वाराणसी : भोले की नगरी में फूटा रंगों का ज्वार, घाटों से गलियों तक उड़ता रहा गुलाल, सैलानी भी हो गए बनारसी - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

गुरुवार, 5 मार्च 2026

वाराणसी : भोले की नगरी में फूटा रंगों का ज्वार, घाटों से गलियों तक उड़ता रहा गुलाल, सैलानी भी हो गए बनारसी

  • गुलाल की आंधी में मिटे भेदभाव, गंगा-जमुनी तहजीब की दिखी मिसाल
  • जोगिरा की गूंज में झूमी काशी : दशाश्वमेध से अस्सी तक रंगों की बौछार, जैतपुरा की होली बारात बनी आकर्षण

Holi-varanasi
वाराणसी (सुरेश गांधी)। होली का जश्न हो और काशी ठहर जाए, यह संभव ही नहीं। इस बार भी फागुन ने जैसे ही दस्तक दी, पूरी नगरी ताश के पत्तों की तरह फेंटे गए रंगों में बिखर गई। घाटों से गलियों तक, छतों से चौबारों तक, मंदिरों से मोहल्लों तककृहर ओर बस रंग, राग और रौद्र उल्लास का अनंत विस्तार दिखाई दिया। सुबह की पहली किरण के साथ दशाश्वमेध घाट पर गंगा की लहरों संग उड़ता गुलाल आकाश में घुला तो लगा मानो प्रकृति स्वयं काशी की होली में सहभागी हो गई हो। “होरी खेलैं रघुवीरा...” की स्वर-लहरियां गूंजीं और विदेशी सैलानी भी देसी रंग में रंगे नजर आए। कोई कैमरे में दृश्य कैद कर रहा था तो कोई खुद ही रंगों का पात्र बन गया था। उधर अस्सी घाट युवाओं की मस्ती का केंद्र बना रहा। डीजे की धुन, ढोल-मजीरे की थाप और “जोगिरा... सारा रारा...” की गूंज के बीच युवा थिरकते रहे। गोदौलिया, चेतगंज, लहुराबीर, सिगरा, दुर्गाकुंड से लेकर लंका तक हर गली में रंगों का समंदर उमड़ पड़ा। छतों से उड़ते अबीर-गुलाल ने सड़कों को इंद्रधनुषी चादर से ढक दिया। होलिका दहन की रात ने इस उल्लास को आध्यात्मिक आभा भी दी। भद्रा समाप्त होते ही वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अग्नि प्रज्वलित हुई। भक्त प्रह्लाद की स्मृति में जलती होलिका की लपटों के साथ लोगों ने परिवार और देश की सुख-समृद्धि की कामना की। परिक्रमा के बाद गले मिलने और अबीर लगाने का सिलसिला देर रात तक चलता रहा। काशी के हृदय स्थल काशी विश्वनाथ धाम में पंखुड़ियों की होली ने भक्तों को भाव-विभोर कर दिया। बाबा के दरबार में भजन और फाग गूंजते रहे। “हर-हर महादेव” और “बोल बम” के जयघोष के बीच ऐसा लगा मानो स्वयं भोलेनाथ इस रंगोत्सव में रमे हों, भस्म और गुलाल का अद्भुत संगम काशी की आध्यात्मिकता और मस्ती को एक साथ अभिव्यक्त कर रहा था।


Holi-varanasi
शहर के जैतपुरा से निकली पारंपरिक होली बारात ने इस उत्सव को और भव्य बना दिया। घोड़ा, ऊंट, ढोल-नगाड़े और सजी-धजी झांकियों के साथ निकली बारात में भूत-प्रेत और पिशाच के वेश में होरियारों की टोली आकर्षण का केंद्र रही। दूल्हा-दुल्हन के अनूठे श्रृंगार, मूसल नचावन और लोढ़ा घुमावन की परंपरा ने दर्शकों को हंसी से लोटपोट कर दिया। हिंदू-मुस्लिम सहभागिता ने गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल पेश की। गलियों में ढोलक की थाप पर झूमती टोलियां, कहीं भांग की ठंडाई, तो कहीं गुजिया और मालपुए की मिठासकृहर क्षण उत्सवमय था। बच्चे रंगों से सने इधर-उधर दौड़ते दिखे, बुजुर्ग भी पीछे नहीं रहे। मोबाइल पर शुभकामनाओं की बौछार और फोन कॉल्स पर बधाइयों का सिलसिला चलता रहा। घाटों पर देसी-विदेशी सैलानियों का उत्साह देखते ही बनता था। कोई रंग में भीगा गंगा आरती देख रहा था, तो कोई डीजे की धुन पर थिरक रहा था। शाम ढलते-ढलते जब रंगों की तीव्रता थोड़ी थमी, तो गंगा तट पर बैठी भीड़ के चेहरों पर संतोष और आत्मीयता की चमक थी। ऐसा प्रतीत हुआ मानो काशी ने एक बार फिर जीवन का मूलमंत्र दोहरा दिया हो, रंग केवल चेहरे पर नहीं, मन पर चढ़ते हैं। यहां होली केवल खेली नहीं जाती, जी जाती है। और अंततः हर ओर एक ही स्वर गूंजता रहा “बुरा न मानो होली है३ यह भोले की काशी है!”


रंग, राग और रौद्र-उल्लास

फागुन की अंतिम संध्या पर काशी ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि यहां त्योहार केवल तिथि नहीं, परंपरा और आत्मा का उत्सव होते हैं। धुलेंडी से एक दिन पूर्व पूरे शहर से लेकर देहात तक होलिका पूजन और दहन का सिलसिला चला। हर गली-मुहल्ले में सुबह से ही होलिका सजाई गई, कहीं लकड़ियों का ऊंचा ढेर, कहीं गोबर के उपलों से सजी पारंपरिक रचना, तो कहीं रंग-बिरंगे कागज़ी फूलों से अलंकृत वेदी। शाम ढलते-ढलते महिलाओं ने फाग गीतों की स्वर-लहरियों के बीच परिवार सहित होलिका का पूजन किया। आधी रात के बाद भद्रा समाप्त होते ही वैदिक मंत्रोच्चार के साथ अग्नि प्रज्वलित हुई। धू-धू कर जलती होलिका की लपटों में जैसे आस्था और उल्लास एक साथ आकाश छूने लगे। भक्त प्रह्लाद की स्मृति और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा के साथ लोगों ने देश और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। अग्नि की परिक्रमा के बाद अबीर-गुलाल उड़ाकर एक-दूसरे को गले लगाने का क्रम शुरू हो गया।


घाटों से गलियों तक, मस्ती का रंग

होलिका दहन के साथ ही काशी की फिज़ां में होली का रंग और गहरा हो गया। गलियों से लेकर गंगा घाटों तक “उड़त गुलाल लाल भए बादर” की छटा बिखर गई। अस्सी घाट पर ढोल-मजीरे और डीजे की धुन पर युवा झूमते दिखे तो दशाश्वमेध घाट पर देशी-विदेशी सैलानी रंगों में सराबोर नजर आए। विदेशी पर्यटक भी बनारसी ठंडाई का स्वाद लेते हुए “जोगिरा सारा रारा” की गूंज में शामिल हो गए। घाटों पर रंगों की बौछार और संगीत का समागम देर शाम तक चलता रहा।


हर मोहल्ले में उत्सव, हर चेहरे पर मुस्कान

मैदागिन, गोदौलिया, चेतगंज, लंका, लहुराबीर, सिगरा, दुर्गाकुंड, भेलूपुर, शिवपुर, सुंदरपुर, भोजूबीर से लेकर ग्रामीण अंचलों तक हर ओर रंगों की धूम रही। कहीं युवाओं की टोलियां डीजे पर थिरकती दिखीं तो कहीं महिलाएं फाग गीतों पर झूमती नजर आईं। बच्चे, बूढ़े, युवा, सभी पर रंगों का नशा चढ़ा था। मोबाइल पर शुभकामना संदेशों की झड़ी लगी रही, फोन कॉल्स पर बधाइयों का आदान-प्रदान चलता रहा। होली की यह परंपरा अब डिजिटल संवाद के साथ और व्यापक हो गई है, पर आत्मीयता वही पुरानी, गले मिलकर मुंह मीठा कराने की।


रंगभरी से धुलेंडी तक, दूना हुआ उल्लास

रंगभरी एकादशी से शुरू हुआ रंगोत्सव धुलेंडी की पूर्व संध्या तक दूना हो गया। कहीं शिव बारात निकली तो कहीं जोगिरा का आयोजन हुआ। होलिका दहन के साथ ही होली का हुड़दंग भी शुरू हो गया। डीजे की धुन पर युवा झूमते रहे, तो लोकगीतों की तान पर बुजुर्ग भी कदम मिलाते दिखे। सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों के बीच शहर ने परंपरा और आधुनिकता का संतुलन बनाए रखा। फागुन की इस मस्ती में डूबी काशी ने एक बार फिर संदेश दिया यहां रंग केवल त्योहार नहीं, जीवन का दर्शन हैं। और सच ही तो हैकृभोले की नगरी में होली, केवल खेली नहीं जाती, जी जाती है।

कोई टिप्पणी नहीं: