पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत की सड़कों पर एक अलग ही राजनीतिक तापमान दिखाई दे रहा है। कहीं ईरान के समर्थन में प्रदर्शन हो रहे हैं, तो कहीं केंद्र सरकार की कथित “चुप्पी” को मुद्दा बनाया जा रहा है। सवाल यह है कि क्या विदेश नीति अब जनसभाओं और नारों से तय होगी? क्या राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन जैसे गंभीर विषय भी वोट बैंक की राजनीति की भेंट चढ़ेंगे? भारत जैसे उभरते वैश्विक शक्ति केंद्र के लिए हर अंतरराष्ट्रीय संकट केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया का विषय नहीं होता, बल्कि सूक्ष्म कूटनीतिक गणना का प्रश्न होता है। एक ओर विपक्ष ईरान के पक्ष में मुखर दिखना चाहता है, दूसरी ओर सरकार संतुलित और संयमित रुख अपनाए हुए है। लेकिन इस शोर के बीच असली प्रश्न कहीं दब तो नहीं रहाकृभारत का हित क्या है? विदेश नीति सड़क पर तय नहीं होती, वह राष्ट्रीय हित, आर्थिक स्थिरता, सामरिक साझेदारियों और वैश्विक संतुलन की कसौटी पर गढ़ी जाती है। ऐसे में यह बहस जरूरी है कि ईरान पर उठ रही आवाजें वास्तव में कूटनीतिक चिंता हैं या घरेलू राजनीति की
भारत के रणनीतिक हित : क्यों महत्त्वपूर्ण है ईरान?
1. चाबहार पोर्ट : सामरिक प्रवेशद्वार : चाबहार पोर्ट भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुँच देता है। यह पाकिस्तान को दरकिनार करने का विकल्प है और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के सामने संतुलन भी। यदि भारत ईरान से दूरी बना लेता है, तो यह रणनीतिक विकल्प कमजोर होगा।
2. ऊर्जा सुरक्षा : ईरान कभी भारत का प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता रहा है। प्रतिबंधों के कारण आयात रुका, पर भविष्य में विकल्प खुले रह सकते हैं। ऊर्जा विविधीकरण भारत के लिए अनिवार्य है।
3. बहुध्रुवीय संतुलन : भारत के संबंध केवल ईरान तक सीमित नहीं। भारत के मजबूत रिश्ते हैं, अमेरिका, इजराइल, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात. इज़राइल रक्षा तकनीक का बड़ा स्रोत है। खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। मतलब साफ है भारत किसी एक ध्रुव में बंधकर निर्णय नहीं ले सकता।
संभावित जोखिम
यदि भारत खुलकर ईरान का समर्थन करता है : तो अमेरिकी प्रतिबंधों का जोखिम बढ़ सकता है। खाड़ी देशों के साथ संतुलन प्रभावित हो सकता है। इजराइल के साथ रक्षा सहयोग पर असर पड़ सकता है। यदि भारत पूर्ण दूरी बना लेता है : तो मध्य एशिया में रणनीतिक पहुंच घटेगी। चीन और पाकिस्तान को अवसर मिलेगा। ऊर्जा विकल्प सीमित होंगे। दोनों ही अतिवादी विकल्प भारत के हित में नहीं।
विदेश नीति का सिद्धांत : स्थायी हित
विदेश नीति “बदले” पर नहीं चलती। शीतयुद्ध के दौर में अमेरिका ने पाकिस्तान का खुला समर्थन किया था। आज वही अमेरिका भारत का रणनीतिक साझेदार है। भारत ने दशकों तक फिलिस्तीन का समर्थन किया, फिर भी आज इज़राइल के साथ गहरे रक्षा संबंध हैं। समय बदलता है, समीकरण बदलते हैं, पर राष्ट्रीय हित स्थायी रहते हैं। तो क्या भारत को ईरान की मदद करनी चाहिए? जवाब “हाँ” या “ना” में नहीं है। भारत को चाहिए : सैन्य संघर्ष में पक्षधर न बने, शांति और कूटनीतिक समाधान का समर्थन करे, चाबहार और ऊर्जा हित सुरक्षित रखे, पाकिस्तान मुद्दे पर स्पष्ट रुख रखे, अमेरिका और खाड़ी देशों से संतुलन बनाए रखे. भारत को “ईरान का साथ” नहीं देना है, भारत को “भारत के हित का साथ” देना है। 1962 की पीड़ा राष्ट्रीय स्मृति है, परंतु विदेश नीति का आधार नहीं। पाकिस्तान का प्रश्न संवेदनशील है, परंतु हर समीकरण स्थायी नहीं। ईरान न स्थायी मित्र है, न स्थायी शत्रु। भारत को न अंध समर्थन करना चाहिए, न अंध विरोध। भारत को अपने हित, अनहित, लाभ, हानि और दीर्घकालिक रणनीतिक गणना के आधार पर निर्णय लेना चाहिए। क्योंकि अंततः विदेश नीति का एक ही केंद्र है : भारत।भारत की रणनीतिक गणना
विदेश नीति भावनात्मक प्रतिक्रिया का क्षेत्र नहीं, बल्कि कठोर यथार्थ और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों की गणना का विषय है। जब प्रश्न उठता है, क्या भारत को ईरान का साथ देना चाहिए तो इसे नारे या आक्रोश से नहीं, बल्कि तथ्य, इतिहास, सामरिक संतुलन और आर्थिक हितों के आधार पर परखा जाना चाहिए। 1962 का भारत-चीन युद्ध, पाकिस्तान का प्रश्न, पश्चिम एशिया की राजनीति और भारत की उभरती वैश्विक भूमिका, इन सबको जोड़कर ही उत्तर निकलेगा।
1. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य : तथ्य बनाम धारणा : 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय ईरान में शासन था, मोहम्मद रज़ा पहलवी का। उस दौर में ईरान पश्चिमी खेमे के निकट था। युद्ध भारत और चीन के बीच सीमित सैन्य संघर्ष था। ऐतिहासिक अभिलेख यह नहीं बताते कि ईरान ने चीन को प्रत्यक्ष सैन्य सहायता दी। इसलिए “ईरान ने 1962 में चीन का साथ दिया”, यह कथन प्रायः राजनीतिक विमर्श में उछाला जाता है, परंतु इसका ठोस प्रमाण सीमित है। आज के सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई उस समय सत्ता में नहीं थे। अतः अतीत की हर घटना को वर्तमान नेतृत्व पर आरोपित करना तर्कसंगत नहीं। मतलब साफ है 1962 की स्मृति भावनात्मक है, परंतु ईरान के प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप का ठोस प्रमाण नहीं मिलता।
2. पाकिस्तान कारक : समर्थन, सीमाएँ और विरोधाभास : पाकिस्तान और ईरान के संबंध जटिल रहे हैं। पाकिस्तान के पक्ष में रुख : ओआईसी जैसे मंचों पर कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान समर्थक बयान। 1965 और 1971 में सीमित कूटनीतिक समर्थन। लेकिन दूसरी तस्वीर : बलूचिस्तान मुद्दे पर गंभीर मतभेद। सीमा पार आतंकवादी गतिविधियों को लेकर तनाव। हाल के वर्षों में सीमा पर प्रत्यक्ष सैन्य झड़पें। ईरान और पाकिस्तान के संबंध स्थायी मित्रता नहीं, बल्कि अवसरवादी समीकरणों की कहानी हैं। मतलब साफ है ईरान का पाकिस्तान समर्थक रुख पूर्ण और स्थायी नहीं रहा।
अतीत के आधार पर वर्तमान नीति?
यदि भारत 1962 या ओआईसी के बयानों के आधार पर स्थायी दूरी बनाए, तो उसे अनेक देशों से संबंध तोड़ने पड़ेंगे। विदेश नीति “स्थायी मित्र, स्थायी शत्रु” की अवधारणा पर नहीं चलती। यह “स्थायी राष्ट्रीय हित” पर आधारित होती है। ऐसे में भारत को ईरान से संवाद बनाए रखना चाहिए, सामरिक परियोजनाएं जारी रखनी चाहिए, किसी युद्ध या आक्रामकता का समर्थन नहीं करना चाहिए, अमेरिका, इज़राइल और खाड़ी देशों से संतुलन बनाए रखना चाहिए, पाकिस्तान मुद्दे पर स्पष्ट कूटनीतिक विरोध दर्ज कराना चाहिए.
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी




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