फ्रेट प्रोग्राम बेसलाइन स्टडी.
ये सब संकेत देते हैं कि फ्रेट सेक्टर में अब बातचीत आकांक्षाओं से आगे बढ़कर क्रियान्वयन की तरफ जा रही है. भारत की जलवायु कहानी में फ्रेट ट्रांसपोर्ट लंबे समय तक परिधि पर रहा. लेकिन यह रिपोर्ट बताती है कि आने वाले वर्षों में, सड़क पर दौड़ता हर ट्रक. सिर्फ सामान नहीं, अपना कार्बन हिसाब भी साथ लेकर चलेगा. और शायद यहीं से भारत की लॉजिस्टिक्स और क्लाइमेट नीति की अगली कहानी शुरू होती है.

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