न्यायालयों में लंबित मुकदमों की बात की जाएं तो केन्द्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय के गत वर्ष के आंकड़ो की ही माने तो देश के उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों में ही 65 लाख से अधिक मुकदमें निर्णय के इंतजार में दशकों से प्रतीक्षारत है। मजे की बात तो यह है कि 3 हजार से अधिक मामलें तो 50 साल भी अधिक समय से लंबित चल रहे हैं। दस साल या इससे अधिक समय से निर्णय का इंतजार कर रहे मुकदमों की ही बात करें तो यह संख्या इतनी अधिक है कि सोचने का मजबूर कर देती है। देश के 25 उच्च न्यायालयां व राज्यों के जिला अदालतों में लबित मुकदमों की बात की जाएं तो यह सामने आ रहा है कि 54 लाख 58 हजार 832 मुकदमें 10 से 20 साल की अवधि के हैं और निष्पादन का इंतजार कर रहे हैं। 20 से 30 साल और 30 से 40 साल की अवधि के निर्णय के इंतजार के मुकदमें भी लाखों में हैं। तस्वीर का एक पहलू यह भी है कि सालों से लोक अदालतें भी लग रही है पर मुकदमों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है।
न्यायालयों में बढ़ते मुकदमों को लेकर न्यायपालिका और सरकार दोनों ही चिंतित है। सवाल यह भी है कि जिन मामलों को आसानी से प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत ही निपटाया जा सकता है उन्हें न्यायिक प्रक्रिया में लंबे समय तक उलझाये रखना किसी भी तरह से उचित नहीं माना जा सकता। इससे समय और धन दोनों का ही नुकसान होता है। सवाल यह भी उठता है कि कानून कायदों का मतलब अपराध को रोकना होना चाहिए या कानूनी प्रक्रिया में ही उलझा कर लंबित रखते हुए बोझ बनाना होना चाहिए? ऐसी स्थिति में सरकार और वादी दोनों को ही कोई खास लाभ नहीं मिल पाता और न्यायालय का समय भी जाया जाता है। ऐसे में जुर्माना लगाना और वसूली सुनिश्चित करना व्यावहारिक समाधान हो सकता है और यह इसी दिशा में बढ़ता कदम माना जाना चाहिए। वैसे भी प्रक्रियात्मक त्रुटियों या अवहेलना जैसे प्रकरणों में न्यायालयों के चक्कर काटने-कटवाने के स्थान पर जुर्माना तय करना और उसे वसूलना अधिक व्यावहारिक समाधान है। वैसे भी कानून कायदों का मतलब अपराधीकरण को कम करना होना चाहिए और प्रक्रियात्मक सुधार और प्रशासनिक दृष्टि से अधिक सुसंगत होना चाहिए। प्रशासनिक अमले का भी एक दायित्व होता है और प्रशासनिक अमले द्वारा प्रावधानों के दुरुपयोग ना होने के संकल्प के साथ सुधारात्मक निर्णय किया जाता है तो यह समाज और व्यवस्था दोनों के लिए लाभकारी होगा। न्यायिक प्रक्रिया में सुधार की दिशा में इसे अग्रगामी कदम माना जाना चाहिए। केन्द्र और राजस्थान सरकार की तरह अन्य प्रदेशों की सरकारों को भी इस दिशा में पहल करनी होगी।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें