भारतीय सनातन परंपरा में समय की गणना केवल कैलेंडर के पन्नों से नहीं होती, बल्कि ग्रहों-नक्षत्रों की गति और प्रकृति की लय से निर्धारित होती है। जब सूर्य अपनी राशि बदलते हैं तो उसके साथ धार्मिक जीवन की दिशा भी बदल जाती है। इस साल भी ऐसा ही एक महत्वपूर्ण ज्योतिषीय परिवर्तन होने जा रहा है। दरअसल 14 मार्च को सूर्य देव कुंभ राशि को छोड़कर मीन राशि में प्रवेश करेंगे। इसी के साथ खरमास की शुरुआत हो जाएगी। यह अवधि लगभग एक माह तक प्रभावी रहेगी और 14 अप्रैल को सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के साथ इसका समापन होगा। इस वर्ष की विशेषता यह है कि खरमास की अवधि के बीच ही चैत्र नवरात्र का पावन पर्व आएगा। इसलिए एक ओर जहां यह समय शक्ति उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना जाएगा, वहीं दूसरी ओर विवाह जैसे बड़े मांगलिक संस्कारों पर अस्थायी विराम भी रहेगा
नवरात्र में विवाह नहीं, लेकिन अन्य मांगलिक कार्य संभव
इस बार नवरात्र के दौरान विवाह के लिए शुभ लग्न नहीं बनेंगे, क्योंकि यह पूरा समय खरमास की अवधि में रहेगा। इस कारण शादियां नहीं होंगी, लेकिन अन्य कई मांगलिक कार्य किए जा सकते हैं। इनमें, यज्ञोपवीत संस्कार, मुंडन संस्कार, अन्नप्राशन, नए प्रतिष्ठान या दुकान का उद्घाटन, धार्मिक अनुष्ठान और यज्ञ जैसे कार्य शामिल हैं। इसके अलावा गया तीर्थ में श्राद्ध कर्म पर खरमास का कोई प्रतिबंध नहीं माना जाता, इसलिए वहां पितृ कर्म सामान्य रूप से किए जा सकते हैं।
देवी आराधना का नौ दिवसीय पर्व
चैत्र नवरात्र के नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। पहले दिन घटस्थापना के साथ पूजा शुरू होती है और भक्त नौ दिनों तक व्रत रखकर दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। अंतिम दिन कन्या पूजन के साथ नवरात्र का समापन होता है। देवी के नौ रूपों की पूजा इस क्रम में की जाती है, मां शैलपुत्री, मां ब्रह्मचारिणी, मां चंद्रघंटा, मां कुष्मांडा, मां स्कंदमाता, मां कात्यायनी, मां कालरात्रि, मां महागौरी, मां सिद्धिदात्री. इन नौ दिनों में साधना करने से मानसिक शक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होने की मान्यता है।
इस बार घोड़ा है मां दुर्गा की सवारी
नवरात्र में देवी की सवारी का निर्धारण नवरात्र के पहले दिन के वार से किया जाता है। जब नवरात्र गुरुवार से शुरू होते हैं तो देवी की सवारी घोड़ा मानी जाती है। इस वर्ष चैत्र नवरात्र गुरुवार से आरंभ हो रहे हैं, इसलिए इस वर्ष मां दुर्गा की सवारी घोड़ा मानी जा रही है। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार घोड़े पर देवी का आगमन तेज परिवर्तन और सामाजिक हलचल का संकेत माना जाता है।
14 अप्रैल के बाद खुलेंगे शुभ लग्न
खरमास की समाप्ति 14 अप्रैल को सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के साथ होगी। मेष राशि सूर्य की उच्च राशि मानी जाती है। इसके साथ ही विवाह और अन्य मांगलिक कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त फिर से शुरू हो जाएंगे। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार 14 अप्रैल से 20 जुलाई तक लगभग तीन माह से अधिक समय तक विवाह और अन्य संस्कारों के लिए पर्याप्त शुभ लग्न उपलब्ध रहेंगे।
अप्रैल, मई और जून में सबसे अधिक लग्न
पंचांग के अनुसार इस वर्ष विवाह के लिए सबसे अधिक शुभ तिथियां अप्रैल, मई और जून में मिलेंगी।
मार्च में 2, 3, 4, 8, 9, 11 और 12 को विवाह के मुहूर्त थे।
अप्रैल में 15, 20, 21, 25, 26, 27, 28 और 29 को शुभ लग्न मिलेंगे।
मई में 1, 3, 5, 6, 7, 8, 13 और 14 को विवाह हो सकेंगे।
जून में 21, 22, 23, 24, 25, 26, 27 और 29 को शुभ मुहूर्त रहेंगे।
जुलाई में 1, 6, 7, 11 और 12 को विवाह संभव होंगे।
25 जुलाई से शुरू होगा चातुर्मास
इन शुभ मुहूर्तों का क्रम लगभग तीन माह तक चलेगा। इसके बाद 25 जुलाई को देवशयनी एकादशी के साथ चातुर्मास का आरंभ होगा। इस दिन से भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और चार महीनों तक विवाह और अन्य मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। चातुर्मास की यह अवधि 20 नवंबर को देवोत्थान एकादशी तक चलेगी। इसके बाद फिर से विवाह और अन्य संस्कार शुरू होंगे।
नवरात्र शुभ मुहूर्त
पंचांग गणना के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा : 19 मार्च को है. इसी दिन हिंदू नववर्ष विक्रम संवत 2083 का आरंभ माना जाएगा. पहले दिन घटस्थापना और मां शैलपुत्री की पूजा का विधान है। यह दिन भारतीय संस्कृति में सृष्टि के नवआरंभ का प्रतीक माना जाता है। पुराणों के अनुसार इसी तिथि को ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस बार घटस्थापना के दो विशेष शुभ मुहूर्त बन रहे हैं :- प्रातः मुहूर्त : सुबह 6ः02 से 7ः43 बजे तक, अभिजीत मुहूर्त : दोपहर 12ः05 से 12ः53 बजे तक. इन समयों में कलश स्थापना करके अखंड ज्योति प्रज्वलित करना अत्यंत शुभ माना गया है। खास यह है कि इस बार ग्रहों की स्थिति भी विशेष मानी जा रही है। सूर्य मीन राशि में रहेंगे, जो आध्यात्मिक ऊर्जा का संकेत है। बृहस्पति की शुभ दृष्टि धर्म और ज्ञान की वृद्धि का संकेत देती है। चंद्रमा की प्रतिपदा से नवमी तक की यात्रा देवी उपासना के लिए शुभ मानी जाती है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार यह योग आध्यात्मिक साधना, मंत्र-जप और शक्ति आराधना के लिए अत्यंत अनुकूल माना जा रहा है।
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी



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