विचार : रमज़ान: रहमत, बरकत और मग़फ़िरत का मुकद्दस महीना - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

विचार : रमज़ान: रहमत, बरकत और मग़फ़िरत का मुकद्दस महीना

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रमज़ान इस्लामी चाँद्र कैलेंडर का नौवाँ महीना है और इसे मुसलमानों के लिए सबसे पवित्र महीनों में से एक माना जाता है। यह महीना आत्मशुद्धि, इबादत, सब्र और अल्लाह की क़ुर्बत हासिल करने का सुनहरा अवसर प्रदान करता है। रमज़ान केवल भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं, बल्कि अपने दिल, ज़ुबान और कर्मों को सुधारने का महीना है। Qur'an में अल्लाह तआला फरमाता है: “ऐ ईमान वालों! तुम पर रोज़ा फ़र्ज़ किया गया है, जैसे तुमसे पहले लोगों पर फ़र्ज़ किया गया था, ताकि तुम परहेज़गार बनो।” (सूरह अल-बक़रह 2:183)। इस आयत में रोज़े का मक़सद साफ़ बताया गया है—तक़वा यानी अल्लाह का डर और उसकी हर वक्त याद।


रमज़ान और कुरआन की नुज़ूल

रमज़ान की सबसे बड़ी फ़ज़ीलत यह है कि इसी महीने में कुरआन करीम नाज़िल हुआ। अल्लाह तआला फरमाता है: “रमज़ान का महीना वह है जिसमें कुरआन उतारा गया, जो लोगों के लिए हिदायत और मार्गदर्शन की स्पष्ट निशानियाँ रखता है।” (सूरह अल-बक़रह 2:185)। कुरआन इंसान की ज़िंदगी के लिए मुकम्मल रहनुमाई है। इसलिए रमज़ान में मुसलमान अधिक से अधिक कुरआन की तिलावत करते हैं, उसके अर्थ को समझने की कोशिश करते हैं और उस पर अमल करने का इरादा करते हैं। मस्जिदों में तरावीह की नमाज़ अदा की जाती है, जिसमें पूरा कुरआन सुनाया जाता है। यह महीना कुरआन से अपने रिश्ते को मजबूत करने का बेहतरीन समय है।


रोज़े की फ़ज़ीलत और तक़वा

रमज़ान का रोज़ा इस्लाम के पाँच स्तंभों में से एक है। सुबह सहर (फज्र) से लेकर सूरज डूबने (मग़रिब) तक मुसलमान खाने-पीने और अन्य इच्छाओं से दूर रहते हैं। लेकिन रोज़ा केवल शारीरिक संयम नहीं है; यह आत्मिक प्रशिक्षण है। यह इंसान को सब्र, अनुशासन और आत्म-नियंत्रण सिखाता है। रोज़ा इंसान को बुरी बातों, झूठ, ग़ीबत और गुस्से से बचने की प्रेरणा देता है। जब इंसान अपनी इच्छाओं पर काबू पाता है, तो उसका ईमान मजबूत होता है और उसका चरित्र निखरता है।


रहमत और मग़फ़िरत का महीना

रमज़ान को रहमत (दया) और मग़फ़िरत (क्षमा) का महीना कहा जाता है। इस महीने में अल्लाह की रहमत खास तौर पर बरसती है। Qur'an में अल्लाह फरमाता है: “और जब मेरे बंदे तुमसे मेरे बारे में पूछें, तो (कह दो) मैं क़रीब हूँ; जब कोई मुझे पुकारता है तो मैं उसकी दुआ क़ुबूल करता हूँ।” (सूरह अल-बक़रह 2:186)। यह आयत हमें उम्मीद और यक़ीन देती है कि अल्लाह अपने बंदों की दुआ सुनता है। रमज़ान में तौबा और इस्तिग़फार का विशेष महत्व है। जो व्यक्ति सच्चे दिल से माफी मांगता है, अल्लाह उसे माफ़ कर देता है।


लैलतुल क़द्र की महानता

रमज़ान के आख़िरी दस दिन बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। इन्हीं रातों में लैलतुल क़द्र (शबे क़द्र) आती है, जो हज़ार महीनों से बेहतर है। Qur'an में अल्लाह फरमाता है: “निश्चय ही हमने इसे शबे क़द्र में उतारा। और तुम क्या जानो कि शबे क़द्र क्या है? शबे क़द्र हज़ार महीनों से बेहतर है।” (सूरह अल-क़द्र 97:1–3)। इस रात की इबादत का सवाब असंख्य है। मुसलमान इन रातों में नमाज़, तिलावत और दुआ में मशगूल रहते हैं, ताकि अल्लाह की खास रहमत हासिल कर सकें।


सदक़ा और ज़कात की अहमियत

रमज़ान में दान और सहायता का विशेष महत्व है। जब इंसान खुद भूख-प्यास सहता है, तो उसे गरीबों और जरूरतमंदों की तकलीफ का एहसास होता है। कुरआन में अल्लाह फरमाता है: “जो लोग अल्लाह की राह में अपना माल खर्च करते हैं, उनकी मिसाल उस दाने की तरह है जिससे सात बालियाँ उगती हैं और हर बाली में सौ दाने होते हैं; और अल्लाह जिसे चाहता है, उससे भी अधिक बढ़ा देता है।” (सूरह अल-बक़रह 2:261)। इस आयत से पता चलता है कि अल्लाह की राह में किया गया दान कई गुना बढ़ा दिया जाता है। रमज़ान में ज़कात और सदक़ा देने से समाज में भाईचारा और हमदर्दी बढ़ती है।


आत्म-सुधार और आध्यात्मिक परिवर्तन

रमज़ान आत्म-सुधार का महीना है। यह इंसान को अपनी कमियों पर गौर करने और उन्हें सुधारने का मौका देता है। यह झूठ, गुस्सा, लालच और बुरी आदतों से दूर रहने का प्रशिक्षण देता है। अगर रमज़ान के बाद भी इंसान अपनी अच्छी आदतों को जारी रखे, तो उसकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल सकती है। अल्लाह तआला फरमाता है: “निस्संदेह, अल्लाह की याद में ही दिलों को सुकून मिलता है।” (सूरह अर-रअद 13:28)। यही रमज़ान का असली संदेश है—दिल की सफाई और अल्लाह से जुड़ाव। रमज़ान एक महान नेमत है जो इंसान को तक़वा, सब्र, शुक्र और रहमदिली सिखाता है। यह महीना केवल तीस दिनों का इबादती समय नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी को सुधारने का संदेश देता है। जो व्यक्ति रमज़ान की फ़ज़ीलतों को समझकर सच्चे दिल से इबादत करता है, वह दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी हासिल कर सकता है।





—गौहर आसिफ—

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